1970 से 1990 ई. तक स्वायत्त महिला आंदोलन - Autonomous women's movement from 1970 to 1990 AD

1970 से 1990 ई. तक स्वायत्त महिला आंदोलन - Autonomous women's movement from 1970 to 1990 AD


80 के दशक में स्वायत्त महिला आंदोलन का मजबूत प्रभाव रहा है। इसका प्रारंभ प्रगतिशील महिला संगठन द्वारा 1975 में हैदराबाद में दहेज उत्पीड़न के विरुद्ध आंदोलन के माध्यम से होता है। आपातकाल के दौरान संगठन और उनके कार्यकर्ता भूमिगत हो गए। आपातकाल के बाद महिला आंदोलन सक्रिय हुआ और पुनः दहेज हत्या के विरोध में आंदोलन तेज हुआ। इस बार उसका केंद्र दिल्ली था। दिल्ली में दहेज हत्या की घटनाओं की बाढ़ सी आ गयी थी। ढेरों मासूम लड़कियाँ दहेज की माँग पूरी न करने के कारण स्टोव से जला दी गई। स्त्री संघर्ष मंच के अंतर्गत जहाँ कई कॉलेज के विद्यार्थियों और शिक्षकों ने दहेज हिंसा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, वहीं दिल्ली के संगठन महिला दक्षता समिति ने दहेज हत्या के खिलाफ लोगों को एकत्र किया और दोषियों का सामाजिक बहिष्कार करने की मुहिम चलाई।

इस हेतु कई दोषियों के घर के सामने बड़े धरने दिए गए। विद्याथियों और संगठन के कार्यकर्ताओं के सहयोग से नुक्कड़ नाटक सैंकड़ों स्थानों पर खेले गए। इसमें ओम स्वाहा और मुलगी झाली आहे सबसे प्रसिद्ध हैं। इन सभी के प्रभाव से दहेज हत्या हेतु कानून में भी बदलाव लाया गया। कानूनी बदलाव में बलात्कार विरोधी आंदोलन का भी बड़ा योगदान रहा है। चंद्रपुर की मथुरा बागपत की माया त्यागी और हैदराबाद की रमीज़ा बी के साथ पुलिस वालों द्वारा किए गए बलात्कार ने देश भर की महिलाओं को फिर से इकट्ठा किया और पुलिस कस्टडी में हुए बलात्कार के विरोध में आंदोलन तेज हुआ। मथुरा बलात्कार केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से महिलाओं के एक बड़े समूह को बहुत आपत्ति हुई।

जब मामला कोर्ट में गया तो अपराधियों को यह कहकर छोड़ दिया गया कि चूंकि मथुरा का संबंध विवाह से पहले से ही किसी पुरुष मित्र के साथ बन चुका था, साथ ही उसके शरीर पर चोटों के निशान नहीं थे, अतः यह संबंध बलात्कार नहीं कहा जाएगा बल्कि सहमति से बना संबंध है। उस समय के जाने माने वकील उपेंद्र बक्शी, लोतिका सरकार आदि ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को एक कड़ा खुला पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने अपनी आपत्ति दर्ज करते हुए लिखा कि किसी भी स्त्री के विवाह पूर्व यौन संबंध इस बात की छूट नहीं दे देते कि कोई भी उसके साथ यौन हिंसा करने को आज़ाद है। दूसरी बात शरीर पर चोटों के निशानों का अभाव पीड़िता को डराने-धमकाने, उसके परिवार को हानि पहुँचाने आदि के धमकी के कारण भी हो सकता है।

