कुलोत्तुंग-प्रथम (1070 ई.-1122 ई.) एवं उसके उत्तराधिकारी (2) - दक्षिण भारतीय साम्राज्य : चोल साम्राज्य - Kulottunga-I (1070 AD-1122 AD) and his successors - South Indian Empire: Chola Empire

कुलोत्तुंग-प्रथम (1070 ई.-1122 ई.) एवं उसके उत्तराधिकारी (2) - दक्षिण भारतीय साम्राज्य : चोल साम्राज्य - Kulottunga-I (1070 AD-1122 AD) and his successors - South Indian Empire: Chola Empire

कला एवं वास्तुकला


वास्तुकला की द्रविड़ शैली, जिसका उद्भव पल्लवों के शासनकाल में हुआ, चोल राजाओं के शासनकाल में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची। परवर्ती पल्लव काल में चट्टानों को काटकर मंदिर बनाने का काम बंद हो चुका था। अब पत्थरों की जुड़ाई करके मंदिर बनाए जाने लगे थे। चोलों ने इस पद्धति का प्रयोग अपने संपूर्ण साम्राज्य में किया। इसके अतिरिक्त प्रारंभ में उन्होंने जिन भवनों एवं मंदिरों का निर्माण करवाया, उनमें कोई तड़क-भड़क भी नहीं है। वे प्रायः वैसी ही हैं जैसी परवर्ती पल्लवों की थीं। किंतु ज्यों-ज्यों चोल साम्राज्य का विस्तार होता गया, उनके निर्माण का आकार भी बढ़ता गया। तंजोर एवं कोंडचोलपुरम उनकी वास्तुकला के चरमोत्कर्ष के प्रतीक हैं। इसी प्रकार चोल राजाओं के शासनकाल में मूर्तिकला और चित्रकला में भी पर्याप्त प्रगति हुई।


जी.जे. द्रबील का मत है कि पल्लवों ने मूर्तिकला में विशिष्टता प्राप्त की थी, जबकि चोल मुख्यतः वास्तुकार थे। किंतु नीलकंठ शास्त्री इस विचार से सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं कि पत्थरों की चोल मूर्तियाँ किसी भी तरह से पल्लवों की मूर्तियों से कम नहीं है और कांस्य मूर्तियों में तो चोलों की कोई तुलना ही नहीं हैं। उनका सौंदर्य अद्वितीय है। विशाल मूर्तियों के लिए धातु गलाने की उनकी प्रौद्योगिकी उच्च कोटि की थी।


चोल राजाओं के शासनकाल में मंदिर कई स्थानों पर बनाए गए कुछ मंदिर उन स्थानों पर बने जहाँ वृक्षों की पूजा होती थी और उन वृक्षों को देवताओं का निवास माना जाता था। अन्य मंदिर उन स्थानों पर बने जिनके विषय में यह विश्वास था कि वहाँ कोई पौराणिक घटना घटी थी। श्मशान मंदिर भी बने, जिन्हें 'पल्लीप' कहते थे। ये संतों, राजाओं और वीरों के अवशेषों पर बने थे। अनेक मंदिर राजाओं ने अपनी इच्छा से स्थानों का चुनाव कर बनवाए। इसके उदाहरण तंजोर और गौकोंडचोलपुरम के बृहदीश्वर मंदिर हैं। इनमें पहला मंदिर राजराज- प्रथम ने बनवाया था और दूसरा उसके उत्तराधिकारी राजेंद्र ने


चोलकालीन वास्तुकला को विकास-क्रम की दृष्टि से तीन कालों में विभक्त किया जा सकता है.


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(i) आदिकाल (850) ई.-985 ई.)


आदिकाल में वास्तुकला का पल्लव शैली से चोल शैली की ओर संक्रमण हुआ। इस काल के प्रारंभ में जो मंदिर बने उनमें पल्लव और चोल दोनों शैलियों की छाप है, किंतु शीघ्र ही चोल शैली मुखर हो गई। संक्रमणकालीन मंदिरों में पहला उल्लेखनीय मंदिर नाटमिलई स्थित विजयालयचोलेश्वरम है। इसका निर्माण विजयालय के शासनकाल में हुआ था। इसमें आदिकालीन वर्गाकार प्राकार के अंदर एक वृत्ताकार कक्ष है। कक्ष और प्राकार के ऊपर एक विमान है, जो तीन खडों में विभक्त है। इसके नीचे के दो खंड वर्गाकार हैं और सबसे ऊपर का खंड वृत्ताकार है। इस मंदिर में गर्भगृह के सामने जो मंडप हैं, उसके स्तंभ पल्लव शैली के हैं। मुख्य मंदिर के चारों ओर सात छोटे उपमंदिर हैं जो मुख्य मंदिर की ओर अभिमुख हैं। ये सभी पत्थरों के बने हैं और इनका डिजाइन मुख्य मंदिर की तरह ही है। मुख्य मंदिर के चारों ओर सात या आठ उपमंदिरों की व्यवस्था आदिकालीन चोल मंदिरों की एक प्रमुख विशेषता है।


