मेटरनिख व्यवस्था ( 1815-1848) - Metternich system (1815–1848)

मेटरनिख व्यवस्था ( 1815-1848) - Metternich system (1815–1848)


यूरोपीय राजनीति में अपने प्रभुत्व के कारण 1815 ई0 से 1848 ई0 तक की अवधि को मेटरनिख का युग माना जाता है। इस अवधि में मेटरनिख का सर्वप्रमुख उद्देश्य वियना कांग्रेस द्वारा यूरोप में स्थापित राज्य-व्यवस्था को बनाए रखना था। प्रारंभ से ही मेटरनिख के संस्कार क्रांतिकारी भावनाओं के विरुद्ध थे। वह क्रांति के विचारों को एक संक्रामक रोग मानता था। उसे प्रजातांत्रिक विचार एक ज्वालामुखी की भाँति प्रतीत होते थे और यही कारण है कि उसने जीवन पर्यंत निरंकुश एवं राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था का पक्ष लिया।


1809 ई0 में ऑस्ट्रिया का चान्सलर बनने के पश्चात् मेटरनिख ने अपनी प्रतिक्रियावादी नीति का प्रयोग प्रारंभ किया।

ऑस्ट्रिया के साम्राज्य में विभिन्न राष्ट्रिकों का निवास था। उनकी अपनी-अपनी भाषा तथा संस्कृति थी। समाज तथा अर्थव्यवस्था में सामंतों एवं पादरियों को उच्च स्थान प्राप्त थे जबकि कृषकों एवं श्रमिकों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। ऐसी स्थिति में मेटरनिख ने अपनी नीतियों को ऐसा रूप दिया ताकि राष्ट्रवाद के बीज पल्लवित एवं पुष्पित न हो सकें और पुरातन व्यवस्था कायम रहे।


मेटरनिख जानता था कि यूरोप के देशों में राष्ट्रवादी एवं उदारवादी आंदोलनों की आधारशिला रखी जा चुकी थी जिनका उद्देश्य शासकों को एक उदार एवं राष्ट्रीय संविधान देने हेतु बाध्य करना था।

जर्मनी में बुद्धिजीवियों एवं इटली में कारबोनरी नाम की एक संस्था के नेतृत्व में सशक्त जन आंदोलन जन्म ले चुके थे। ऑस्ट्रिया का साम्राज्य कई राष्ट्रिकों का निवास स्थान था। इसलिए यूरोप में कहीं भी एक राष्ट्रीय एवं उदार संविधान जारी करने का सीधा असर ऑस्ट्रिया पर भी पड़ता। यही कारण है कि मेटरनिख किसी भी कीमत पर ऑस्ट्रिया में क्रांतिकारी भावनाओं का प्रसार नहीं होने देना चाहता था। उसने प्रशा के साथ मिलकर जर्मनी में भीषण दमनात्मक कार्रवाइयाँ की। 1819 की कार्ल्सबैंड घोषणा के परिणामस्वरूप उसने जर्मनी में उदारवादी तत्वों के विरुद्ध सफलतापूर्वक विजय पाई।


वियना कांग्रेस की समाप्ति के पश्चात् उसके निर्णयों को स्थायी रखने तथा यूरोप में उदारवादी तत्वों का दमन करने हेतु उसने यूरोपीय कन्सर्ट का नेतृत्व किया। अपनी वैदेशिक नीति में उसने हमेशा राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था का पक्ष लिया। यदि यूरोप के किसी भी भाग में राजतंत्रात्मक व्यवस्था के विरुद्ध जन आंदोलन होते तो उन्हें दबाना वह अपना परम कर्तव्य समझता था।


मेटरनिख व्यवस्था एक दीर्घ अवधि तक कायम रही और यूरोप में शांति बनी रही। परंतु यह शांति ऊपरी थी। अंदर ही अंदर संपूर्ण मध्य यूरोप में जन आंदोलनों की अग्नि सुलग रही थी।

मेटरनिख की प्रतिक्रियात्मक नीति से सभी त्रस्त थे। 1848 ई0 में ऑस्ट्रिया में उसके विरुद्ध प्रदर्शन होने लगे। पार्लियामेंट ने भी उसका विरोध करना प्रारंभ कर दिया। अन्य कोई विकल्प न देखकर मेटरनिख को अपने पद का त्याग करना पड़ा। वह इंग्लैंड भाग गया जहाँ रहकर उन तत्वों का अंत देखता रहा जिन्होंने राष्ट्रवाद, समानता एवं उदारवाद के सिद्धांतों से संघर्ष किया था। सच ही कहा गया है कि मेटरनिख का पतन एक व्यक्ति का पतन नहीं, बल्कि उस सारी व्यवस्था का पतन था जिसने एक लंबे समय तक प्रजातंत्रात्मक व्यवस्था को अवरुद्ध कर रखा था।