द्वितीय विश्वयुद्ध का आरंभ एवं घटनाक्रम - Beginning and events of World War II

द्वितीय विश्वयुद्ध का आरंभ एवं घटनाक्रम - Beginning and events of World War II


1 सितंबर 1939 ई. को जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण किया। इंग्लैंड के प्रधानमंत्री चेम्बरलेन ने हिटलर को चेतावनी दी कि वह शीघ्र ही पोलैंड से अपनी सेना वापस बुलाए। हिटलर ने इसे मात्र एक धमकी माना और इंग्लैंड की चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया। चूँकि हिटलर इससे पूर्व भी कई आक्रामक कार्यवाही करता रहा था और इंग्लैंड ने उसके प्रति तुष्टीकरण की नीति अपनाई थी। अतः हिटलर ने इंग्लैंड की चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया।


हिटलर की उम्मीद के विपरीत जब हिटलर ने पोलैंड से सेना नहीं हटाई तो 3 सितंबर 1939 को इंग्लैंड ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

इस प्रकार अंततः द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो ही गया। इस युद्ध के मुख्यतः चार चरण थे। इन चार चरणों का घटनाक्रम इस प्रकार है-


द्वितीय विश्वयुद्ध का प्रथम चरण


द्वितीय विश्वयुद्ध का प्रथम चरण 1 सितंबर, 1939 ई. से 21 जून, 1941 ई. तक माना गया है। इस प्रथम चरण में हिटलर ने पोलैंड, डेनमार्क, नीदरलैंड, बेल्जियम, लग्जेम्बर्ग, फ्रांस, ब्रिटेन, यूनान तथा क्रीट पर आक्रमण किया।


पोलैंड पर आक्रमण


शुक्रवार 1 सितंबर, 1939 ई. को प्रातः चार बजे जब सारा यूरोप सो रहा था,

उसी समय हिटलर ने तीव्रगति से पोलैंड पर आक्रमण कर दिया। अपने तमाम प्रतिरोध के बावजूद पोलैंड परास्त हुआ। 26 सितंबर, 1939 ई. को पोलैंड को युद्ध विराम संधि पर हस्ताक्षर करने को बाध्य होना पड़ा। यह युद्ध27 दिन तक चला।


इंग्लैंड में सत्ता परिवर्तन


इंग्लैंड ने जब 3 सितंबर 1939 को जर्मनी के विरुद्ध युद्ध आरंभ कर दिया था उस समय चेम्बरलेन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे। युद्ध में निरंतर जर्मनी की सफलता के कारण 10 मई, 1940 को चेम्बरलेन ने स्तीफा दे दिया। अब 11 मई, 1940 को विंस्टन चर्चिल इंग्लैंड के प्रधानमंत्री बने। विंस्टन चर्चिल एक कुशल युद्ध नेता थे। उन्होंने कुशलता के साथ युद्ध का संचालन किया।


जर्मनी का हॉलैंड पर अधिकार


जिस दिन इंग्लैंड में चेम्बरलेन ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया उसी दिन 10 मई, 1940 को इंग्लैंड ने हालैंड पर आक्रमण किया। 14 मई को हालैंड का पतन हो गया। 10 मई को ही हिटलर की सेना ने बेल्जियम पर भी आक्रमण किया। 5 दिन में ही बेल्जियम ने भी आत्मसमर्पण कर दिया।


फ्रांस पर आक्रमण


7 जून को जर्मन सेनाओं ने तेजी के साथ फ्रांस पर आक्रमण कर दिया। फ्रांस की 'मैजीनो रेखा' के विशाल टैंक जर्मन सेना का मुकाबला न कर सके।

चूँकि इस समय इंग्लैंड स्वयं मुसीबत में था अतः वह भी कुछ सहायता न कर सका। 8 जून, 1940 को जर्मनी ने पेरिस नगर पर अधिकार कर लिया। 22 जून, 1940 को फ्रांस ने घुटने टेक दिए। जर्मनी एवं हिटलर के लिए यह एक महान जीत थी। वर्साय की संधि के अपमान के धब्बे को उन्होंने धो दिया। वर्साय की संधि का प्रतिशोध फ्रांससे जर्मनी ने ले लिया।


इंग्लैंड पर आक्रमण


फ्रांस को परास्त कर जर्मनी ने 8 अगस्त, 1940 को इंग्लैंड पर आक्रमण किया। मगर इंग्लैंड की शक्तिशाली सेना ने इस आक्रमण का करारा जबाब दिया।


