1990 ई. से अब तक स्वायत्त महिला आंदोलन - Autonomous women's movement since 1990 AD
1990 ई. से अब तक स्वायत्त महिला आंदोलन - Autonomous women's movement since 1990 AD
इस दौर में अगर महिला आंदोलन की बात करें, तो हमें एक लंबी फेहरिश्त महिलाओं के संघर्षो की कहानी मिलती है। इस दौर की इन तीनों प्रमुख समस्याओं भूमंडलीकरण सांप्रदायिकता और जातिगत उत्पीड़न पर महिला आंदोलन ने ध्यान केंद्रित किया है। भूमंडलीकरण और उसकी नीतियाँ महिला आंदोलन की आलोचना का प्रमुख केंद्र रही हैं। भूमंडलीकरण की नारीवादी आलोचना जहाँ जेंडर और विकास का राजनैतिक अर्थशास्त्र की सैद्धांतिकी के रूप में सामने आयी, वहीं इससे उपजी समस्याओं पर महिलाएँ सड़कों पर भी उतरीं। इस दौर की खासियत रही कि महिला आंदोलन ने अपना दायरा अत्यंत विकसित करके सारे मुद्दे महिलाओं के मुद्दे का नारा दिया।
इसके पीछे समस्याओं की संरचना व उसका आधार समझने का प्रयास है। विस्थापन विरोधी आंदोलन, बड़े बांध विरोधी आंदोलन महिला श्रमिक संगठनों के काम की स्थितियों को लेकर आंदोलन काफी मजबूती से उभरे। जल, जंगल जमीन, पर्यावरण इत्यादि की विदेशी कंपनियों से सुरक्षा के लिए भी महिलाएँ एक जुट होकर सामने आई।
भूमंडलीकरण से जुड़े हुए अन्य मुद्दों में एक महत्वपूर्ण मुद्दा स्वास्थ्यगत नीतियों को लेकर भी उठा, खासतौर पर स्त्री के शरीर पर स्त्री के अधिकार का। जनसंख्या नियंत्रण के लिए तमाम तरह की दवायें, इंजेक्शन और इंप्लान्ट करने वाले तरीकों को भारत भेजा गया, ये सारे तरीके स्त्रियों के लिए ही थे। इसमें क्विनक्रीन,
डेपो प्रोवेरा और नार प्लाण्ट प्रमुख थे। इन सारे ही साधनों का पहले पशुओं पर कोई अध्ययन नहीं किया गया था। सीधे सीधे तृतीय देशों की महिलाओं पर सीधे इसका प्रयोग शुरू कर दिया। महिलाओं के शरीर पर जो खतरनाक प्रभाव पड़ रहे थे, उसकी कोई चर्चा नहीं थी। इनके प्रयोग से स्त्रियों की प्रजनन क्षमता भी खत्म हो रही थी। कैंसर के खतरों का भी भय था। साईड एफेक्ट्स की तो कोई गिनती ही न थी । ऐसी स्थिति में 27 से 30 अक्टूबर, 1998 ई. के बीच जब दिल्ली में सातवीं अतंरराष्ट्रीय प्रजनन प्रतिरक्षण विज्ञान कार्यकम हो रही थी, तो विभिन्न वैज्ञानिक व अन्य लोगों द्वारा महिला विरोधी परियोजनाओं का विरोध करने के लिए महिला कार्यकर्ता वहाँ पहुँचे और उन्होंने स्त्रियों के शरीर पर पड़ने वाले हानिकारक प्रभावों से इन लोगों को अवगत कराया।
इस अभियान में दिल्ली की सहेली नामक संगठन की भूमिका प्रमुख थी। सहेली समूह ने जनसंख्या नियंत्रण, हानिकारक और खतरनाक गर्भ निरोधन प्रक्रिया के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मुहिम का गठन किया। खासतौर पर गर्भाधान को एक रोग या बीमारी मानना तथा उसके प्रतिरोध रूप, शरीर में प्रतिरक्षण उत्पन्न करना, इस मूल सिद्धांत की मुखालफत महिला आंदोलन द्वारा की गई।
ये दौर दलित महिला आंदोलन की दृष्टि से भी याद रखा जाएगा। दलित स्त्रीवादियों की महिला आंदोलन से एक शिकायत थी कि उन्होंने जाति के मुद्दे को अपने आंदोलन का हिस्सा नहीं बनाया। इन समूहों ने भारत में जातिगत असमानता और एक दलित महिला के ऊपर जाति,
ariant-alternates: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-numeric: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">वर्ग और पितृसत्ता द्वारा तिहरे शोषण की बात की। ये समूह जाति के साथ-साथ भूमंडलीकरण के विरोध में भी उतरा, क्योंकि इससे विस्थापन, कृषि का हास जैसी समस्याएं सामने आई, जिन्होंने प्रत्यक्ष रूप से खेतों में काम करने वाली श्रमिक महिलाओं को प्रभावित किया, जो कि अधिकांश दलित थीं। national federation of Dalit women ने अपनी बहस में जाति, जेंडर और उसके भूमंडलीय पूँजी के साथ संबंधों पर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। इसी बहस के साथ दलित आंदोलन व महिला आंदोलन के बीच अंतर्संबंधों का भी विकास हुआ। भवरी देवी केस में महिला आंदोलन का बड़ा जुड़ाव हमें दिखता है।
