कुलोत्तुंग-प्रथम (1070 ई.-1122 ई.) एवं उसके उत्तराधिकारी - दक्षिण भारतीय साम्राज्य : चोल साम्राज्य - Kulottunga-I (1070 AD-1122 AD) and his successors - South Indian Empire: Chola Empire

कुलोत्तुंग-प्रथम (1070 ई.-1122 ई.) एवं उसके उत्तराधिकारी - दक्षिण भारतीय साम्राज्य : चोल साम्राज्य - Kulottunga-I (1070 AD-1122 AD) and his successors - South Indian Empire: Chola Empire


अधिराजेंद्र संतानहीन था। उसकी मृत्यु के पश्चात् चोल साम्राज्य में असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई। ऐसी स्थिति में वेंगी के चालुक्य वंश के राजा राजेंद्र-द्वितीय चालुक्य यह दावा करके कि उसकी माता, अमंग देवी राजेंद्र प्रथम चोल की पुत्री थी, तंजोर में सिंहासनारूढ़ हो गया। इस प्रकार अधिराजेंद्र की मृत्यु के साथ ही मूल चोल राजवंश का अंत हो गया और चोल साम्राज्य पर वेंगी के पूर्वी चालुक्यों का अधिकार स्थापित हो गया। कुछ इतिहासकारों ने इस राजवंश को चोल-चालुक्य राजवंश कहा है। जिसका संस्थापक कुलोत्तुंग था। इसके साथ ही कुलोत्तुंग ने वेंगी के स्वतंत्र अस्तित्व को समाप्त कर उसे चोल राज्य का एक प्रांत बना दिया।


कुलोत्तुंग-प्रथम के शासनकाल में उसके सेनापति करूणाकर तौण्डैमान के नेतृत्व में चोल सेना ने कलिंग पर विजय प्राप्त की। चोलों की इस विजय का कोई स्थायी परिणाम नहीं निकला, किंतु इसने जयगोंदार की कविता 'कलिंगतुप्परणी के लिए एक विषय जरूर प्रदान किया।


कुलोत्तुंग एक शैव था। पर उसने नागपट्टम स्थित बौद्ध विहारों को उदारतापूर्वक अनुदान दिया था। फिर भी, वह वैष्णव संत रामानुज का विरोधी था, जिन्हें श्रीरंगम छोड़ने पर विवश होना पड़ा और मैसूर में होयसल बिट्टिग विष्णुवर्द्धन की शरण में जाना पड़ा।


कुलोतुंग-प्रथम का उत्तराधिकारी विक्रमचोल (1122-33 ई.) था। वह एक वैष्णव था, जिसके शासनकाल में रामानुज चोल राज्य में वापस आए। किंतु वह तथा उसके उत्तराधिकारी, कुलोत्तुंग-द्वितीय (1133-47 ई.), राजराज द्वितीय ( 1147-62 ई.), राजाधिराज द्वितीय ( 1162-78 ई.) तथा कुलोत्तुंग- तृतीय (1178-1216 ई.) कमजोर शासक सिद्ध हुए। उनके शासनकाल में चोलों की शक्ति का तेजी से ह्रास हुआ। कुलोत्तुंग-तृतीय के पुत्र एवं उत्तराधिकारी राजराज-तृतीय ( 1216-52) के शासनकाल में मारवर्मन सुंदर पांड्य द्वारा तंजोर पर अधिकार कर लिया गया और राजराजतृतीय को बंदी बना लिया। गया। राजराज तृतीय ने तत्कालीन होयसल राजा से मदद माँगी, तभी वह छूट सका।


1246 ई. में राजराज तृतीय एवं राजेंद्र- तृतीया के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया। इसका लाभ उठाकर द्वारसमुद्र के होयसलों, वारंगल के काकतीयों और मदुरै के पांड्यों ने चोल राज्य के अधिकांश क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। चोल राज्य का अंतिम शासक राजेंद्र तृतीय। (1257-1267 ई.) था, जिसके शासनकाल में जटावर्मन सुंदर पांड्य द्वारा चोल राज्य के विस्तृत भूभाग पर अधिकार कर लिया गया। इसके कुछ वर्ष बाद ही चोल राजवंश का सदा के लिए अंत हो गया।


