अमेरिका का प्रथम विश्वयुद्ध में प्रवेश - America's entry into World War I
अमेरिका का प्रथम विश्वयुद्ध में प्रवेश - America's entry into World War I
तटस्थता
प्रथम विश्वयुद्ध के प्रारंभ होने पर यूरोपीय देश इसमें शामिल होते जा रहे थे। ऐसे समय में मात्र अमेरिका ही ऐसा देश था, जिसने 4 अगस्त, 1914 को युद्ध के दौरान तटस्थता की घोषणा की।
अमेरिका इस समय अपने व्यापार पर ध्यान दे रहा था। तटस्थ रहते हुए भी दो कारणों से उसकी
सहानुभूति मित्र राष्ट्रों के साथ थी।
युद्ध काल में अमेरिका की नीति-
(1) अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में फ्रांस ने उसकी मदद की थी।
(2) अमेरिका के अधिकांश निवासी इंग्लैंड मूल के ही थे।
मित्र राष्ट्र अमेरिका से काफी संख्या में अस्त्र-शस्त्र एवं अनाज खरीद रहे थे। अमेरिका के जहाज माल लादकर मित्र राष्ट्रों को पहुँचाते थे। इस व्यापार से अमेरिका अत्यंत लाभान्वित हो रहा था। अमेरिका के साथ पांचों ऊँगलियाँ घी में और सिर कढ़ाई में" की कहावत चरितार्थ हो रही थी।
जर्मनी का यू वोट अभियान
जर्मनी ने एक नई प्रकार की पनडुब्बी यू वोट का निर्माण किया। यह पनडुब्बी पानी के अंदर से ही सतह पर तैर रहे जहाज को डुबा देती थी।
1915 में जर्मनी ने इंग्लैंड की आर्थिक नाकाबंदी की साथ ही चेतावनी दी कि जो भी जहाज इस निषिद्ध क्षेत्र में प्रवेश करेगा उसे नष्ट कर दिया जाएगा। अमेरिका ने प्रत्युत्तर में चेतावनी दी कि यदि जर्मनी ने तटस्थ अमेरिका के जहाजों को नुकसान पहुँचाया तो गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे।
अमेरिकी जहाजों को नुकसान
जर्मनी ने 'आ बैल मुझे मार' की कहावत पर अमल करते हुए अमेरिकी जहाजों को डुबो दिया, 7 मई, 1915 को यह घटना हुई।
जर्मन 'यूवोंट' पनडुब्बियों ने लूसितानिया (Lusitania) नामक अमरीकी जहाज को डुबो दिया। इसमें कुल 128 यात्री मारे गए जिनमें 112 अमरीकी यात्री थे।
अमेरिका का युद्ध में प्रवेश
चूँकि जर्मनी द्वारा डुबाये गए जहाज में कोई सामग्री नहीं थी। अतः उसका डुबाया जाना अंतरराष्ट्रीय नियम के विरुद्ध था। 3 फरवरी, 1917 को अमेरिका ने जर्मनी से संबंध तोड़ लिए। परंतु अभी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन युद्ध में शामिल होने से हिचकिचाते रहे।
परंतु जर्मनी की गलत नीतियों के कारण अंततः 6 अप्रैल, 1917 को अमेरिका ने मित्र राष्ट्रों के पक्ष में युद्ध में प्रवेश कर लिया। इससे मित्र राष्ट्रों की स्थिति मजबूत हो गई।
केंद्रीय शक्तियों की हार के कारण
प्रथम विश्वयुद्ध में एक ओर केंद्रीय शक्तियाँ, जर्मनी, आस्ट्रिया, तुर्की, बल्गारिया, हंगरी आदि थे तो दूसरी ओर मित्र राष्ट्र इंग्लैंड, फ्रांस एवं रूस आदि थे। इटली यद्यपि त्रिगुट का सदस्य था मगर 3 मई 1915 को उसने त्रिगुट से निकल जाने की घोषणा कर दी।
23 मई 1915 को वह मित्र राष्ट्रों की ओर मिल कर केंद्रीय शक्तियों के विरुद्ध युद्ध में शामिल हो गया। तुर्की के केंद्रीय शक्तियों की ओर मिलने से • मित्र राष्ट्रों की जो स्थिति कमजोर पड़ी थी, उसकी कमी इटली ने मित्र राष्ट्रों के साथ मिलकर पूरी कर दी। युद्ध के आरंभ में केंद्रीय शक्तियों का पलड़ा भारी था, मगर जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ा वैसे-वैसे मित्र राष्ट्रों की स्थिति मजबूत होने लगी।
अमेरिका एक लंबे अरसे से पृथकता की नीति पर चल रहा था। प्रथम विश्वयुद्ध के आरंभ होने पर उसने तटस्थता की घोषणा की थी।
परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनी कि अमेरिका तटस्थ नहीं रह सका। अंग्रेज़ी जहाज 'लुसितानिया पर 1200 यात्री सवार थे, जिसमें 124 यात्री अमेरिका के थे। 7 मई 1915 को यह जहाज ज्यों ही अमेरिका से चल कर आयरलैंड के दक्षिणी किनारे पर पहुँचा जर्मन पनडुब्बियों ने टारपीडो द्वारा उसको उड़ा दिया। सारे यात्री जहाज सहित समुद्र में समा गए। अमेरिका ने जर्मनी को कड़ी चेतावनी दी कि भविष्य में ऐसा न हो। जर्मनी ने उस चेतावनी की परवाह किए बिना मार्च 1916 में पुनः एक जहाज को टारपीडो द्वारा उड़ा दिया। अमेरिका ने पुनः चेतावनी दी। जर्मनी ने भविष्य में ऐसा न करने का आश्वासन दिया। जनवरी 1917 में जर्मनी ने घोषणा की कि इंग्लैंड के इर्द-गिर्द किसी जहाज को छोड़ा नहीं जाएगा।
जर्मनी ने जब अपनी घोषणा पर अमल आरंभ किया तो अमेरिका ने 3 फरवरी 1917 को जर्मनी के साथ अपने कूटनीतिक संबंध तोड़ लिए। 6 अप्रैल 1917 को अमेरिका ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।
अमेरिका के युद्ध में प्रवेश करते ही दक्षिण अमेरिका के कई देश युद्ध में शामिल हो गए। स्याम, चीन, साइबेरिया एवं ब्राजील भी मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध में शामिल हो गए। इस तरह मित्र राष्ट्रों की शक्ति अत्यंत बढ़ गई। केंद्रीय शक्तियों की स्थिति इससे कमजोर पड़ गई, और अंततः केंद्रीय शक्तियों को परास्त होना पड़ा।
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