संक्रमणकालीन मंदिरों में सबसे विशिष्ट तिरुक्कटुलै है जो सुंदरेश्वर मंदिर के नाम से ख्यात है। इसका निर्माण आदित्य-प्रथम के शासनकाल में हुआ था। इस मंदिर के गर्भगृह और विमान वर्गाकार है। इनके अर्द्धस्तंभ चोल शैली के हैं, किंतु इसपर पल्लव शैली की स्पष्ट छाप है। कुंभकोणम के नागेश्वर मंदिर में तिरुक्कटुलै की सभी विशेषताएँ मिलती हैं। किंतु इस मंदिर की सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता इसकी बाहरी दीवारों में बने आलों में रखी मूर्तियाँ हैं। विजयालय अथवा आदित्य प्रथम के शासनकाल में निर्मित अगस्त्येश्वर का मंदिर भी वास्तुकला के चोल शैली की ओर प्रस्थान का संकेत देता है।


इतिहासकारों का मत है कि परांतक प्रथम के शासनकाल में निर्मित श्रीनिवासनल्लूर का कोरंगनाथ मंदिर पल्लव शैली के प्रभाव से पूर्णतः मुक्त है। पर्सी ब्राउन कहते हैं कि इस मंदिर मेंपल्लव शैली से दो बातों में स्पष्ट अंतर है। एक तो इस मंदिर के स्तंभों के शीर्ष और दूसरा, शीर्ष के ऊपर अवस्थित आधार, जो स्पष्टतः पल्लवों के स्तंभों से भिन्न हैं।


निश्चय ही परां तक प्रथम के शासनकाल में चोलकालीन वास्तुकला पल्लवों के प्रभाव से मुक्त हो गई और उसका निजी और विशिष्ट रूप प्रकट हो गया। इसकी सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें मुख्य मंदिर अपनी भव्य संरचना एवं केंद्रीय स्थिति के कारण मंदिर परिसर में अवस्थित अनेक उपमंदिरों पर शासन करता प्रतीत होता है। इसमें गर्भगृह के सामने का अंतराल मुख्य मंदिर का समन्वित अंग होता है और ऐसे मंदिरों में विमान का निम्न तल इन दोनों को आच्छादित करता है। यह विशेषता प्रारंभिक चोल मंदिरों, जैसे- विजयालय-चोलेश्वर में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है, किंतु शीघ्र ही इसका लोप हो गया। इसके बाद जिन मंदिरों का निर्माण हुआ, उनमें विमान गर्भगृह के ठीक ऊपर अवस्थित है। पल्लव अपने स्तंभों तथा अन्य स्थानों को सिंह के डिजाइन से अलंकृत करते थे किंतु बाद में यह प्रवृत्ति लुप्त हो गई और चोल वास्तुकला में स्तंभों एवं अर्द्धस्तंभों की गढ़न शुद्ध अमूर्त शैली की हो गई। 


(ii) मध्य काल (985 ई.-1070 ई.)


मध्य चोल काल में चोल वास्तुकला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची। इस काल में निर्मित दो सबसे महत्वपूर्ण मंदिर तंजोर एवं गंगैकोंडचोलपुरम स्थित बृहदीश्वर मंदिर हैं। तंजोर स्थित बृहदीश्वर मंदिर जिसे राजराजेश्वर मंदिर भी कहते हैं, 1009 ई. में बनकर तैयार हुआ। यह चोल वास्तुकला की सबसे भव्य संरचना है। इस मंदिर की मुख्य विशेषता पिरामिड के आकार का इसका भव्य विमान है जिसकी ऊँचाई लगभग 190' है। इसमें कुल तेरह खंड हैं, जो ऊपर की ओर क्रमशः लघुतर होते गए हैं। विमान, अर्द्धमंडप, महामंडप और नंदीमंडप सभी एक चहारदीवारी के अंदर केंद्र में अवस्थित हैं और उनके सामने एक प्रवेश द्वार, गोपुरम है। मंदिर परिसर में अनेक उपमंदिर भी हैं जो चहारदिवारी के अंदर चारों तरफ फैले हुए हैं। इसके साथ ही, इस मंदिर की दीवारे आधार से शीर्ष तक विभिन्न प्रकार की मूर्तियों से सुसज्जित हैं। पर्सी ब्राउन इस मंदिर को संपूर्ण भारतीय वास्तु की कसौटी मानते हैं।


