भक्ति आंदोलन: जन आंदोलन - Bhakti Movement: Mass Movement
भक्ति आंदोलन: जन आंदोलन - Bhakti Movement: Mass Movement
भक्ति आंदोलन में कई तरह के रंग और विचार रहे हैं। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि क्या भक्ति आंदोलन एक जन आंदोलन था। यह सीमित अर्थों में ही जन आंदोलन था। संपूर्ण अर्थों में नहीं। यह जनता के जीवन स्तर में किसी परिवर्तन का आह्वान नहीं करता। किसी आर्थिक संरचना का उद्देश्य भी इस आंदोलन के सामने नहीं हैं। इस आंदोलन की दार्शनिक परिणति स्वयं की मुक्ति और ईश्वर से एकात्मक संबंध स्थापित करना था। गुरु की सहायता से मोक्ष प्राप्त अथवा प्रभु कृपा पर अधिक बल था। इस आंदोलन के दार्शनिक लक्ष्य भी भिन्न थे। भक्त और ईश्वर के संबंध धर्म ग्रंथों की मान्यता तथा समाज के संबंध में इनके दृष्टिकोण अलग अलग हैं।
यही नहीं शासक वर्ग के प्रति भी इनकी दृष्टि एक नहीं है उनमें गहरे मतभेद हैं। हम इनके विचारों का विश्लेषण करें तो यह सुधारवाद से आगे नहीं बढ़ते । जाति व्यवस्था और ब्राह्मण वर्ग पर इन्होंने चोट जरुर की, लेकिन उस ढाँचे को तोड़ने में असमर्थ रहे। क्षेत्रों के अनुसार भी इस आंदोलन की अपनी अपनी विशेषताएँ थी। यही लोकप्रिय भावनाओं को अभिव्यक्त करने का साधन बना और उसने विभिन्न वर्गों के तथा पृष्ठभूमि के स्त्री पुरुषों को निरंकुशता के विरुद्ध एकत्र और सक्रिय होने का अवसर प्रदान किया। पंजाब का उदाहरण इस संबंध में विशेष उल्लेखनीय है। भक्ति आंदोलन के विकास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, परस्पर क्षेत्रीय विभिन्नता वाले समाज, राजनैतिक और संस्कृति पर प्रभाव इसके उदय विकास में सहायक तत्वों के अध्ययन की आज भी आवश्यकता है। जब तक गंभीर अध्ययन नहीं होगा तब तक भक्ति आंदोलन के संबंध में कोई अंतिम बात नहीं कही जा सकती।
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