हिंसा के अन्य रूपों में राज्य के द्वारा की जाने वाली हिंसा का विरोध काफी मुखर रूप से हमें कुछ खास जगहों पर मिलता है। छत्तीसगढ़, मणिपुर आसाम,
गुजरात और भी तमाम जगहों पर राज्य द्वारा की जाने वाली हिंसा में महिलाओं का खास केंद्रित किया गया है। महिलाओं पर होने वाले क्रूर बलात्कारों के विरोध में 2005 ई. में मणिपुरी महिलाओं का नग्न प्रदर्शन हम कभी नहीं भूल सकते हैं। आसाम में नागा मदर्स एसोसिएशन और मणिपुर में मेइरा पेइबिस दोनों ही संगठनों की महिलाएँ जहाँ राज्य द्वारा महिलाओं को प्रताड़ित करने का विरोध कर रही थीं, वहीं वे अपने ही राज्य के उग्रवादी संगठनों द्वारा राज्य की महिलाओं पर की जाने वाली हिंसा के खिलाफ भी लड़ रहीं थी। नागा मदर्स एसोसिएशन "shed no more blood" की महिलाओं का कहना था कि हम माँ हैं और हमारे किसी भी बच्चे की तकलीफ हम सहन नहीं करेंगे।” छत्तीसगढ़ महिला मुक्ति मोर्चा की महिला श्रमिकों ने भी
आदिवासी महिलाओं पर राज्य द्वारा होने वाले दमन के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद की। राज्यद्वारा प्रायोजित हिंसा के अंतर्गत सांप्रदायिक दंगों को भी शामिल करना होगा। गोधरा के दो इसका बड़ा उदाहरण हैं। भले ही प्रत्यक्ष रूप से राज्य ने महिलाओं पर हिंसा न की हो, पर हिंदूवादी संगठनों को महिलाओं पर बलात्कार की खुली छूट देकर उसने अप्रत्यक्ष रूप से अपनी भूमिका निभाई। तमाम महिला समूहों ने पीड़ित लोगों के साथ बात करके अपनी रिपोर्ट दी, जो बच्चियों और महिलाओं के ऊपर की गई बर्बर यौनिक हिंसा को सामने लेकर आए। महिलाओं के ऊपर की जाने वाली भयानक हिंसा की वास्तविकता आने के बाद ही गुजरात का दंगा गुजरात का नरसंहार बना,
क्योंकि महिलाओं के शरीर पर बलात्कार को एक हथियार बनाकर पूरी नस्ल को खत्म करने का कोशिश की गयी थी। लगभग कुछ ऐसी ही स्थितियाँ हमने मुजफ्फरनगर दंगों में भी देखी, जिसमें कई प्रभावशाली राजनेता शामिल थे। यहाँ भी अल्पसंख्यक महिलाएँ हिंसा की जबर्दस्त शिकार हुई और बहुसंख्यक महिलाओं ने इस हिंसा को समर्थन दिया और नारा दिया गया “बहु बनाओ बेटी बचाओ"। इन घटनाओं ने महिला आंदोलन को हिंसा में बहुसंख्यक महिलाओं की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हिंसा में भागीदारी के सवाल उठाए हैं,
जिनके जवाब तलाशने की एक बड़ी कोशिश स्त्री मुद्दों से जुड़े लोगों ने की है। महिला आंदोलन ने यौनिकता के मुद्दे को भी जोर शोर से उठाया। धारा-377 को हटाना, समलैंगिक संबंधों को मान्यता और उन्हें एक सुरक्षित व गरिमामय जीवन के लिए महिला आंदोलन ने अनवरत प्रयास किए हैं। खासतौर पर यौनिकता पर बातचीत करने का तात्पर्य “फ्री सेक्स" लगाया जाता था, उसे और स्पष्ट किया कि यौनिकता से तात्पर्य असल में यौन संबंधों के बीच सत्ता संबंध और मानवीय गरिमा है। जिस समय फायर फिल्म के प्रदर्शन को लेकर शिवसेना उग्र विरोध कर रहा था, उस समय यौनिकता के तमाम मुद्दों को लेकर महिला आंदोलन के कार्यकर्ता सामने आए। इसके बाद मुंबई की बार डांसर्स को ये कहकर निकाला जाना कि वे युवा पीढ़ी के लिए नैतिक खतरा उत्पन करेंगी,
पर यौन कर्म पर किसी तरह की पाबंदी न होना, एक तरह से बार बालाओं को देह व्यापार की ओर धकेलने का प्रयास था, जो उनकी विवशता और हाशिए की स्थिति को और अधिक बढ़ा देता है। इस मुद्दे पर भी महिलाओं ने आंदोलन करके बार बालाओं को काम करने का अधिकार व सुरक्षित कार्यस्थल उपलब्ध कराने की माँगे रखीं। वेश्यावृति को यौन कर्म कहने की बहस भी इस दौर की उपज है। ऐसे ही और भी कई आंदोलन प्रभावशाली रहे, जैसे:- महिला आरक्षण, संपत्ति के अधिकार खाप पंचायत की हिंसा के विरुद्ध आंदोलन आदि। इस प्रकार 80 के दशक के आंदोलन 90 में परिपक्व रणनीतियों के साथ उपस्थित थे।
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