वाल्टिक देशों पर आक्रमण


फ्रांस एवं इंग्लैंड के पश्चात् जर्मनी ने रूस के बाल्टिक राज्यों पर आक्रमण किया। लिथुआनिया, लटेविया एवं एस्टोनिया पर अधिकार कर लिया। उधर इटली ने यूनान एवं उत्तरी अफ्रीका पर आक्रमण किया।


जापान का धुरी राष्ट्रों से मिलना


जापान भी धुरी राष्ट्रों के पक्ष में युद्ध में शामिल हो गया। जापान ने द्वितीय विश्वयुद्ध का फायदा उठाकर सुदू पूर्व में अधिकार कर वृहत्तर पूर्वी एशिया के निर्माण का कार्य जारी किया।


द्वितीय विश्वयुद्ध का द्वितीय चरण


द्वितीय विश्वयुद्ध का द्वितीय चरण 22 जून, 1941 ई. से 6 दिसंबर, 1941 तक चला।


रूस पर आक्रमण


द्वितीय विश्वयुद्ध का द्वितीय चरण 22 जून, 1941 ई. को हिटलर के रूस पर आक्रमण के साथ आरंभ हुआ। एक साथ 4 नाजी सेनाओं ने मास्को, कीव, लेनिनग्राड एवं ओडेसा की ओर तीव्रता से बढ़ना आरंभ किया। इन परिस्थितियों में इंग्लैंड ने रूस से संधि की और अमेरिका ने रूस को खाद्य एवं युद्ध समग्री पहुँचाई।


जापान का अमेरिका पर आक्रमण


जब जर्मनी के विरुद्ध इंग्लैंड व अमेरिका ने रूस की मदद की तो जापान ने जर्मनी के पक्ष में अमेरिका पर आक्रमण किया। 7 दिसंबर, 1941 को जापान ने अमेरिका के नाविक केंद्र हवाई द्वीप पर एकाएक आक्रमण कर वहाँ उपस्थित अमेरिकी जहाजों को नष्ट कर दिया। जापान के इस आक्रमण से अमेरिका भी द्वितीय विश्वयुद्ध में शामिल हो गया।


अब यह युद्ध पूरी तरह एक द्वितीय महायुद्ध का रूप ले चुका था। एक ओर जर्मनीइटली एवं जापान थे तो दूसरी ओर इंग्लैंड, फ्रांस, रूस एवं संयुक्त राज्य अमेरिका थे ।


द्वितीय विश्वयुद्ध का तृतीय चरण


हांगकांग गुआम एवं थाइलैंड पर अधिकार कर लिया। जनवरी 1942 ई. में जापान ने मलाया पर एवं 15 दिसंबर, 1941 को सिंगापुर पर भी अधिकार कर लिया। मार्च 1942 तक जापान ने रंगून पर अधिकार कर लिया।


जापान काफी तीव्रता से आगे बढ़ा। उसने हांगकांग फिलीपाइन्स, मलाया, सिंगापुर को रौंद दिया। यही नहीं उसने भारत के कलकत्ता पर भी बम वर्षाए। द्वितीय विश्वयुद्ध का तृतीय चरण 7 दिसंबर 1941 ई. से 8 नवंबर, 1942 ई. तक चला। यह तृतीय चरण मूलतः जापान के पर्लहार्वर पर आक्रमण के पश्चात् आरंभ हो गया। पर्लहार्वर के पश्चात् जापान ने


रूस पर जर्मन आक्रमण


19 नवंबर, 1942 को रूस पर पुनः जर्मनी ने आक्रमण कर दिया। उसने स्टालिनग्राड का घेरा डाला। यह एक अत्यधिक रक्तरंजित एवं लंबा युद्ध था। रूस ने करारा जवाब दिया और जर्मनी को परास्त कर दिया। सोवियत सेना नाजी सेना को रौंदती हुई बर्लिन जा पहुँची। यह एक महान सफलता थी। रूस ने मित्र राष्ट्रों की जीत सुनिश्चित कर दी।


द्वितीय विश्वयुद्ध का चतुर्थ चरण द्वितीय विश्वयुद्ध का चतुर्थ एवं अंतिम चरण8 नवंबर, 1942 से 14 अगस्त, 1945 तक चला। चतुर्थ चरण में द्वितीय विश्वयुद्ध का परिदृश्य पूर्णतः बदल चुका था।

