स्वायत्त महिला आंदोलन - autonomous women's movement

स्वायत्त महिला आंदोलन - autonomous women's movement


स्वायत्त महिला आंदोलन महिलाओं के उन आंदोलनों को कहा जाता है, जो किसी भी राजनैतिक पार्टी से स्वायत्त होते हैं और वे महिलाओं के मुद्दों को प्राथमिकता में रखते हुए अ आंदोलनों की रणनीति तय करते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी अपनी कोई विचारधारा नहीं होती। ये आंदोलन प्रगतिशील विचारधारा के समर्थक रहे हैं। स्वायत्त महिला आंदोलन के अगुआ मुख्यतः प्रगतिशील, वामपंथी पार्टियों से अलग हुई वे महिलाएँ थीं, जो पार्टी की राजनैतिक गतिविधियों से जुड़ाव रखती थीं, किंतु वे इन पार्टियों के भीतर व्याप्त पितृसत्तात्मक व्यवहार एवं कार्यशैली से बेहद आहत थीं। इन संगठनों में माना जाता था कि महिलाओं की समस्याओं को अलग से उठाने की या चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है।

वर्गगत असमानता दूर होते ही महिलाओं के साथ होने वाला भेदभावपूर्ण व्यवहार भी स्वयं ही समाप्त हो जाएगा। उनका यह भी मानना था कि महिलाओं के मुद्दे पर संगठन के भीतर बात करना संगठन को कमजोर कर सकता है। इन संगठनों में शामिल महिलाओं ने इस पर सवाल खड़े किए तथा संगठन के कार्यकर्ताओं के व्यवहारों को भी कटघरे में लाया। बहुत से कार्यकर्ता ऐसे भी थे, जो दुनिया में समानता की बातें तो पुरजोर तरीके से करते थे, परंतु अपने घर पहुँचते ही वे अपनी पत्नियों के साथ छोटी बड़ी बातों पर मार-पीट किया करते थे। इसके साथ ही महिलाएँ आंदोलन की पारंपरिक शैली से भी सहमत नहीं थीं, जहाँ एक व्यक्ति ही नेता हो और उसके नेतृत्व में ही सारे कार्यकर्ता चलें,

जहाँ समूह के रूप में मुद्दे निर्धारित करने की संभावनाएँ कम हों। वे ज्यादा विकेंद्रीकृत संगठन पर विचारकर कर रही थीं, जिसमें किसी नेता के बगैर, सामूहिक रूप से फैसले लिए जा सकें और जिम्मेदारियों को बारी-बारी से लोगों को दिया जाए। सामूहिक निर्णय संगठन में महिलाओं की नेतृत्व में भूमिका, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के सवाल, श्रमिक के रूप में महिलाओं के पुरुषों से समान वेतन अधिकार, अन्य सुरक्षाओं आदि पर जब महिला कार्यकर्ताओं को अपने सवालों के जवाब संगठन के भीतर नहीं मिले, तो उन्होंने अपने सवालों के जवाब प्राप्त करने और समस्याओं के समाधान हेतु महिलाओं ने अपने संगठन बनाए। इन संगठनों ने महिलाओं को केंद्र में रखकर उनकी समस्याओं पर विचार किया और अपनी माँगों को लेकर वे सड़कों पर उतरीं। ये आंदोलन किसी राजनैतिक संगठन से सीधे तौर पर नहीं जुड़े थे,

अतः इन्हें स्वायत्त महिला संगठन कहा गया। 70 के दशक में इन आंदोलनों ने महिलाओं के जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाने और खियों की स्थिति को केंद्र में रखकर उस पर विचार करने की परंपरा को प्रारंभ करने में आधारभूत भूमिका निभाई।


इन संगठनों ने सर्वप्रथम महिलाओं के विरुद्ध हिंसा का मुद्दा उठाया और पितृसत्तात्मक व्यवस्था को इसके प्रमुख कारण के रूप में चिह्नित भी किया। इससे पहले के आंदोलनों में महिलाओं के दोयम दर्जे की बात तो की गई, पर उसका समाधान महिलाओं को बेहतर शिक्षा, रोजगार देने और विकास में महिलाओं को शामिल करने तक ही था। यह कभी नहीं महसूस किया गया कि महिलाओं की दोयम दर्जे की स्थिति में संरचनागत भेदभाव एक बड़ा कारण है,

जो पितृसता के कारण पैदा और विकसित किया जाता रहा है। 


उद्भव एवं विकास


स्वायत्त महिला आंदोलन का उद्भव 70 के दशक में महिलाओं द्वारा किया गया। आज़ादी के आंदोलन में महिलाओं की सहभागिता को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने महिलाओं के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएँ बनाने की शुरुआत की, जो महिलाओं को लाभ दे सकें। 1953 में केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड का गठन किया गया, जिसके माध्यम से ऐसे प्रयास प्रारंभ किए गए जो महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, पोषण, परिवार नियोजन आदि से संबंधित समस्याओं का निदान कर सके। इन योजनाओं हेतु सरकार ने अनुदान की भी व्यवस्था की। इस हेतु ऐसी महिलाओं को भी जोड़ा गया जो महिलाओं के मुद्दों पर सक्रियता से काम करने में रुचि रखती थीं।

