प्रथम विश्वयुद्ध के कारण - because of the First World War
प्रथम विश्वयुद्ध के कारण - because of the First World War
जर्मन सम्राट केसर विलियम द्वितीय की अव्यवहारिक विदेश नीति के कारण समस्त यूरोप 2 गुटों में विभाजित हो गया। इन गुटों के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता ईर्ष्या एवं अविश्वास ने विश्व को प्रथम विश्वयुद्ध की ज्वाला में झोंक दिया। दो गुटों में विभाजित यूरोप में कुछ देशों के मध्य अत्यधिक वैमनस्य की भावना व्याप्त थी। इंग्लैंड, जर्मनी की बढ़ती नौ सेना एवं सैन्य शक्ति से चिंतित था। फ्रांस जर्मनी से बदला लेना चाहता था। इटली, फ्रांस से नाराज था। बाल्कन क्षेत्र में सर्बिया एवं आस्ट्रिया के मध्य अत्यधिक तनाव था। रूस सर्विया का समर्थन कर रहा था। जर्मनी आस्ट्रिया को समर्थन कर रहा था।
सर्बिया एवं आस्ट्रिया के मध्य बाल्कन क्षेत्र में बढ़ता तनाव ही प्रथम विश्वयुद्ध का कारण बना। वैसे तो प्रथम विश्वयुद्ध के आरंभ के पीछे कई कारण विद्यमान थे मगर तात्कालिक कारण आस्ट्रिया के राजकुमार फ्रांसिस फर्डनिण्ड की हत्या बना। आस्ट्रिया ने इस हत्या के लिए सर्बिया को दोषी ठहराया। जर्मनी का वरदहस्त पाकर उसने सर्बिया पर आक्रमण कर दिया। इस प्रकार 28 जुलाई, 1914 ई. को प्रथम विश्वयुद्ध आरंभ हो गया।
प्रथम विश्वयुद्ध के प्रमुख कारण निम्नवत थे-
1. गुटों की प्रतिद्वंद्विता
प्रथम विश्व युद्ध का सर्वप्रमुख कारण यूरोप में गुटों की प्रतिद्वंद्विता थी। यूरोप में एक के बाद एक गुट निर्मित हुए जिनका जन्मदाता बिस्मार्क था। फ्रांस को मित्रहीन बनाए रखने के उद्देश्य से उसने फ्रांस विरोधी कई गुटबंदियाँ निर्मित की। फ्रांस एक तरफ गुटबंदियों से भयभीत था तो दूसरी तरफ वह मित्र पाने के लिए छटपटा रहा था। फ्रांस की मित्र पाने की लालसा इतनी तीव्र थी कि 1890 में बिस्मार्क के इस्तीफा देते ही उसकी लालसा पूर्ण हो गई। जर्मन सम्राट विलियम द्वितीय ने रूस के प्रति बेरूखी दिखाई। 1890 में 1887 की जर्मन रूस पुर्णश्वासन की संधि को दुहराया जाना था मगर विलियम द्वितीय ने उसे नहीं दुहराया। परिणाम यह हुआ कि फ्रांस एवं रूस के मध्य 1893 ई. में द्विगुट का निर्माण हुआ।
जर्मनी के विलियम द्वितीय ने नौसेना में वृद्धि कर इंग्लैंड की नींद उड़ा दी। वह भी मित्र की तलाश में घूमने लगा। 1904 में इंग्लैंड ने फ्रांस से मैत्री संधि स्थापित की। इन दो संधियों ने ही 1907 ई. में त्रि राष्ट्रीय संघ (Triple Entente ) के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। यह संघ फ्रांस रूस एवं इंग्लैंड के मध्य बना था।
अब यूरोप में दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गुट थे।
(i) 1882 ई. में निर्मित जर्मनी आस्ट्रिया इटली के मध्य त्रिमित्र त्रिगुट (Triple Alliance)