मध्य चोल युग का दूसरा महत्वपूर्ण मंदिर गंगैकोंडचोलपुरम स्थित बृहदीश्वर मंदिर है, जिसका निर्माण 1030 ई. के आसपास हुआ था। इसमें तंजोर की सभी विशेषताएँ मौजूद हैं, किंतु पिरामिड के आकार का इसका विमान 160° ऊँचा है और इसमें सिर्फ आठ मंजिलें हैं। इसके अतिरिक्त, तंजोर विमान की मजबूत सीधी रेखाओं के स्थान पर वक्र रेखाओं का प्रयोग हुआ है और इसकी बाहरी दीवार तंजोर की तुलना में अधिक आलंकारिक है।


मध्यकालीन चोल वास्तुकला के प्रमुख लक्षण उनके भव्य विमान और विशाल प्रांगण थे। किंतु धीरे-धीरे गोपुरम को प्रमुखता मिली और बड़ी-बड़ी ऊँचाई के अत्यधिक सजावट वाले गोपुरम बनाए जाने लगे। कई गोपुरम मंदिरों की तरह बनाए गए, जिनमें कई मंजिलें होती थीं। इन सभी का परिणाम यह हुआ कि मुख्य अथवा केंद्रीय मंदिर गोपुरम की तुलना में अत्यंत गौणहो गया। इसके अतिरिक्त इस काल के मंदिरों की एक अन्य विशेषता यह रही हैं कि इन विशाल मंदिरों को अत्यंत सूक्ष्म भावभंगिमाओं वाली मूर्तियों से अलंकृत किया गया। फरगुसन ने ठीक ही कहा है कि मंदिरों की संकल्पना में चोल कलाकार दैत्यों के समान थे, किंतु उन्होंने उन मंदिरों को अंतिम रूप एक जौहरी की भाँति दिया। 


(iii) परवर्ती काल (1070 ई.-1250 ई.)


परवर्ती चोल काल में भी मंदिरों का निर्माण पहले की तरह ही होता रहा। चोल-वास्तु के विकास की दृष्टि से इस काल का पहला मंदिर दाराशुरम स्थित ऐरावतेश्वर मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण राजराज- द्वितीय के शासनकाल में हुआ था, यद्यपि कुलोतुंग-तृतीय के समय इसमें विस्तार भी हुए थे। इस मंदिर के मूल रूप में कई प्राकार थे और प्रत्येक प्राकार का अपना गोपुरम था, जिससे उसमें प्रवेश करते थे। दूसरा महत्वपूर्ण मंदिर कुंबकोणम के निकट त्रिभुवनम में अवस्थित कंपहरेश्वर का मंदिर है। यह कुलोत्तुंगतृतीय के शासनकाल में बना था। इन दोनों मंदिरों की वास्तुकला अपने पूर्ववर्ती मंदिरों से कई दृष्टियों से साम्य रखती है। फिर भी, यह निर्विवाद है कि शैली की दृष्टि से इन्हें तंजोर और गंगैकोंडचोलपुरम के सुविकसित चोल मंदिरों और चोलोत्तर विशाल मंदिरों के समूहों के बीच के संक्रमणकाल का उदाहरण माना जा सकता है।


चोल मूर्तिकारों ने पत्थरों की मूर्तियाँ बनाने की कला में दक्षता हासिल की। किंतु इसके लिए उन्होंने पल्लवों की भाँति बड़े-बड़े फलकों का चुनाव नहीं किया। उनके अधिकांश फलक 2' x 1' से अधिक नहीं हैं। इसके साथ ही, उन्होंने बड़ी-बड़ी कांस्य मूर्तियों को ढालने की कला में भी प्रवीणता हासिल की।


चोलकालीन देवी-देवताओं की मूर्तियों में शैव प्रतिमाओं का बाहुल्य रहा है। फिर भी, वैष्णव प्रतिमाएँ भी पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हुई हैं। शैव प्रतिमाओं में नटराज एवं अर्द्धनारीश्वर की प्रस्तर प्रतिमाएँ उच्च कोटि की हैं। तंजोर और गंगैकोंडचोलपुरम के बृहदीश्वर मंदिरों में बड़ी सशक्त मूर्तियाँ हैं। इनमें तंजोर की सरस्वती की मूर्ति तथा गंगैकोंडचोलपुरम की नटराज की मूर्ति प्रमुख है। गंगैकोंडचोलपुर में सूर्य की एक मूर्ति है, जो कमलयंत्र के रूप में है और जिसे सात घोड़े खींच रहे हैं। इसमें सूर्य का पूरा परिकर तो है, किंतु सूर्य की कोई प्रतिमा नहीं है।