प्रशासन एवं स्थानीय स्वशासन


चोल साम्राज्य का शासन प्रबंध राजतंत्रात्मक था किंतु इस काल में संगम युग की भाँति राज्य छोटे-छोटे नहीं थे,

जिनके राजा एक प्रकार से कबीलों के सरदार हुआ करते थे। राजराज - प्रथम और राजेंद्र प्रथम के शासनकाल में चोल राज्य ने एक साम्राज्य का रूप धारण कर लिया था। तदनुसार, राजतंत्र की संकल्पना में परिवर्तन हुआ। अब राजा किसी कबीले का सरदार न रहकर सम्राट था। यद्यपि राजकीय अभिलेखों में उसका उल्लेख 'उदैयार' के रूप में ही हुआ है, पर अपने सार्वजनिक जीवन में वह 'चक्रवर्तिगल' के रूप में जाना जाता था।


इतना ही नहीं, राजा को 'देवराज' मानकर देवता की भाँति उसकी पूजा और उपासना की जाने लगी। समाज में इस प्रथा को कई तरह से प्रोत्साहित किया गया।

सबसे पहले तो मृत राजाओं की उपासना पर बल दिया गया। दूसरे, ऐसे कई मंदिर बनवाए गए, जो वस्तुतः मृत राजाओं के स्मारक थे। इनके अतिरिक्त कई मंदिरों तथा उनमें स्थापित मुख्य प्रतिमा का नामकरण उन राजाओं के नाम पर किया गया, जिन्होंने उनका निर्माण करवाया था।


उपर्युक्त सभी तथ्य स्पष्ट संकेत देते हैं कि साम्राज्य युग में राजा की राजनीतिक प्रतिष्ठा में पहले की अपेक्षा काफी वृद्धि हो चुकी थी। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है

कि अब राज्याभिषेक ने एक भव्य समारोह का रूप धारण कर लिया था और इस अवसर पर राजवंश द्वारा अद्वितीय उदारता और दानशीलता का प्रदर्शन किया जाने लगा। चोल राजाओं ने इस समारोह का आयोजन अपनी राजधानी तंजोर के अतिरिक्त कांची एवं गंगैकोंडचोलपुरम में भी किया।


चोल राजवंश में उत्तराधिकार संबंधी विवाद अज्ञात नहीं थे यद्यपि सामान्य परिस्थिति में ज्येष्ठ पुत्र को ही राज्य का उत्तराधिकार प्राप्त होता था। जहाँ तक राजाधिराज प्रथम का संबंध है वह राजेंद्र- प्रथम का सबसे बड़ा पुत्र नहीं था,

बल्कि उसे उसकी योग्यता के कारण ही राजेंद्र प्रथम के द्वारा युवराज घोषित किया गया था। राजराज- प्रथम ने इस दिशा में एक नया प्रयोग किया। उसने अपने जीवनकाल में ही अपने उत्तराधिकारी को मनोनीत कर उसे प्रशासनिक कार्यों के साथ संबद्ध करने की परंपरा प्रारंभकी। बाद के राजाओं ने भी यह परंपरा जारी रखी, जिसके फलस्वरूप चोलों के इतिहास में उत्तराधिकार का युद्ध प्रायः नहीं के बराबर हुआ।


चोल राजा मौखिक आदेशों द्वारा अपनी भूमिका का निर्वाह करते थे। इन्हें 'तिरूवाक्य केल्वि कहते थे। किंतु इन आदेशों को प्राप्त करने और उन्हें कार्यान्वित करने से पूर्व एक विस्तृत प्रक्रिया का अनुपालन करना पड़ता था।

अभिलेखों से ज्ञात होता है कि राजा के निकट 'ओले' नामक अधिकारियों का एक वर्ग था। इन्हीं में से कोई एक राजा के मौखिक आदेश को लिपिबद्ध करता था। फिर इसकी जाँच 'ओलैनायगम' नामक अधिकारी के द्वारा की जाती थी, ताकि इसमें कोई लिपिकीय त्रुटि न रह जाए। इसके बाद यह आदेश राजकीय पंजियों में पंजीकृत होकर संबद्ध स्थानीय संस्थाओं के पास कार्यान्वयन हेतु भेज दिया जाता था। स्थानीय संस्थाओं को दिए जाने वाले ऐसे आदेशों को तिरूयुगम' अथवा 'श्रीमुख कहते थे।


