मध्यकाल में भक्ति आंदोलन - Bhakti Movement in Medieval Period
मध्यकाल में भक्ति आंदोलन - Bhakti Movement in Medieval Period
नवीन परिस्थितियाँ
तुर्क शासन की स्थापना के बाद भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आरंभ हुए। सिंचाई में रहट का व्यापक रूप से प्रयोग आरंभ हुआ, जिससे नदियों कि किनारे विशेष रूप से पंजाब और दोआब के क्षेत्र में कपास और अन्य फसलों की पैदावार में बहुत वृद्धि हुई। सूत कातने के लिए तकली के स्थान पर चरखे का व्यापक प्रयोग होने लगा। इसी तरह रुई धुनने में ताँत का प्रयोग जन साधारण के लिए महत्वपूर्ण बन गया था। कपास ओटने में चरखी का भी प्रयोग शुरू हुआ।
तेरहवीं सदी में करघा के प्रयोग से बुनकरों और वस्त्र उद्योग की स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ कपड़े की रंगाई एवं छपाई की भी इसी बीच व्यापक उन्नति हुई। मध्य एशिया के सीधे संपर्क के कारण भारत के व्यापार का भी बहुत प्रसार हुआ। इन नई परिस्थितियों ने व्यापारियों और कारीगरों का सीधा संबंध और गहरा करने में सहयोग दिया। व्यापारी कला और संस्कृति के आदान प्रदान में भी महत्वपूर्ण संवाहक सिद्ध हुए। भारत के विभिन्न प्रदेशों के साहित्य में इस योगदान की विस्तार से चर्चा मिलती है।
मध्यकाल के हिंदी साहित्य में भी छुटपुट रूप से हमें इस संबंध में अनेक उदाहरण मिल जाते हैं। मुल्ला दाऊद, कबीर, नानक और सूरदास का साहित्य विशेष रूप से दृष्टव्य है। ये व्यापारी देश के अंदर ही व्यापार नहीं करते थे, बल्कि दूसरे देशो में भी जाते थे। इसके साथ भारत की कला साहित्य और संस्कृति बाहर गई और वहाँ से अनेक विचार धाराएँ और साहित्य भारत में आया। इन व्यापारियों और बंजारों के संबंध में आज भी उत्तरी भारत में असंख्य लोक कथाएँ और लोक गीत प्रचलित हैं जो इस बात का प्रमाण हैं कि इन घुमंतु व्यापारियों का भारत के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन पर कितना गहरा प्रभाव था, इन नई परिस्थितियों ने शिल्पी वर्ग को बहुत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली बना दिया था। संत मत में बहुसंख्या इसी शिल्पी वर्ग की है। इसके बाद व्यापारी और किसान आते हैं।
शहरीकरण एवं केंद्रीकरण
बारहवीं और तेरहवीं शताब्दियों में शहरीकरण की लहर उत्तरी भारत में फैलने लगी थी। यहाँ का नया शासक वर्ग नगर में रहना अधिक पसंद करता था। कृषि और अन्य नए उत्पादन बढ़ने के कारण लगान बढ़ाने की माँग में भी वृद्धि हुई। यही बढ़ी हुई माँग तुर्क शासक वर्ग को उत्तराधिकार में मिली जिसे उन्होंने शासन व्यवस्था का केंद्रीकरण करके और अधिक सुव्यवस्थित किया। इस प्रकार इस शासक वर्ग को कर पहले से कहीं अधिक उपलब्ध थे, जिन्हें अधिकतर शहरों में व्यय किया जाता था। इसी प्रकार कई शिल्पों का विकास हुआ, जिनमें प्रधानतः नए ढंग का स्थापत्य कला, कागज बनाना, रूई साफ करने के नए तरीके और आतिशबाजी को लिया जा सकता है।
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