चोल कलाकार द्वारा निर्मित व्यक्तियों की मूर्तियों में प्रमाणित व्यक्तियों की मूर्तियों का अभाव है। वस्तुतः यह बात सभी भारतीय मूर्तियों के विषय में कही जा सकती है। इसका कारण यह है कि व्यक्तियों के यथार्थ अंकन की अपेक्षा टाइप का अंकन अपेक्षाकृत अधिक सरल होता है, किंतु चोलकालीन मूर्तियों में इसके कुछ अपवाद भी मिलते हैं। उदाहरणार्थ, श्रीनिवासनल्लूर में अवस्थित कोरंगनाथ मंदिर तथा कुंभकोणम में अवस्थित नागेश्वर मंदिर में ऐसी कई मूर्तियाँ हैं जो यथार्थ प्रतीत होती हैं। कुंभकोणम की मूर्तियों के विषय में अजीत घोष का मत है कि "यहाँ चोल कलाकार अपने पूर्ववर्ती पल्लवों से स्पष्ट ही पृथक् हैं। पल्लव कृतियाँ नितांत अव्यावहारिक, आदर्श प्रवण और पद्धतियों की चोरी है : ऊपरी दृष्टि से किसी पल्लव राजा और देवता में या किसी रानी और देवी में कोई अंतर नहीं है। किंतु चोल कलाकार की कल्पना में नवीनता और आकर्षण है।" नागेश्वर मंदिर से प्राप्त नारी मूर्तियों के विषय में अजीत घोष कहते हैं कि “ये चोल नारियाँ अत्यंत नयनाभिराम, आकर्षक मानव आकृतियाँ हैं। इनमें नारी सुलभ लावण्य और जीवन के प्रति उल्लास है। यह गहरा मानवीय गुण इस मंदिर के आलों में बनी प्रत्येक मूर्ति की विशेषता है। पारंपरिक होते हुए भी इस कला में ताजगी और मौलिकता है। यह मानवीयता दक्षिण भारतीय कला को चोलों की मुख्य देन है।" स्पष्टतः इन मंदिरों में उपलब्ध मूर्तियों की आकृति में विभिन्नता है। इससे पता चलता है कि ये अलग-अलग व्यक्तियों की मूर्तियाँ हैं। वस्त्रों, नारियों के केश विन्यास, पुरुषों और स्त्रियों के आभूषणों का अंकन आदि यह सिद्ध करते हैं कि संभवतः ये राजपरिवार के उन व्यक्तियों की मूर्तियाँ हैं, जिन्होंने मंदिरों में दान दिए ।


चोल राजाओं का शासनकाल कांस्य मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध हैं। अधिकांश कांस्य प्रतिमाएँ ढालकर बनाई गई हैं। तंजोर के अभिलेख में इसके बारे में तकनीकी जानकारी दी गई है। इससे संकेत • मिलता है कि कांस्य की कुछ मूर्तियाँ ठोस होती थीं और कुछ खोखली । चोल मूर्तिकारों ने धातुओं को ढालने की कला में उच्च कोटि की दक्षता प्राप्त की थी। कांस्य प्रतिमाओं में नटराज की मूर्तियों का प्रथम स्थान है। चोल मूर्तिकारों ने नटराज की कल्पना और उसकी अभिव्यक्ति में अद्भुत कुशलता हासिल की। इसके अतिरिक्त उन्होंने शिव के अन्य रूपों, ब्रह्मा, विष्णु और उनकी पत्नी लक्ष्मी, राम और सीता, कृष्ण तथा शैव संतों की भी कई कांस्य मूर्तियाँ बनाई। यद्यपि चोल कलाकारों ने मूर्तिकला की पारंपरिक रूढ़ियों का ही अनुसरण किया, किंतु 11वीं और 12वीं सदी में इन मूर्तिकारों ने अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता महसूस की और उनकी कृतियों में भी इस स्वच्छंदता की स्पष्ट छाप पड़ी ।


तमिल साहित्य में चोलकालीन चित्रों का उल्लेख हुआ है। इससे इनके बाहुल्य और चित्रकारों के कौशल का संकेत मिलता है। अधिकांश चोल चित्रों का विषय धार्मिक है। इनका मुख्य स्रोत वे संतचरित हैं जो बाद में पेरिय-पुराण के अंग बने। दुर्भाग्यवश, अधिकांश चित्र नष्ट हो चुके हैं और इसलिए चोलकालीन चित्रकला के विषय में कोई निश्चित धारणा नहीं बनाई जा सकती है।