चोल प्रशासन में राजगुरू की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका थी। वह लौकिक एवं धार्मिक मामलों में राजा का सलाहकार होने के साथ ही राजा का अंतरंग एवं पापस्वीकरण पुरोहित भी होता था।

अभिलेखों से ज्ञात होता है कि धार्मिक संस्थाओं के प्रबंध में राजा पूरी तरह अपने राजगुरू के परामर्श से ही कार्य करता था। उदाहरणार्थ, एक पुजारी की मृत्यु के पश्चात् तिरूक्कहैयूर के मंदिरों की पूजा के लिए कुलोत्तुंग ने एक वैकल्पिक व्यवस्था की थी किंतु उसके राजगुरू ने इसे पसंद नहीं किया। जब राजा को यह बात ज्ञात हुई तो उसने अपने आदेश को परिवर्तित कर उन लोगों की नियुक्ति की, जिनकी राजगुरू ने अनुशंसा की थी।


इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि राजा की सहायता के लिए स्थायी रूप से गठित कोई मंत्रिपरिषद थी। अभिलेखों से उड़न-कूट्टम' नाम की एक सभा के अस्तित्व का पता चलता है।

यह उन अधिकारियों की सभा थी, जो राज्य के मुख्य विभागों के प्रमुख थे और राजा के निकट रहकर उसे उसके कार्य-निष्पादन में सलाह देकर सहयोग करते थे। कुछ इतिहासकारों के अनुसार 'उडन- कूट्टम' अधिकारियों की सभा न होकर राजा के निजी सहायकों का समूह था, जो नियमित कर्मचारी तंत्र और राजा के बीच संपर्क का कार्य करता था।


अभिलेखों से पता चलता है कि राज्य के अधिकारियों की दो कोटियाँ थीं- 'पेरूंदरम और "शिरूदनम । उच्च अधिकारियों को पेरूंदरम' कहा जाता था, जबकि शिरूदनमः निम्न कोटि के अधिकारी थे।

सरकारी पद धीरे-धीरे आनुवंशिक होते गए और राज्य की सैनिक और असैनिक सेवा में कभी कोई भेद ही नहीं किया गया। हमें इस बात की कोई ठोस जानकारी नहीं है कि अधिकारियों की नियुक्ति और उनकी पदोन्नति की क्या पद्धति थी। नियुक्ति के समय वंश का महत्व अवश्य होता होगा। बाद में योग्यता और कार्यकुशलता पर विचार के पश्चात् पदोन्नति दी जाती रही होगी। राजकीय अधिकारियों को पारिश्रमिक के रूप में भूखंड दिए जाते थे। उस समय राजकोष से नगद वेतन देने की प्रथा नहीं थी किंतु, 'जीवित' के रूप में भूखंडों का स्वामित्व नहीं दिया जाता था। भूखंडों पर स्वामित्व उनके जोतने वाले या ग्राम समाज का होता था। केंद्रीय सरकार को उन भूखंडों से जो कर आदि ग्रहण करने का अधिकार होता था, 'जीवित' के रूप में वही अधिकार दिए जाते थे। कभी-कभी 'जीवित' में पूरा गाँव या जिला ही दे दिया जाता था।


प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से चोल साम्राज्य कई इकाइयों में विभक्त था। सबसे छोटी इकाई 'गाँव थी। कई गाँवों को मिलाकर 'कुर्रम या 'नाडु बनता था। कहीं-कहीं इसे ही कोट्टम' कहते थे।


कुछ अभिलेखों में 'तनियर शब्द का प्रयोग मिलता है। कहीं-कहीं इसके विकल्प में 'तन कुरू' जैसे शब्द मिलते हैं। इतिहासकारों के अनुसार, तनियुर अथवा 'तन कुरू एक बड़ा गाँव था जो 'कुर्रम' अथवा 'बाडु से मिलकर 'बनवाडु' बनता था। 'बनवाडु' से बड़ी इकाई मंडलम कहलाती थी। यह प्रांत के समान थी। राजराज के शासनकाल में इस प्रकार के आठ या नौ मंडलमों का उल्लेख है। इसमें लंका भी एक मंडलम् था। राजस्व प्रशासन