रूस द्वारा जर्मनी की पराजय द्वितीय विश्व युद्ध का परिवर्तन बिंदुसाबित हुआ।


इटली की पराजय


मित्र राष्ट्रों ने अपनी सेना की संयुक्त कमान जनरल आइजन हावर को सौंपी। जनरल आइजनहावर एवं जनरल मांटगुमरी ने जर्मनी एवं इटली की सेनाओं पर आक्रमण किया। ट्यूनिशिया पर उनके आक्रमण से इटली चिंतित हो गया। उसने हिटलर से सहायता माँगी। मगर 5 मई, 1943 को जर्मन सेनाओं ने घुटने टेक दिए। 12 मई को मित्र राष्ट्रों ने ट्यूनिशिया पर अधिकार कर लिया। सिसली को अधिग्रहित कर 25 जुलाई,

1943 को मुसोलिनी को अपदस्थ किया और उसे बंदी बना लिया। 4 जून, 1943 को रोम पर मित्र राष्ट्रों का कब्जा हो गया। मुसोलिनी को 24 अप्रैल, 1945 को गोली मार दी गई।


जर्मनी की पराजय


इटली पर आधिपत्य के पश्चात् मित्र राष्ट्रों की विजय का सिलसिला जारी रहा। फरवरी, 1945 में मित्र राष्ट्रों ने तीन तरफ से जर्मनी पर आक्रमण किया। जर्मनी बड़ी बहादुरी से लड़ा मगर परास्त हुआ। 30 अप्रैल, 1945 को हिटलर ने अपनी पत्नी सहित आत्महत्या कर ली।

7 मई, 1945 को जर्मनी ने मित्र राष्ट्रों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। रूस अमेरिका, फ्रांस व इंग्लैंड ने युद्ध पश्चात् जर्मनी को चार भागों में बाट दिया।


जापान की पराजय


मित्र राष्ट्र जब इटली एवं जर्मनी में उलझे हुए थे उस समय इनकी पश्चिम में व्यस्तता का लाभ उठाकर जापान पूर्वी एशिया में विस्तार कर रहा था। इटली एवं जर्मनी की पराजय के पश्चात् मित्र राष्ट्रों ने मुख्यतः अमेरिका ने पूरा ध्यान जापान पर केंद्रित किया।


6 अगस्त, 1945 को अमेरिकी वायु सेना ने हिरोशिमा पर एवं 9 अगस्त, 1945 को जापान के नगर नागासाकी पर अणुबम गिराए। अणुबम का विस्फोट अत्यंत विनाशकारी था। अब जापान के समक्ष आत्मसमर्पण के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प न था। यह अणुबम अमेरिकी वायुयान बी-19 द्वारा गिराए गए 14 अगस्त, 1945 को जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस प्रकार द्वितीय विश्वयुद्ध पूर्णतः समाप्त हो गया।


इस प्रकार 1 सितंबर, 1939 को आरंभ द्वितीय विश्वयुद्ध पूरे 6 वर्ष चला और 14 अगस्त, 1945 को जापान के आत्मसमर्पण के साथ समाप्त हुआ।


द्वितीय विश्वयुद्ध का स्वरूप


1 सितंबर, 1939 से प्रारंभ होकर 14 अगस्त, 1945 तक पूरे 6 वर्ष चलने वाले द्वितीय विश्वयुद्ध का स्वरूप कई मायनों में प्रथम विश्वयुद्ध से भिन्न था। यहाँ उल्लेखनीय तथ्य यह है कि दोनों ही विश्वयुद्धों में केंद्रीय शक्ति तो जर्मनी ही रहा मगर प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी का चांसलर बिस्मार्क युद्ध नहीं चाहता था। द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी का राइखफ्यूरर हिटलर युद्ध चाहता था। बिस्मार्क यदि यूरोप में शांति एवं शक्ति संतुलन चाहता था तो हिटलर वर्साय की अपमानजनक संधि का प्रतिशोध लेना चाहता था। प्रथम विश्व युद्ध का आरंभ आस्ट्रिया ने किया था, चूँकि जर्मनी आस्ट्रिया के साथ संधि से बँधा हुआ था। अतः वह भी आस्ट्रिया के पक्ष में युद्ध में सम्मिलित हो गया।


द्वितीय विश्व युद्ध में युद्ध का आरंभ हिटलर द्वारा ही किया गया था। इस विश्वयुद्ध ने शीघ्र ही एक व्यापक स्वरूप ग्रहण कर लिया। चूँकि युद्ध के पूर्व ही इटली, जर्मनी व जापान के मध्य रोम-बर्लिन टोकियो धुरी का निर्माण हो चुका था। अतः जर्मनी के पक्ष में इटली एवं जापान भी सम्मिलित हो गए। इस कारण यह युद्ध मात्र यूरोप तक सीमित न रह कर सुदूर पूर्व में भी फैल गया।


