साम्राज्यवाद का वृहत स्वरूप - broad contours of imperialism
साम्राज्यवाद का वृहत स्वरूप - broad contours of imperialism
औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप बढ़ते हुए उत्पादन की खपत के लिये नवीन बाजारों और मंडियों की जरूरत थी और कारखानों में कच्चे माल की आवश्यकता भी थी। अतः यूरोप के प्रमुख औद्योगिक देशों ने अफ्रीका और एशिया में अधिक से अधिक देशों पर अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहा, जिससे कि उनकी दोनों उपर्युक्त आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाये। झग्लैण्ड विश्व का प्रथम देश था जिसने कच्चे माल की प्राप्ति के लिये और अपने तैयार माल की खपत के लिये विश्व के प्रमुख देशों की मंडियों पर अपना अधिकार जमाना प्रारंभ कर दिया। 19वीं सदी में फ्रांस,
जर्मनी अमेरिका तथा जापान का भी औद्योगिक शक्तियों के रूप में उत्थान हुआ और उन्होने भी विश्व के विभिन्न भागों में मंडियों की तलाश की। वह औपनिवेशिक साम्राज्यवाद की लालसा थी। इससे साम्राज्यवाद की प्रतिस्पर्धा बढ़ी। इस प्रकाश विश्व के पिछड़े हुए देशों में यूरोपीय देशों के उपनिवेश स्थापित हो जाने के कारण विश्व में यूरोप के देशों का साम्राज्यवाद फैल गया और विश्व के सभी महाद्वीप किसी न किसी रूप में यूरोप वालों के हाथ में आ गये। पूँजीवाद के विकास के लिये नये बाजारों की खोज, महाद्वीपों के विभिन्न भू-भागों पर अधिकार और वहाँ अपने साम्राज्य स्थापित करने में यूरोप के राष्ट्र सफल हो गये। पूँजीवाद विकसित होते-होते साम्राज्यवाद में स्थानांतरित हो गया।
महानगरों का निर्माण एवं राजनीतिक जागृति
विभिन्न खदानों और बड़े कारखानों और मिलों के पास बड़े नगर बस गये। मजदूरी के लिये गाँवों के लोग वहाँ जाकर बस गये। गाँवों की संख्या कम होने लगी और उद्योगों के स्थानों के समीप विशाल नगर बस गये। ऐसे नगरों की निरंतर वृद्धि हो जाने से वहाँ की जनसंख्या बढ़ी, इससे लोगों की दशा बिगड़ने लगी, उनकी विभिन्न समस्याओं में वृद्धि हुई, जैसे आवासों की कमी, गंदी बस्तियों की बाहुल्यता, सफाई और स्वास्थ्य का प्रश्न, अपराध, वृद्धि आदि। इससे उनमें राजनीतिक जागृति हुई। श्रमिकों की दशा सुधारने के लिये श्रमिक संघो का निर्माण हुआ। इन संघों ने श्रमिकों की भलाई के लिये सरकार के विरूद्ध आंदोलन एवं प्रदर्शन किये।
कई देशों में राजनीतिक पार्टियों ने श्रमिकों की माँगों का समर्थन किया। श्रमिकों के हित संवर्धन के लिये उनके अलग राजनीतिक दल बने, जैसे इंग्लैंड में लेबर पार्टी। अंत में श्रमिकों व जनता की दशा सुधारने के लिये अनेक जनतंत्रवादी और सुधारवादी आंदोलन प्रारंभ हुए और बाद में लोगों की दशा को ठीक करने के लिये कई सुधारवादी कानून बनाये गये।
अस्त्र-शस्त्रों की प्रतिस्पर्धा
औद्योगिक क्रांति के विकास से अनेक देशों ने अपनी सैन्य शक्ति उद्योगों के विकास पर निर्भर कर ली। औद्योगिक देश अधिक धन सम्पन्न होने से,