भूराजस्व, जिसका अभिलेखों में 'पुरवुवरि' के रूप में उल्लेख हुआ है, सरकार की आय का सर्वप्रमुख स्रोत था। भूमि संबंधी अधिकारों एवं बकायों का हिसाब रखने में सरकार द्वारा बहुत सावधानी बरती जाती थी। भूमि का अत्यंत सावधानी से सर्वेक्षण किया जाता था और उसे 'करमुक्त तथा "करयोग्य भूमि में वर्गीकृत किया जाता था। अभिलेखों में वरिष्पोत्तगम' और 'वरिप्पोत्तगम-कणक्कु' का उल्लेख हुआ है। ये राजस्व प्रशासन की महत्वपूर्ण पंजियाँ थीं। 'वरिप्पोत्तगम भूमि संबंधी स्वामित्व का अभिलेख था। पूरी जाँच-पड़ताल और बारीकी से सर्वेक्षण कराकर ये पंजियाँ तैयार की जाती थीं और इनमें दाखिल-खारिज के जरिए इन्हें हमेशा अद्यतन रखा जाता था।

'वरिप्पोत्तगम-कणक्कू' वह पंजी थी, • जिसका आधुनिक रूप राजस्व विभाग का हासिल बाकी रजिस्टर होता है। इतिहासकारों का मत है कि चोलों की राजस्व व्यवस्था में राजस्व का रिकार्ड रखने वाले कर्मचारियों और राजस्व वसूली करने और प्रशासन चलाने वाले कर्मचारियों के बीच स्पष्ट अंतर रखा गया था। उल्लेखनीय है कि भूराजस्व का निर्धारण गाँव को संपूर्णतः एक इकाई मानकर किया जाता था। यह स्पष्ट नहीं है कि भूराजस्व कुल उत्पाद का कितना भाग था। पर राजराज- प्रथम के समय में यह कुल उत्पाद का एक तिहाई भाग था। भूराजस्व का भुगतान सुविधानुसार नगद अथवा अनाज के रूप में किया जा सकता था।


भू-राजस्व के अतिरिक्त एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने वाली वस्तुओं पर पथकर लगता था। इसे 'वलि आयम' कहते थे। सरकार द्वारा विभिन्न पेशों पर भी कर लगाए जाते थे। उदाहरण स्वरूप बुनकरों, तेलियों और व्यापारियों को क्रमशः 'तरी इरई, 'शेक्करई' और 'सेट्टीरई' नामक कर देने पड़ते थे। 'वेट्टि' जिसे उत्तर भारत में 'विष्टि' कहते थे, बेगार था। घरों एवं विवाह जैसे समारोहों पर भी कर लगते


सैन्य व्यवस्था


एक कुशल राजस्व व्यवस्था की तरह चोलों की सेना भी अत्यंत दक्ष थी। अभिलेखों में सेना के कई रेजिमेंटों के नाम आए हैं, किंतु सर्वाधिक महत्वपूर्ण सैन्य दल के रूप में 'आनैयाट्कल', 'कुडिरेन्जेवर' तथा 'कैक्कोलार का उल्लेख किया गया है।

इनसे क्रमशः गजसेना, घुड़सवार सैनिक तथा पैदल सेना का बोध होता था। इसके अतिरिक्त धनुर्धरों की भी एक रेजिमेंट थी, जिसका उल्लेख अभिलेखों में 'विल्लिगल के रूप में किया गया है। वैलेक्कारर को राजा की सेवा में नियुक्त सबसे विश्वसनीय सैनिक माना जाता था। वे अपनी जान देकर भी राजा और उसके हितों की रक्षा के लिए तत्पर रहते थे। 'वैलेक्कारर' के ही समकक्ष और इसी कार्य के लिए 'तेन्नवन आपत्तुदविगले थे, जो परवर्ती पांड्य राजाओं के यहाँ होते थे। इनके बारे में मार्को पोलो ने लिखा है कि ये सदा राजा के निकट रहते थे और राज्य में इन्हें बड़े अधिकार मिले थे। चोलों की एक सशक्त नौसेना थी। इसका प्रमाण लंका और मालदीव में चोल राज्य की स्थापना तथा चीनी साहित्य से मिलता है,

