इस्लाम तथा खिलाफत का उदय (2) - Rise of Islam and the Khilafat
इस्लाम तथा खिलाफत का उदय (2) - Rise of Islam and the Khilafat
(2) नीरून पर अधिकार
देवल विजय से मुहम्मद बिन कासिम के उत्साह में वृद्धि हुई। अब वह और आगे बढ़ा। भारत में अनेक स्थानों पर लोगों ने धन आदि देकर अपने जीवन तथा स्वतंत्रता की रक्षा की। इसके उपरांत वह नीरून पहुँचा। वहाँ की रक्षा का भार राजा दाहिर के पुत्र जयसीस के हाथ में था। राजा दाहिर ने उसे अपने पास बुला लिया था। दुर्ग का भार एक ब्राह्मण पुरोहित को सौंप दिया गया था। बिना किसी प्रकार का विरोध किए ही उसने मुसलमानों को दुर्ग समर्पित कर दिया। मुहम्मद बिन कासिम ने वहाँ एक मुसलमान गवर्नर नियुक्त किया और स्वयं अपनी सेना लेकर आगे बढ़ा। राजा दाहिर ने रावर की रक्षा की भी कोई विशेष व्यवस्था नहीं की और मुसलमानों का अधिकार इस महत्वपूर्ण नगर पर भी हो गया।
(3) ब्राह्मनाबाद पर अधिकार
मुहम्मद बिन कासिम मार्ग के नगरों तथा दुर्गों को लूटता हुआ ब्राह्मनाबाद की ओर बढा, जहाँ राजा दाहिर उसका सामना करने की तैयारी कर रहा था। उसने वहाँ एक विशाल सेना तैयार की थी। राजा दाहिर ने 50,000 सैनिक एकत्रित किए। 712 ई. में मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध नदी पार की। दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। युद्ध के बीच में राजा दाहिर को एक तीर लगा और वह हाथी से गिर गया। वह तुरंत घोडे पर सवार होकर युद्ध करने लगा। शीघ्र ही मुसलमानों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। उस पर तीरों की बौछार होने लगी।
वह पृथ्वी पर गिर गया। एक मुसलमान ने अपनी तलवार के वार से उसके दो दुकड़े कर दिए। उसकी मृत्यु से सेना हतोत्साहित हो गई। कुछ समय तक युद्ध चलता रहा। अंत में हिदुओं की पराजय हुई। उसकी पत्नी रानी बाई ने भी कुछ समय तक मुसलमानों को रोकने का प्रयास किया, किंतु उसको भी सफलता प्राप्त नहीं हुई। सिंध का प्रदेश मुसलमानों के अधिकार में आ गया। ब्राह्मनाबाद के युद्ध के संबंधमें इलियट का मत है कि “यहाँ एक ऐसा भयंकर युद्ध हुआ जो कि पहले कभी नहीं सुना गया था।" इस युद्ध से मुहम्मद बिन कासिम को राजा दाहिर की पत्नी लाड़ी तथा दो पुत्रियाँ सूर्यदेवी और परमालदेवी प्राप्त हुई। रानी ने उससे विवाह कर लिया तथा दोनों पुत्रियों को खलीफा के पास भेज दिया।
(4) अरोर पर अधिकार
ब्राह्मनाबाद से निवृत्त होने पर मुहम्मद बिन कासिम ने अरोर की ओर प्रस्थान किया। वह भी शीघ्र उसके अधिकार में आ गया।
(5) मुल्तान की विजय
अरोर की उचित व्यवस्था करने के उपरांत वह मुल्तान की ओर अग्रसर हुआ। उसने मार्ग के कई दुर्गों पर विजय प्राप्त की और उन पर मुसलमानी पताका फहराई। हिंदुओं ने मुहम्मद बिन कासिम को आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया, किंतु वह विजयी होता हुआ तथा नगरों को लूटता हुआ आगे बढ़ते चला गया। कुछ समय पश्चात् वह मुल्तान पहुँचा। उसने मुल्तान के दुर्ग का घेरा डाला। हिदुओं ने मुसलमानी सेना का वीरता से सामना किया, किंतु मुसलमानों ने दुर्ग का जल बंद कर दिया। जल की कमी के कारण सैनिक हतोत्साहित हो गए और उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। मुहम्मद बिन कासिम ने समस्त सैनिकों को बंदी बनाकर उनकी हत्या करवा डाली।
उन नागरिकों को भी मौत के घाट उतार दिया गया जिन्होंने इस्लाम स्वीकार करना अथवा जजिया देने से इंकार कर दिया था। किंतु जिन्होंने जजिया देना स्वीकार किया उनके साथ अच्छा व्यवहार किया गया। इस विजय के पश्चात् उसने भारत के प्रसिद्ध राज्य कन्नौज पर आक्रमण करने की योजना तैयार की, किंतु इस योजना को पूरा करने से पहले उसके जीवन का अंत हो गया। 3.1.6.4. मुहम्मद-बिन-कासिम की मृत्यु
मुहम्मद बिन कासिम का जिस द्रुतगति से उत्थान हुआ उसी द्रुतगति से उसका पतन भी हो गया। उसका अंत बड़ा दुःखद था। कहा जाता है कि मुहम्मद बिन कासिम ने राजा दाहिर की दो पुत्रियों को खलीफा के पास भेंटस्वरूप भेजा।
जब वे कन्याएँ उसके सामने उपस्थित की गई तो उन्होंने खलीफा से प्रार्थना की कि वे उसके योग्य नहीं हैं; क्योकि मुहम्मद बिन कासिम ने खलीफा के पास भेजने से पूर्व ही उन्हें भ्रष्ट कर दिया था। खलीफा ने इस समाचार को सुनते ही आदेश दिया कि मुहम्मद बिन कासिम को कच्ची खाल में सी कर हमारे सामने उपस्थित किया जाए। जब मुहम्मद बिन कासिम के पास खलीफा की आज्ञा पहुँची तो उसने उसका विरोध नहीं किया और अपने आपको कच्ची खाल से सिलवा दिया। तीन दिन के पश्चात् उसकी मृत्यु हो गई। खलीफा ने उस खाल को राजा दाहिर की कन्याओं के सामने खुलवाया। उस समय उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने यह कार्य अपने पिता के वध का बदला लेने के लिए किया था।
खलीफा को उन पर बड़ा क्रोध आया और उसने आज्ञा दी कि दोनों को घोड़ों की पूँछ से बँधवाकर उस समय तक घसीटा जाए जब तक उनके प्राणों का अंत न हो जाए और उसके आदेशानुसार ऐसा ही किया गया।
कुछ विद्वान इस कथा की सत्यता में विश्वास नहीं करते। उनका कथन है कि मुहम्मद बिन कासिम की मृत्यु राजनीतिक कारणों से हुई। खलीफा उसकी बढ़ती हुई शक्ति तथा प्रतिष्ठा के कारण उससे द्वेष करने लगा था। उसी समय पुराने खलीफा के स्थान पर उसका भाई सुलेमान खलीफा बना। वह हज्जाज तथा उसके संबंधियों को घृणा की दृष्टि से देखता था। उसने उसके साथ कठोर व्यवहार किया। मुहम्मद बिन कासिम हज्जाज का चचेरा भाई और दामाद था। अतः मुहम्मद बिन कासिम को खलीफा की आज्ञा से बंदी बनाया गया और उसको इतना कठोर दंड दिया गया कि केवल तीन दिन के पश्चात् ही उसकी मृत्यु हो गई।
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