नर्सरी स्कूलों के लिए शिक्षिका का प्रशिक्षण एवं भर्ती, लघु उद्योग धंधों में उनकी भागीदारी आदि के माध्यम से उनके आर्थिक विकास की राहें भी सुदृढ करने का प्रयास किया जा रहा था। शहरों में शिक्षा की बेहतर सुविधा और औद्योगिक क्रांति ने शहरी महिलाओं को शिक्षा और रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराएँ। महिलाएँ घरेलू कामकाज के साथ-साथ अपनी आर्थिक जिम्मेदारियों का भी निर्वहन करने लगीं। महिलाओं के भीतर यह बात उतरने लगी थी कि इन प्रयासों से वे घर और रोजगार दोनों को संभाल सकती हैं और इससे उनकी स्थिति दिनोंदिन बेहतर होती जाएगी। उनके सामने स्त्रियों के साथ होने वाले संरचनात्मक भेदभाव की समझ बहुत स्पष्ट नहीं थी।

यह मोहभंग 60 के बाद टूटने लगा। इस दौर में आर्थिक अस्थिरता का दौर प्रारंभ हो गया। किसानों के बीच जमीन के अधिकार, जमींदारों द्वारा किया जाने वाला शोषण, फसल का सही मूल्य न मिलने, कृषि के गिरते हालात, महंगाई में वृद्धि जैसे हालातों के कारण बेचैनी बढ़ने लगी थीं। उनके संघर्ष भी प्रारंभ हो गए थे जिसे कई संगठनों ने समर्थन भी दिया। किसानों के संघर्ष और उन्हें समर्थन देने वाले संगठनों को समाप्त करने के लिए राज्य सरकार ने पुरजोर दमनकारी कोशिशें कीं। इससे कई संगठन भूमिगत भी हो गए। बढ़ी महंगाई से सारी जनता त्रस्त थी। इसी दौरान संयुक्त राष्ट्रसंघ ने भारत सरकार को भारतीय स्त्रियों की दशा का अध्ययन करने का कार्य सौंपा। इस हेतु कमिटी ऑन स्टेटस ऑफ वीमेन इन इंडिया का गठन किया गया,

जिसकी अध्यक्षता डॉ. फूलरेणू गुहा द्वारा की गई। इस कमेटी ने देश भर की महिलाओं का अध्ययन करके 1974 ई. में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट का नाम टूवाईस इक्वैलिटी ( समानता की ओर था। इस रिपोर्ट में महिलाओं की शैक्षिक, सामाजिक, रोजगार, स्वास्थ्यगत आदि स्थितियों का अध्ययन प्रस्तुत किया गया। रिपोर्ट में बालिका शिशु दर में बड़ी गिरावट की जानकारी मिली। मातृ मृत्युदर में वृद्धि, विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करने वाली छात्राओं की संख्या में गिरावट, संगठित क्षेत्रों के रोजगार में महिलाओं की बेहद कम संख्या और असंगठित क्षेत्रों में कड़ी मेहनत वाले कार्यों में महिलाओं की बढी संख्या महिलाओं के श्रम और प्रजनन के शोषणकारी हालातों को बता रही थी। रिपोर्ट ने सरकारी प्रयासों की वास्तविकता को सामने लाकर रख दिया, जिससे पता चला कि स्त्री पुरुष असमानता कम नहीं हुई है,

बल्कि बहुत ज्यादा बढ़ गयी है। इस रिपोर्ट पर तमाम महिलाओं जिनमें शिक्षक, वकील, पत्रकार, सामाजिक संगठनों की कार्यकर्ता और विद्यार्थी शामिल थे, ने गम्भीर चर्चा प्रारंभ की। जहाँ पित्रसत्ता के सामाजिक ढाँचे और संरचना को बहस के केंद्र में लाया गया जिसके कारण महिलाएँ लगातार हाशियाकरण का शिकार हो रही हैं, वहीं राज्य सत्ता के पितृसत्तात्मक चरित्र पर भी उंगली उठी। वामपंथी महिला कार्यकर्ताओं ने इसे मुद्दे को भी पुरजोर तरीके से उठाया कि उनके अपने राजनैतिक संगठन के भीतर भी महिलाओं के मुद्दों को कभी केंद्रीयता प्रदान नहीं की जाती, बल्कि वे पार्टी की एकता और अखंडता बचाने के नाम पर हमेशा हाशिए पर रखे जाते हैं। अतः महिलाओं के मुद्दों को केंद्र में रखने के लिए महिलाओं के स्वायत्त आंदोलन का उद्भव हुआ।

इस दौर में जो स्त्री संगठन बने वे आज़ादी से पहले की तुलना में भिन्न थे। ये संगठन राष्ट्रीय स्तर के नहीं थे बल्कि स्थानीय स्तर के थे और महिलाओं से संबंधित ठोस मुद्दों को लेकर सक्रिय थे। माओवादी स्त्रियों के संगठन प्रगतिशील स्त्री संगठन के निर्माण के साथ स्त्रियों की स्थिति और उत्पीड़न के विश्लेषण की शुरुआत हो गई। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1975-1985 ई. तक को अंतरराष्ट्रीय महिला दशक घोषित किया गया। 8 मार्च मनाने की शुरुआत के साथ आंदोलन का बिगुल बजा। इस दौरान महिलाओं के मुद्दों पर काम और विचार करने के लिए गैर सरकारी संगठनों को भी अनुदान मिलना प्रारंभ हो गया और उन्होंने भी महिलाओं से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर सक्रियता से काम करना शुरू कर दिया। आपातकाल के बाद स्वायत्त महिला आंदोलनों ने कमान मजबूती से संभाली और बलात्कार, दहेज हत्या, सती प्रथा, समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर लामबंदी की। उनके प्रयासों ने सामाजिक और कानूनी स्तर पर महिलाओं के हक में बड़े बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।