जिसमें चोलों के कई दूतमंडलों के चीन जाने का उल्लेख है। राजेंद्र ने श्रीविजय और उसके अधीनस्थ राज्यों पर अपनी विजय एक विशाल जलसेना की बदौलत ही दर्ज की थी।


अभिलेखों से पता चलता है कि चोल सेना समूचे प्रदेश में छोटे-छोटे गुल्मों और कड़गमों' में रहती थी। 'कडगम (छावनी) के उल्लेख से ऐसा प्रतीत होता है कि सेना को समय-समय पर युद्ध का अभ्यास कराया जाता था। कुछ इतिहासकारों का मत है कि सेना नागरिक कार्यों में भी गहरी रुचि लेती थी। इस बात के पर्याप्त प्रमाण है कि सैनिक अलग-अलग अथवा सामूहिक रूप से मंदिरों की रक्षा करने के अतिरिक्त उनके लिए 'अक्षयनिधियों का प्रबंध करते थे।


न्यायिक व्यवस्था


अधिकांश न्यायिक कार्यों का निष्पादन स्थानीय स्तर पर ही जैसे ग्राम न्यायालयों द्वारा कर लिया जाता था। बड़े विवाद राजा के दरबार में लाए जाते थे। कुछ अभिलेखों में 'धर्मासन' शब्द का उल्लेख हुआ है। इतिहासकारों का मत हैं कि यह राजा का दरबार था जहाँ बड़े विवादों के निपटारे किए जाते थे। प्रथा, दस्तावेज एवं गवाहों को साक्ष्य के रूप में स्वीकृति प्राप्त थी। विशेष परिस्थितियों में अग्नि- परीक्षा का भी आश्रय लिया जाता था। राजद्रोह को एक गम्भीर अपराध माना जाता था और इसका निपटारा स्वयं राजा के द्वारा ही किया जाता था। अपराध सिद्ध होने पर संपत्ति जब्त की जाती थी, अथवा मृत्युदंड दिया जाता था। साधारण अपराधों के लिए जुर्माने तथा कारावास का प्रावधान था। स्थानीय व्यवस्था


स्थानीय स्वशासन चोल प्रशासन की विशिष्टता थी। अब तक चोलों के सैकड़ों अभिलेख प्रकाश में आ चुके हैं, जिनसे विदित होता है कि चोलों ने एक सुदृढ़ ग्राम- प्रशासन का विकास किया। उनके गाँवों ने जिस मात्रा में स्वायत्तता का उपयोग किया, वह प्राचीन भारतीय इतिहास के लिए अद्वितीय है। चोल अधिकारी गाँव के कार्यों में प्रशासक से अधिक सलाहकार और पर्यवेक्षक के रूप में भाग लेते थे। गाँवों का प्रबंध गाँववासियों के द्वारा ही किया जाता था। निश्चय ही इस प्रकार की व्यवस्था एकाएक अस्तित्व में नहीं आई होगी। नीलकंठ शास्त्री का मत है कि तमिल प्रदेश में इस प्रकार की व्यवस्था की नींव आठवीं और नवीं सदी के प्रारंभ में पल्लव और पांड्य राजाओं के समय में रखी गई। उल्लेखनीय है कि मानूर नामक स्थान से प्राप्त एक अभिलेख, जो 800 ई. का है, मानूर में व्याप्त ग्रामजीवन का जो चित्र उपस्थित करता है, वह बहुत कुछ उत्तरमेरूर से प्राप्त परांतक प्रथम के समय के अभिलेख में चित्रित ग्राम जीवन से साम्य रखता है।


