धर्म सुधार आन्दोलन का प्रारंभ - Beginning of religious reform movement
धर्म सुधार आन्दोलन का प्रारंभ - Beginning of religious reform movement
पोप का विरोध और आन्दोलन का आरम्भ
14वीं शताब्दी में ही पोप के अधिकारों, उसकी धार्मिक नीति तथा कैथोलिक धर्म में उत्पन्न दोषों और त्रुटियों की चर्चा जनसाधारण में होने लगी थी। अंग्रेज पादरी जॉन वाइक्लिफ ने ही सबसे पहले कैथोलिक धर्म में उत्पन्न बुराइयों की ओर जनता का ध्यान आकर्षित किया। उसने इन त्रुटियों और दोषों के लिये कैथोलिक धर्म के महान् गुरू पोप की भी आलोचना की। उसके प्रचार से प्रभावित होकर बोहेमिया में प्राग विश्वविद्यालय के प्राध्यापक जॉन हस ने भी विक्लिफ के सिद्धान्तों को उचित बताते हुए पोप के विरुद्ध प्रचार आरम्भ किया,
परंतु उस समय की शक्ति और अधिकार असीमित थे। किसी यूरोपीय शासक में उसका विरोध करने का साहस नहीं था। अतः पोप के विरुद्ध उठाये गये उन धार्मिक आन्दोलनों को पूरी तरह दबा दिया गया, फिर भी इन आन्दोलनों का एक परिणाम यह अवश्य निकला कि लोगों की विचारधारा में परिवर्तन उत्पन्न होने लगा और वे पोप के भ्रष्टाचार, धार्मिक आडम्बरों, धार्मिक करों की अधिकता आदि का विरोध करने लगे। इस प्रकार का विरोध जर्मनी में ही सबसे पहले आरम्भ हुआ और वहीं इसे सबसे अधिक समर्थन प्राप्त हुआ।
जर्मनी में धर्म सुधार आन्दोलन
धर्म सुधार आन्दोलन जर्मनी में ही क्यों?
यूरोप के अन्य देशों की अपेक्षा जर्मनी में ही धार्मिक आन्दोलन को क्यों सफलता प्राप्त हुई यह एक विचारणीय प्रश्न है। इसका समुचित उत्तर उस काल की जर्मनी की राजनीतिक दशा में निहित है। उस समय फ्रांस और पवित्र रोमन साम्राज्य दोनों देश कैथोलिक धर्म के कट्टर समर्थक थे। ये दोनों ही देश धार्मिक आन्दोलन का अन्त करने के लिये पर्याप्त मात्रा में शक्तिशाली थे, परन्तु धार्मिक आन्दोलन के सौभाग्य से दोनों देशों में उस समय युद्ध ही रहा था। अतः वे परस्पर मिलकर धार्मिक आन्दोलन का दमन करने में असमर्थ थे।
उधर जर्मनी की राजनीतिक दशा धार्मिक आन्दोलन के विकास के लिए सर्वथा अनुकूल थी। जर्मनी उस समय अनेक छोटे-छोटे राज्यों का संघ मात्र था। रोमन सम्राट संघ की स्वीकृति लिये बिना कोई प्रभावपूर्ण पग बढ़ाने में असमर्थ था। वह न तो सेना ही संगठित कर सकता था और न आय बढ़ाकर आन्दोलन का दमन करने के लिये आय वृद्धि ही कर सकता था। ऐसी स्थिति में लूथर ने जर्मनी में धार्मिक आन्दोलन आरम्भ किया। जर्मनी के अनेक राज्यों में लूथर के आन्दोलन को कल्याणकारी जान कर उसका सर्मथन किया और लूथर को हर प्रकार की सहायता प्रदान की गई। इस प्रकार जर्मनी में धार्मिक आन्दोलन को पूर्ण रूप से सफलता प्राप्त हुई ।
इतिहासकार ए. जे. ग्राण्ट ने धार्मिक आन्दोलन के जर्मनी में विकसित होने के सम्बन्ध में अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किये हैं “धार्मिक आन्दोलन प्रारम्भ में एक अति साधारण घटना थी, परन्तु शीघ्र ही यह आन्दोलन जर्मनी की राजनीतिक और सामाजिक दशा एवं यूरोपीय देशों के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के कारण, एक उलझन भरी समस्या का रूप धारण कर गया। लूथर का धार्मिक आन्दोलन प्रगति पथ पर आगे बढ़ने लगा। उसे उस काल के तथा आगामी शताब्दी में घटित होने वाले षड्यंत्रों, राजनीतिक ईष्र्या, कूटनीति, गृह युद्धों और अन्तर्राष्ट्रीय युद्धों से बड़ी सफलता प्राप्त हुई।"
इतिहासकार शेविल ने जर्मनी के विषय में लिखा है- "जर्मनी केवल नाम के लिये ही एक साम्राज्य था। वास्तव में वह छोटे-छोटे राज्यों का एक संघात्मक संघ था जो पोप के हस्तक्षेप का विरोधी था।"
पवित्र रोमन सम्राट इन छोटे-छोटे स्वतन्त्र राज्यों के कार्य कलापों में हस्तक्षेप करने में असमर्थ था। इसके अतिरिक्त छापेखाने की कला का विकास भी जर्मनी में ही हुआ था और धर्म सुधार आन्दोलन के प्रारम्भ होने से पूर्व ही जर्मन भाषा में बाइबिल के 15 संस्करण प्रकाशित होकर जनता में बिक चुके थे। अतः जनता धार्मिक ग्रन्थों की अनेक त्रुटियों से उस समय तक भली भाँति परिचित हो चुकी थी। इसीलिये जब धर्म सुधारकों ने कैथोलिक चर्च और पोप की अनेक बुराइयों और त्रुटियों की कटु आलोचना प्रारम्भ की तो जर्मन जनता ने उन कटु आलोचनाओं का स्वागत करते हुए धर्म सुधार आन्दोलन को अपना समर्थन पूर्णरूप से प्रदान किया। पवित्र रोमन सम्राट चार्ल्स पंचम उस समय अपने वैदेशिक संघर्षों में इतनी बुरी तरह फँसा हुआ था कि उसे इस आन्दोलन की ओर ध्यान देने का समय ही नहीं था। अतः धर्म सुधार आन्दोलन जर्मनी में प्रारम्भ होकर अपना प्रभाव चारों ओर फैलाने लगा।
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