(ii) 1907 ई. में फ्रांस-इंग्लैंड-रूस के मध्य निर्मित त्रिराष्ट्र संघ (Triple Entente) अब यूरोपीय राजनीति उक्त दो प्रतिद्वंद्वी गुटों का शिकार हो गई। इन दोनों गुटों के मध्य अत्यंत घृणा, ईर्ष्या, विद्वेष एवं संदेह का वातावरण निर्मित हुआ। 1907 ई. में त्रिगुट एवं त्रिराष्ट्रसंघ एक-दूसरे के अगल-बगल में खड़े हुए थे, 1914 में वे एक-दूसरे के सामने आ गए। इस प्रकार 1914 ई. में इन दोनों गुटों के मध्य प्रथम विश्वयुद्ध आरंभ हो गया।
2. सैन्यवाद तथा शस्त्रीकरण
मेरियट महोदय ने सैन्यवाद को विश्वयुद्ध का एक प्रमुख कारण माना है। प्रोफेसर लैगसम के अनुसार एक सैन्यवादी राष्ट्र वह है,
जिसमें सैनिक शक्ति सिविल शासन के ऊपर हावी हो जाती है।" 1870 में फ्रांस के विरुद्ध प्रशा की सफलता देखकर यूरोपीय देश सैन्यवाद की तरफ अग्रसर हुए। सभी देश अपनी सैनिक व नौसैनिक शक्ति में वृद्धि करने लगे। रूस के जार ने शस्त्रीकरण पर प्रतिबंध लगाने के लिए हेग में एक सम्मेलन बुलाया मगर जर्मनी के विरोध के कारण शस्त्रीकरण को सीमित करने की योजनाएँ असफल हुई।
सभी देशों में सैनिक शिक्षा अनिवार्य कर दी गई। जर्मनी एवं फ्रांस ने अपनी राष्ट्रीय आय का 80 प्रतिशत सैन्य तैयारी में खर्च किया।
प्रो. के. ने स्पष्ट किया है कि ऐसा विश्वास किया जाता था कि शस्त्रीकरण आत्म सुरक्षा एवं शांति के लिए किया जा रहा था मगर वास्तविकता यह थी कि इससे देशों में संदेह, भय एवं घृणा का वातावरण निर्मित हुआ।"
जर्मनी एवं फ्रांस को देखकर रूस इंग्लैंड एवं अन्य देशों ने भी अवशस्त्रों को एकत्रित करना प्रारंभ कर दिया। सैन्यवाद एवं शस्त्रीकरण की प्रवृत्ति के चलते यूरोप के बड़े बड़े राज्य दो परस्पर विरोधी एवं सुसज्जित युद्ध शिविरों में विभाजित हो गया। 1914 ई. तक यूरोपीय राष्ट्रों के पास इतने अधिक अस्त्र- शस्त्र एकत्रित हो गए कि यह कहा जाने लगा कि सारा यूरोप गद्दों के स्थान पर अस्त्र-शस्त्रों पर ही सोता रहा।"
3. साम्राज्यवाद
प्रोफेसर लेंगसम ने साम्राज्यवाद और आर्थिक प्रतिद्वंद्विता को विश्वयुद्ध का एक महत्वपूर्ण कारण बताया है। औद्योगिक क्रांति का शिशु आर्थिक साम्राज्यवाद था। औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप यूरोप के प्रमुख राष्ट्रों की उत्पादन क्षमता बढ़ गई। इन्होंने कच्चे माल की प्राप्ति तथा निर्मित माल की खपत हेतु नए बाजारों की खोज आरंभ की। ये सभी राष्ट्र एशिया एवं अफ्रीका में अपना प्रभावतंत्र कायम करने में जुट गए। जर्मनी साम्राज्यवाद की दौड़ में 'देर आए दुरस्त आए' की कहावत चरितार्थ करता हुआ तेजी से आगे बढ़ा। साम्राज्यवादी भावना 19वीं सदी के आरंभ तक चरम सीमा तक पहुँच गई। बाल्कन क्षेत्र में रूस का साम्राज्यवादी विस्तार आस्ट्रिया की आँख की किरकिरी बन गया।
साम्राज्यवादी विस्तार की भावना ने यूरोपीय राष्ट्रों के बीच इतना अधिक तनाव बढ़ा दिया कि उसकी चरम परिणिति प्रथम विश्वयुद्ध के रूप में सामने आई।