गाँव का प्रशासन ग्राम सभाओं के माध्यम से चलता था। ये सभाएँ दो प्रकार की थीं। एक को "उर' कहते थे और दूसरे को 'सभा' या महासभा । एक तीसरे प्रकार की सभा भी थी, जिसे 'नगरम् ' कहते थे, यद्यपि उर' और 'सभा की तुलना में अभिलेखों में इसके उल्लेख कम हैं। 'नगरम् व्यापारियों की प्रधान सभा थी। ये सभाएँ स्थानीय लोगों की सभाएँ थीं और सामान्य रूप से इनका संबंध उन सभी कार्यों से था, जो सार्वजनिक ढंग के होते थे। राज्य के अधिकारी इनकी सामान्य निगरानी करते थे, विशेषकर समय-समय पर इनके हिसाब-किताब की जाँच-पड़ताल करते थे। अन्यथा ये अपने क्रियाकलापों में पूर्णतः स्वायत्त होती थीं।


इन सभाओं में उर सबसे सरल प्रकार की सभा थी। यह गाँव के सभी वयस्क पुरुषों की सभा थी। कुछ गाँवों में एवं सभा, दोनों साथ-साथ पाए जाते थे। बड़े गाँवों में दो 'उर पाए जाने का भी प्रमाण प्राप्त हुआ है। 'सभा' या महासभा के विषय में अभिलेखों में बड़े विस्तृत विवरण मिलते हैं। यह गाँव के ब्राह्मणों का संगठन था। इसका अस्तित्व वैसे गाँवों में भी था, जो 'चतुर्वेदिमंगलम्' अथवा विशुद्ध रूप से ब्राह्मणों के गाँव थे। इनमें से अनेक राजा द्वारा प्रदत्त 'अग्रहार' गाँव थे।


'उर' और 'सभा' अपनी कार्यकारी परिषदों के माध्यम से कार्य करती थीं। 'उर' की कार्यसमिति को 'आलुंगणम' तथा 'सभा की कार्यसमिति को वारियम' कहते थे।

मद्रास से 80 कि. मी. दक्षिण- पश्चिम में अवस्थित उत्तरमेरूर नामक स्थान से प्राप्त अभिलेखों से ग्राम सभा की कार्य पद्धति के विषय में पर्याप्त जानकारी मिलती है। यह ब्राह्मणों का गाँव था, जो आज भी मौजूद है। इस गाँव के पश्चिम में करीब दो मील छू सिंचाई का एक तालाब है। यही तालाब उत्तर मैसूर के चोल अभिलेख में उल्लिखित वैरामेघ तड़ाग है, जिसपर सभा ने विशेष ध्यान दिया था। उन दिनों सभा ने इसका प्रबंध करने के लिए एक विशेष समिति बना दी थी जिसे एरि वारियम कहते थे। उत्तरमेरूर की सभा के विषय में जितनी जानकारी उपलब्ध है, उतनी किसी अन्य सभा के बारे में नहीं। किंतु अभिलेखों में 'वारियम के उल्लेख बराबर आए हैं।

इससे यही संकेत मिलता है कि अन्य सभाएँ भी खास खास कार्यों के लिए 'वारियम का गठन करती थीं। उदाहरण के लिए अभिलेखों में पंचवार वारियम का उल्लेख हुआ है, जो गाँव के सामान्य प्रबंधन से संबद्ध समिति थी। इसी प्रकार मंदिरों के प्रबंधन खेतों में पानी के वितरण और बाग-बगीचों के रखरखाव के लिए सभाओं ने विभिन्न समितियों का गठन किया था।


उत्तरमेरूर अभिलेखों से ज्ञात होता है कि कार्यसमितियों के सदस्यों का चुनाव पर्चियाँ निकालकर करने की व्यवस्था की गई थी। इसके लिए संपूर्ण गाँव को कई कुटुंब अथवा वार्डों में विभक्त किया गया था।

किंतु चुनाव उन्हीं व्यक्तियों में से किया जाता था, जिन्हें एक निश्चित नियम के अनुसार कुटुंब मनोनीत करते थे। इसके लिए केवल उन्हीं व्यक्तियों का चयन किया जाता था, जो इसके लिए निर्धारित शर्तें पूरी करते हों। विशेष परिस्थिति में सदस्यों को कार्य समितियों की सदस्यता के लिए अयोग्य भी घोषित किया जा सकता था। यदि कोई व्यक्ति पिछले तीन वर्षों में किसी समिति का सदस्य रहा हो तो उसे पुनः किसी समिति का सदस्य नहीं बनाया जाता था। इसी प्रकार, सदस्यता के दौरान लेखा-जोखा प्रस्तुत करने में यदि कोई सदस्य असफल रहता अथवा चोरी जैसे अपराधों में संलिप्त पाया जाता, तो उसे समिति की सदस्यता से वंचित कर दिया जाता था।