उन्होंने यह भी लिखा कि आधी रात में पुलिस स्टेशन की लाईट बंद करके मथुरा को अंदर क्यों रोके रखा गया?, जबकि उसके परिजनों को पुलिस स्टेशन के बाहर ही रोक दिया गया। यह पत्र 16 सितंबर 1979 को लिखा गया था। इस पत्र के बाद महिला आंदोलनकारियों ने सक्रिय होकर बलात्कार के विरुद्ध मुहिम छेड़ दी और कानून के ढीले ढाले रवैये को कटघरे में खड़ा किया, जिसके कारण पीड़िता कोर्ट में अपमान सहती है और आरोपी [ जाते छूट हैं। यह आंदोलन काफी लंबे समय चला। इस आंदोलन के बाद बलात्कार की परिभाषा और कानून और सजा में कई अहम बदलाव किए गए। मुम्बई का फोरम अर्गेस्ट रेप ने मथुरा की सहमति लेकर इस आंदोलन को सक्रियता से उठाया यह आंदोलन महिला आंदोलन के इतिहास में प्रमुखता से दर्ज किया गया।


इस प्रकार 80 के दशक में कई बड़े आंदोलन महिलाओं ने चलाए, जिसमें शाहबानो केस और रूपकुंवर केस भी महत्वपूर्ण रहे। ये दोनों आंदोलन दो दृष्टियों से खास थे। एक तो रूढिवादी महिलाएँ इस आंदोलनों के विरोध में भी उतरीं और उन्होंने महिला होने से ज्यादा अपने धर्म और समुदाय के सदस्य के रूप में अपनी भूमिका को ज्यादा तवज्जोह दी। दूसरी इन मुद्दों के माध्यम से महिला आंदोलन को ये समझ में आने लगा कि आगे आने वाले समय में उन्हें धर्मांधता और धार्मिक उन्माद जैसी बातों से लोहा लेना पड़ेगा। 1985 ई. के पर्सनल लॉ के मुद्दे के अंतर्गत 1978 ई. के शाहबानो केस में 75 वर्षीय मुस्लिम महिला शाहबानो को उसके वकील पति द्वारा तलाक दे दिया गया और मेहर के नाम पर न्यूनतम राशि देकर उससे किनारा कर लिया।

इस उम्र में शाहबानो के सामने जिंदा रहने का संकट खड़ा हो गया। अतः उसने धारा-125 के तहत अपने पति से गुजारे भत्ते की माँग की। पति का कहना था कि उसने इस्लामिक रीतिरिवाज से शादी की है। अतः मेहर देने के बाद वह किसी भी तरह के गुजारे भत्ते की जिम्मेदारी से मुक्त है। शाहबानो की हालत को देखते हुए समान नागरिक संहिता का मुद्दा खड़ा हुआ क्योंकि महिला आंदोलनकारियों का मानना था कि धर्म महिलाओं को पुरुषों की तुलना में बहुत ही सीमित संसाधन मुहैया कराता हैं, जिससे महिलाओं की स्थिति पुरुषों की तुलना में काफी दयनीय रहती है। समान नागरिक संहिता के मुद्दे को महिला आंदोलन ने 1985 ई. में काफी तेज किया,

ताकि देश की हर महिला को समानता और मानवीय अधिकार, संविधान और न्यायिक व्यवस्था द्वारा प्राप्त हो सके, लेकिन इस केस के फैसले के माध्यम से महिला अधिकार को मुस्लिम समुदाय और मुस्लिम पुरुषों पर एक बड़े हमले के एक प्रतीक के रूप में बदल दिया गया। दरअसल उसी समय चल रहे बाबरी मस्जिद मुद्दे के साथ शाहबानो मुकदमे को एक साथ जोड़ कर इसे भारतीय मुसलमानों पर हिंदू सांप्रदायिकता के जबरदस्त हमले के रूप में देखा गया। तमाम मुस्लिम उलेमाओं ने इस पर फतवे जारी किए। इसकी व्याख्या उन्होंने इस्लाम खतरे में है, कह कर की। मुस्लिम महिलाएँ भी अपने धर्म और उसके अधिकारों की सुरक्षा के लिए बोलना शुरू कर दीं,