4. समाचार पत्रों द्वारा व्याप्त उत्तेजना
यूरोपीय राष्ट्र वैसे ही साम्राज्यवादी संघर्ष के कारण तनाव में थे समाचार पत्रों ने तनाव को और अधिक भड़काया। प्रायः प्रत्येक राष्ट्र का समाचार पत्र अपने प्रतिद्वंद्वी देश के खिलाफ आग उगल रहे थे। कुछ उदाहरण निम्न थे-
• यदि पृथ्वी से जर्मनी का नामोनिशान मिट जाए तो प्रत्येक अंग्रेज़ और अधिक संपन्न हो जाएगा।-
इंग्लैंड का एक समाचार पत्र - ब्रिटिश साम्राज्य के ध्वंशावशेष पर ही जर्मन साम्राज्य का निर्माण संभव है। जर्मनी का एक समाचार
पत्र
जनमत के निर्माण में समाचार पत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इंग्लैंड के समाचार पत्रों ने जब जर्मन सम्राट कैसर विलियम द्वितीय की नीतियों की कड़ी आलोचना की तो जर्मन जनता इंग्लैंड को अपना शत्रु मानने लगी।
1900 ई. तक एक-दूसरे देश के खिलाफ जहर उगलने वाले समाचार पत्रों की संख्या 10 लाख तक पहुँच गई। जाहिर है कलम की ताकत ने तलवार से अधिक तनाव फैला दिया। जून, 1914 में सेंट पीटर्सबर्ग से प्रकाशित एक रूसी समाचार पत्र बोर्स गजट (Bourse gaztette) ने मोटे अक्षरों में लिखा-
रूस तैयार है और फ्रांस को भी तैयार रहना चाहिए यह वाक्य पढ़कर जर्मन सम्राट विलियम द्वितीय का क्रोध सातवें आसमान पर जा पहुँचा। इस प्रकार समाचार पत्रों द्वारा फैला तनाव समस्त यूरोप को प्रथम विश्वयुद्ध की कगार पर ले आया।
5. अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नियंत्रित करने वाली किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था का अभाव
1914 के पूर्व के अंतरराष्ट्रीय संबंधों का विश्लेषण करने वाले कतिपय विद्वानों ने उस स्थिति को अंतरराष्ट्रीय अराजकता की स्थिति बताया है। इस समय तक यूरोपीय रंगमंच पर लगभग 25 राष्ट्र थे, मगर इनकी नीतियों को नियंत्रित करने वाली कोई अंतरराष्ट्रीय संस्था नहीं थीं। इस अंतरराष्ट्रीय संस्था के अभाव के कारण विभिन्न देश नैतिकता को ताक पर रखकर परस्पर विरोधी गुट बंदियाँ करते रहे।। उदाहरण के लिए इटली एक ओर तो जर्मनी एवं आस्ट्रिया से मित्रता संधि कर चुका था दूसरी ओर उसने चुपचाप जर्मनी के प्रबल शत्रु फ्रांस के साथ गुप्त संधि की। अंतरराष्ट्री संस्था के अभाव में विभिन्न देश इस प्रकार की गुप्त संधियों के मकड़जाल में उलझते चले गए। इन गुटबंदियों ने इन देशों को प्रथम विश्वयुद्ध के द्वार पर ले जाकर पटक दिया।
6. जर्मन सम्राट कैसर विलियम द्वितीय की महत्वाकांक्षाएँ
जर्मन सम्राट कैसर विलियम द्वितीय की विश्व शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा भी प्रथम विश्वयुद्ध का एक महत्वपूर्ण कारण सिद्ध हुई। बिस्मार्क की गुटबंदी प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यूरोप में शांति बनी रही। वह जर्मनी को एक संतुष्ट राष्ट्र मानता था। दूसरी ओर वह जल शक्ति बढ़ाकर इंग्लैंड से शत्रुता मोल नहीं लेना चाहता था।