द्वितीय विश्व युद्ध के स्वरूप का एक रोचक पहलू यह था कि प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् मित्र राष्ट्र रूस के साम्यवाद के प्रसार से भयभीत थे। इस भय का फायदा हिटलर एवं जापान ने उठाया।

वे जब भी किसी राष्ट्र पर आक्रमण करते तो मित्र राष्ट्रों को यह कह कर शांत कर देते थे कि वे तो ऐसा रूस के साम्यवादी प्रसार को रोकने हेतु कर रहे हैं। मित्र राष्ट्रों की इसी तुष्टीकरण की नीति के कारण अंततः द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो गया। जिस रूस के विरोध में मित्र राष्ट्रों ने हिटलर के प्रति तुष्टीकरण की नीति अपनायी, युद्ध के दौरान उसी रूस के पक्ष में मित्र राष्ट्र आ गए। रूस ने ही सर्वप्रथम जर्मनी को परास्त कर मित्र राष्ट्रों की विजय का मार्ग प्रशस्त किया। पूँजीवादी अमेरिका भी साम्यवादी रूस के पक्ष में युद्ध के दौरान आ गया।


द्वितीय विश्व युद्ध के स्वरूप की यह एक अद्भुत मिसाल थी कि पूँजीवादी मित्र राष्ट्र एवं साम्यवादी रूस एकजुट होकर अधिनायकवादी शक्तियों जर्मनी इटली एवं जापान का मुकाबला कर रहे थे। जाहिर है कि इस समय मित्र राष्ट्रों के लिए साम्यवाद से कहीं अधिक खतरनाक अधिनायकवाद नजर आ रहा था।


यहाँ हम देखते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान विरोधी गुटों के स्वरूप में भी विभिन्नता थी । जर्मनी सहित धुरी राष्ट्र अधिनायकवादी विचारधारा के थे तो मित्र राष्ट्र एवं रूस पूँजीवादी एवं साम्यवादी विचारधारा के थे।

अधिनायकवादी विचारधारा के खिलाफ युद्ध में पूँजीवादी एवं साम्यवादी विचारधाराएँ एक हो गई। वस्तुतः यह परिस्थिति की माँग थी। यहाँ साम्यवादी विचारधारा के प्रसार से अधिक बड़ा खतरा मित्र राष्ट्रों को हिटलर के रूप में दिखाई दे रहा था।


इंग्लैंड - फ्रांस एवं अमेरिका यूरोप में तो संयुक्त रूपमें अधिनायकवादी शक्तियों का मुकाबला कर • सकते थे मगर सुदूर पूर्व में जर्मनी जापान की सम्मिलित शक्ति का सामना करने हेतु उन्हें एक साथी की अत्यंत आवश्यकता थी। यह साथी उन्हें रूस के रूप में मिला। निहित स्वार्थ एवं आवश्यकता के आगे रूस का साम्यवादी होना गौण हो गया और इस प्रकार परिस्थितियों ने ब्रिटेन फ्रांस, अमेरिका एवं रूस को एक साथ ला दिया।

पारस्परिक विरोधी विचारधाराओं के एक साथ आने से युद्ध के स्वरूप में भी परिवर्तन हुआ । जर्मनी जीती बाजी हार गया। अभी तक जो जर्मनी फ्रांस एवं इंग्लैंड पर भारी पड़ रहा था उसे रूस ने करारी शिकस्त दी। इस के साथ ही मित्र राष्ट्रों का पलड़ा भारी हो गया और विजयश्री ने उनका वरण कर लिया।


द्वितीय विश्वयुद्ध का स्वरूप प्रथम विश्वयुद्ध से अधिक खतरनाक एवं रक्तरंजित था। इस युद्ध में जान माल की अत्यधिक हानि हुई।

अमेरिका द्वारा जापान पर अणु बम गिराने की घटना ने द्वितीय विश्वयुद्ध के स्वरूप को और अधिक भयानक एवं वीभत्स बना दिया। एटम बम के प्रयोग ने मानव जाति को विनाश के कगार पर पहुँचा दिया। 1949 ई. तक जो बम मात्र अमेरिका के पास ही था उस आधिपत्य को रूस ने 22 सितंबर, 1949 को अणु विस्फोट कर चुनौती दी। इस प्रकार इस विश्वयुद्ध के स्वरूप ने विश्व को शस्त्रास्त्रों की होड़ के साथ अणु बम निर्माण की होड़ में भी संलग्न कर दिया। आज भी विश्व इस समस्या से जूझ रहा है।