कार्यसमितियों के सदस्यों को कोई पारिश्रमिक अथवा मानदेय नहीं दिया जाता था किंतु इनकी सहायता के लिए कुछ वेतनभोगी कर्मचारी अवश्य रखे जाते थे। ये ही ग्राम सभा के हिसाब-किताब और अन्य दस्तावेज रखते थे। इन कर्मचारियों को मध्यस्थ कहते थे। मध्यस्थ का अर्थ समझौता करने वाला होता है, किंतु चोल अभिलेखों में इस शब्द का प्रयोग इस अर्थ में नहीं हुआ है। इनके लिए इस शब्द का प्रयोग इसलिए हुआ है, क्योंकि वे गाँव की राजनीति में तटस्थ रहते थे। वे सभा की बैठकों में उपस्थित रहते थे और कार्यवाही चलाने में मदद करते थे, किंतु वे स्वयं किसी वादविवाद में भाग नहीं लेते थे। सभा उनके पारिश्रमिक और कर्तव्यों का निर्धारण करती थी।


सभाओं का कार्यक्षेत्र अत्यंत विस्तृत था। उन्हें गाँव की भूमि का स्वामी माना जाता था और वे नई भूमि को कृषि योग्य बनाकर उसपर अपना अधिकार स्थापित कर सकती थीं। केंद्र सरकार के लिए भूराजस्व के साथ-साथ अन्य करों का संग्रह भी इन्हीं सभाओं के द्वारा किया जाता था और भूराजस्व का भुगतान न होने की स्थिति में वे किसानों को उनकी जमीन से बेदखल कर सकती थी। इन सभाओं की शक्ति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि ग्राम सभाएँ राजा से अनुमोदन प्राप्त किए बिना भी भूराजस्व में छूट दे सकती थीं। इसके अतिरिक्त गाँव की सभाएँ गाँवों के सार्वजनिक हित के कार्यों के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से नए कर भी लगा सकती थीं।

अभिलेखों में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब इन सभाओं ने तालाब अथवा धर्मशाला (अंबलम् ) के निर्माण तथा धार्मिक कार्यों के लिए नए कर लगाए। सभा द्वारा लगाए और संग्रह किए गए इन करों का लेखा-जोखा राज्य के लिए संग्रह किए गए राजस्व से पृथक रखा जाता था। इन विषयों में केंद्र सरकार के पास अपने अभिलेख तो होते ही थे, गाँव की सभाओं की भी अपनी भूमि की पंजी (निलमुदल) और कर-पंजी (पोत्तगम) होती थी। न्याय-व्यवस्था में भी सभा की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। वे दोषियों को सजा दे सकती थीं। गाँव का न्यायाधिकारी लोगों से जो जुर्माने वसूल करता था, उसका इस्तेमाल किसी सार्वजनिक कार्य के लिए होता था। गाँव की सभी अक्षयनिधियाँ सभाओं के अधीन होती थीं।

उनकी निगरानी का कार्य उन्हीं के द्वारा होता था। कभी-कभी तो एक ही गाँव में इतनी निधियाँ होती थीं कि इनके प्रबंध के लिए अलग से एक समिति, 'धर्म वारियम' बनाने की आवश्यकता पड़ जाती थी।


नीलकंठ शास्त्री ने इन गाँवों को 'लघु गणतंत्र' कहा है, जिन्हें अपने कार्यों में स्वायत्तता प्राप्त थी। इसका एक महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि प्रशासन के शीर्ष स्तर में तो परिवर्तन होते रहे, किंतु इससे ग्रामीण संस्कृति अप्रभावित रही और तमिल प्रदेश में दीर्घकाल तक सांस्कृतिक तारतम्यता बनी रही।