"विलियम द्वितीय इतिहास की यह नसीहत भुला बैठा। उसने संतुष्ट जर्मनी को असंतुष्ट जर्मन में राष्ट्र तब्दील कर दिया। विश्व पर विजय करने की ख्वाहिश में जल सेना में वृद्धि की।
इन परिस्थितियों में इंग्लैंड से शत्रुता स्वाभाविक थी। इंग्लैंड भला जर्मनी की इस बढ़ती शक्ति को कैसे देख सकता। अतः उसने फ्रांस एवं रूस के साथ 1907 में जर्मनी के खिलाफ मित्रता की। इस प्रकार कैंसर विलियम द्वितीय की महत्वाकांक्षा ने यूरोप को प्रथम विश्वयुद्ध की आग में झोंक दिया।”
7. पूर्वी समस्या एवं बाल्कन युद्ध
अपने आप में जटिल पूर्वी समस्या को 1878 ई. में बर्लिन कांग्रेस ने और अधिक उलझा दिया। ईमानदार दलाल की भूमिका निभाने का आश्वासन देने के बावजूद भी बिस्मार्क ने आस्ट्रिया का पक्ष लिया।
इससे रूस अत्यंत नाराज हो गया। रूस ने सेनस्टीफनो की संधि (1877) में जो प्रतिष्ठा प्राप्त की थी उसे बर्लिन कांग्रेस के निर्णयों ने धोकर रख दिया। परिणाम यह हुआ कि पूर्वी समस्या और अधिक उलझ गई। बर्लिन सम्मेलन से लौटने पर डिजरायली ने इंग्लैंड में कहा था कि मैं ससम्मान शांति लाया हूँ। मगर इस ससम्मान शांति में भविष्य की अशांति के अंकुर स्पष्टतः मौजूद थे।
1908 एवं 1914 के बीच आस्ट्रिया एवं सर्बिया के मतभेदों ने बाल्कन क्षेत्र में अशांति फैला दी। प्रथम एवं द्वितीय बाल्कन युद्ध भी समस्या का समाधान करने में असमर्थ रहे और समस्त विश्व इस समस्या के चलते प्रथम विश्वयुद्ध के द्वार तक पहुँच गया।
8. तात्कालिक कारण
उक्त वर्णित समस्त कारणों ने यूरोप में अत्यधिक तनाव का वातावरण निर्मित कर दिया था। तनाव इतने चरम पर था कि एक छोटी सी घटना भी युद्ध की स्थिति निर्मित करने में पर्याप्त थी। जिसकी आशंका थी वही हुआ, बाल्कन क्षेत्र में एक अप्रत्याशित घटना घट गई।
28 जून, 1914 को आस्ट्रिया हंगरी के युवराज आर्क ड्यूक फ्रांसिस फर्डीनेड अपनी पत्नी सोफी के साथ बोस्निया की राजधानी सेराजिवो गए। वहाँ विद्यार्थी संगठन के एक सदस्य गॉवरीलो प्रिंसप (Gavrilo princip) ने इन दोनों की गोली मारकर हत्या कर दी।
इस षडयंत्र में बोस्निया के एक आतंकवादी संगठन 'ब्लैक हैंड' का हाथ था। इस घटना ने सारे यूरोप में सनसनी फैला दी। युद्ध सन्निकट स्पष्टतः दिखाई देने लगा। सर्बिया को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया कि वह अपराधियों को दंडित करे। सर्बिया ने आस्ट्रिया की सभी शर्तें मान ली परंतु यह शर्त नहीं मानी कि अपराधियों के मुकदमे की सुनवाई ऑस्ट्रियन जज की मौजूदगी में हो।
युद्ध के पूर्वाग्रह से ग्रसित आस्ट्रिया को बहाना मिल गया। 28 जुलाई, 1914 को आस्ट्रिया ने सर्बिया पर धावा बोलकर प्रथम विश्वयुद्ध का नगाड़ा बजा दिया।
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