स्त्री शिक्षा की उपलब्धि - एक नई स्त्री - Achievement of Women's Education - A New Woman

स्त्री शिक्षा की उपलब्धि - एक नई स्त्री - Achievement of Women's Education - A New Woman


नवजागरण काल में स्त्रीशिक्षा को लेकर किये गए प्रयासों और प्रयोगों का परिणाम और सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसने स्त्री-व्यक्तित्व का संपूर्ण पुनर्गठन कर डाला. धीरे-धीरे शिक्षा ने स्त्री के व्यक्तित्व का कायापलट करना शुरू किया तथा माँ और पत्नी के अतिरिक्त एक स्वायत्त व्यक्ति इकाई के रूप में उसका विकास करना शुरू किया. इससे एक 'नई स्त्री का जन्म हुआ. यह नई स्त्री अपने स्वयं के प्रति अपने परिवार, समाज, वर्ग, राष्ट्र इत्यादि के प्रति सचेत और तार्किक व्यक्ति का प्रतिरूप थी. इस नई स्त्री का अविर्भाव लाला देवराज के स्त्रीशिक्षा के क्षेत्र में किये गए प्रयासों और प्रयोगों के परिणामस्वरूप सम्भव हुआ.


लाला देवराज के प्रयासों और प्रयोगों के परिणामस्वरूप जिस नई स्त्री का जन्म हुआ, उसकी


निम्नलिखित विशेषताएँ उभरकर सामने आई और रेखांकित की गई- 


1. स्त्री एक व्यक्ति' है. उसकी अपनी एक अस्मिता है. स्त्री को अपने एक व्यक्ति होने और अपनी अस्मिता की पहचान निरंतर होनी चाहिए. 


2. स्त्री की सार्थकता सिर्फ माँ बनने में नहीं है.


3. परिवार एवं समाज में स्त्री की पारम्परिक भूमिका की धारणा अब पुरानी पड़ चुकी है अतः त्याज्य है.


4. स्त्री केवल भावनाओं, आवेगों, आज्ञाकारिता इत्यादि का पुलिंदा नहीं है बल्कि वह आत्मनिर्णय की क्षमता से भरी एक बुद्धिमत्तापूर्ण कार्यकर्ता भी है. समाज तथा राष्ट्र के कार्यक्रमों में उसकी समान भागीदारी और दायित्व है.


5. स्त्री दोयम दर्जे का नागरिक नहीं है, 'स्त्री बनाई जाती है' सम्बन्धी धारणा खारिज, 16. स्त्री एक स्वतंत्रचेता, विवेकवान व्यक्ति अस्तित्व; जो पुरुष के साथ समानता के स्तर पर आत्मविश्वासपूर्ण तरीके से पेश आ सकती है. वह एक दब्बू क्रियेचर नहीं. 7. पितृसत्ता का अस्वीकार और लैंगिक आधार पर भेदभाव की स्थितियों का अस्वीकार,


जैसा कि कहा गया इस नई स्त्री के अस्तित्व के अविर्भाव का श्रेय लाला देवराज के स्त्रीशिक्षा के क्षेत्र में अपने स्कूल तथा बाद में कॉलेज के मार्फ़त किए गए प्रयासों और प्रयोगों को जाता है.

इस संबंध में डॉ. मधु किश्वर ने इसकी ठीक-ठीक पहचान करते हुए अपने एक लेख में यह उचित ही लिखा था कि- "यह स्कूल न रहकर एक आंदलनों बन गया था जिसने 19वीं सदी के पश्चिमी शिक्षा प्राप्त तमाम सुधारकों के स्त्री सम्बन्धी आदर्श 'विक्टोरियन वुमेन' की सीमाएँ पर कर लीं. स्त्री का नया आदर्श स्कूल की पत्रिका 'पांचाल पंडिता' में छपने वाली कल्पित खियों की कहानियों के जरिए पेश किया जाता था जिसमें एक ऐसी स्त्री की छवि उभारी जाती थी जो शरीर से स्वस्थ है, बुद्धिमान है और पुरुषों के साथ स्वतंत्रतापूर्वक और आत्मविश्वास के साथ बातचीत करती है XXxX स्कूल की सबसे बड़ी उपलब्धि थी लड़कियों के अन्दर अपने व्यक्ति होने की, अपनी पहचान की, भावना पैदा कर देना xxx स्कूल की स्त्रीशिक्षा ने परिवार और समाज में स्त्री की परंपरागत भूमिका की धारणा को ठुकरा दिया और स्त्री की एक नई धारणा पेश की कि स्त्री की सार्थकता सिर्फ माँ बनने में नहीं है.” (किश्वर, मधु आर्यसमाज एंड वुमेन्स एजूकेशन : कन्या महाविद्यालय जालन्धर; इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली, बम्बई; वोल्यूम 21; इश्यु नं. 17; 26 अप्रैल, 1986; पृष्ठ ).