जो मुस्लिम नेता समान नागरिक संहिता की वकालत कर रहे थे, इस जुड़ाव के बाद उन्होंने भी अपने हाथ पीछे खींच लिए और महिला आंदोलन को भी समान नागरिक संहिता के परिणामों को ठीक से समझने हेतु इससे हाथ वापस लेने पड़े, क्योंकि समान नागरिक संहिता से बहुसंख्यकवाद के प्रभाव और अल्पसंख्यकों के हाशियाकरण से वे सहमत नहीं थीं क्योंकि बाबरी मस्जिद के मुद्दे के माध्यम से वे हिंदुत्व के बढते हुए उन्माद को भी देख रही थीं। वे किसी भी स्तर पर महिला आंदोलन को अल्पसंख्यकों के हाशियाकरण को बढाने वाली किसी भी मुहिम का हिस्सा नहीं बनने देना चाहती थीं। इस तरह समान नागरिक संहिता से हटकर उनका झुकाव निजी कानूनों में सुधार की तरफ हुआ।


इसी प्रकार देवराला की 21 वर्षीय स्नातक रूप कुँवर की केस और उस पर हुआ आंदोलन भी काफी चर्चित रहा। रूप कुँवर को उसके पति की मृत्यु के बाद जबरन सती कर दिया गया था। जब इसका विरोध महिला मंचों द्वारा किया गया और इस विरोध ने आंदोलन की शक्ल ले ली, तब परंपरा की रूढिवादी व्याख्या करने वाली दक्षिणपंथी महिलाओं ने भी इन महिलाओं के विरोध में आंदोलन प्रारंभ कर दिए। उनका कहना था कि एक हिंदू औरत के रूप में हमें अपनी मान्यताओं, परंपराओं और रीति- रिवाज मनाने का पूरा अधिकार है। उन्होंने प्रगतिशील महिला आंदोलन के नारे "हम भारत की नारी हैं, फूल नहीं चिंगारी हैं' को अपना कर इसे स्त्री के सती होने के पक्ष में इस्तेमाल किया। इस आंदोलन ने परंपरा और आधुनिकता के नाम पर बड़ी बहस खड़ी की। प्रगतिशील आंदोलनकारियों को पश्चिम के विचारों से प्रभावित महिलाएँ कहा गया, जिन्हें भारतीय संस्कृति की समझ नहीं है। इस प्रकार कई प्रकार के हमले महिला आंदोलनकारियों ने झेले।


हम देखते हैं कि 80 के पूर्वाद्ध से ही ऐसे मुद्दे उठने लगे थे, जिन्हें महिला आंदोलन ने अपनाया और 80 के दशक में उस पर बड़े आंदोलन और बहसें खड़ी कीं। इन बहसों ने राजनीति, कानून, अकादमिक जगत, फिल्म, मीडिया, साहित्य सभी पर बड़ा प्रभाव डाला। इस पूरे दौर में ऐसे धारावाहिक, फिल्में, साहित्य रचे गए, जिन्होंने महिलाओं की आवाज को मुखर किया। महिलाओं के हित में कई महत्वपूर्ण कानून इसी दौर में बने। यह दौर स्वायत्त महिला आंदोलन वयस्क होने का भी रहा। आंदोलन के अतिरिक्त स्वायत्त संगठनों ने ऐसे केंद्रों की स्थापना की, जहाँ पीड़ित महिलाओं को कानूनी सहायता, घर से निकाले जाने पर शरण और कुछ छोटे रोजगारों की मदद मिल पाए, ताकि परिवार से एकदम सड़क पर आ जाने के बाद उनकी स्थिति को थोड़ा संभाला जा सके। इन संगठनों ने लोगों में महिला पुरुष की समानता के लिए जागरुकता लाने के भी काफी प्रयास किए। इन संगठनों के नाम सहेली, सखि, आली, जागोरी जैसे रखे गए थे, जिससे महिलाओं के बीच आपसी मित्रता, बहनापे के साथ संघर्ष का सामना एक साथ करने का भी भाव जागृत हो सके।