उन्होंने अपनी सेनाएँ और अस्त्र-शस्त्र बढ़ा लिये। उन्होंने नवीन आधुनिक श्रेष्ठ हथियार अधिक मात्रा में बनाये। इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका जैसे औद्योगिक रूप से विकसित देशों में उनकी सैनिक शक्ति भी श्रेष्ठ होती गयी। विश्व के प्रमुख देशों में अधिक से अधिक विध्वंसकारी शस्त्रों का निर्माण करने और सैनिक श्रेष्ठता प्राप्त करने की एक ऐसी प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हुई जो विश्व के दोनों विनाशकारी युद्धों का मूल कारण बन गयी।
आर्थिक प्रभाव एवं परिणाम
अधिक उत्पादन और धन की वृद्धि
औद्योगिक देशों में मशीनों द्वारा दैनिक जीवन की अनेक वस्तुओं का उत्पादन अधिक हुआ, इन वस्तुओं की बिक्री और व्यापार से औद्योगिक देश अधिक धन सम्पन्न और समृद्ध हो गये।
दैनिक जीवन में औद्योगिक क्रांति ने बिजली, पंखे, रेडियो, सुव्यवस्थित निवासगृहों, परिवहन व संचार के आधुनिक साधनों, नवीन चिकित्सा पद्धतियों और औषधालयो, उत्तम वस्त्र आदि ने जीवन में महान परिवर्तन ला दिये। इससे जीवन का स्तर ऊँचा उठ गया।
व्यापार और कृषि में उन्नति
औद्योगिक क्रांति से वस्तुओं का उत्पादन बड़े पैमाने पर हुआ, यूरोपीय देशों ने आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का निर्माण कर उनको यूरोप से बाहर अन्य देशों को भेजा।
इससे आंतरिक और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि हुई। इसी प्रकार औद्योगिक क्रांति ने कृषि के विकास मे भी योग दिया। नयी आविष्कृत मशीनों उत्तम बीजों और बढ़िया खाद के उपयोग से कृषि के उत्पादन में वृद्धि हुई।
ग्रामीण और कुटीर उद्योगों का अंत
नवीन कल-कारखानों और मिलों की वृद्धि के कारण पुराने ग्रामीण उद्योग-धंधे और कुटीर उद्योग नष्ट हो गये। गाँवों के बेकार कारीगर और मजदूर नगरों की ओर जाने लगे और वहाँ जो भी थोड़ी अधिक मजदूरी मिली उसी पर काम करने लगे।
मजदूरों की समस्याएँ तथा सुधारवादी कानून
विभिन्न कारखानों और मिलों तथा औद्योगिक केन्द्रों के समीप भारी संख्या में मजदूरों की बस्तियाँ बस गई। मजदूरों की अधिक माँग होने से कारखानों में खियाँ और बालक काम करने लगे। बढ़ती बेकारी और मजदूरों की संख्या में वृद्धि के कारण मजदूरी की दरें घट गयीं। उद्योगपतियों ने उनकी विवशता का अनुचित लाभ उठाया और मजदूरों का शोषण होने लगा। श्रमिकों से 14 से 18 घंटे काम लिया जाने लगा। छोटे बालक व स्त्रियाँ भी विवश होकर मजदूरी करने लगे। बच्चों को बहुत कम मजदूरी दी जाती थी।
7-8 वर्ष के बच्चे प्रातः 5 बजे से रात 8 बजे तक काम करते रहते थे। इससे मजदूरों की और उनके आवास व काम के वातावरण की कई समस्याएँ उत्पन्न हो गयीं। उनकी सोचनीय दशा में सुधार करने के लिये कई कानून बनाने पड़े। ब्रिटेन में 1833 ई. में प्रथम फैक्टरी एक्ट पारित हुआ, जिससे श्रमिकों के काम के घंटे निर्धारित हुए।
मजदूरों और पूँजीपतियों का संघर्ष
औद्योगिक केन्द्रों और बड़े-बड़े नगरों में श्रमिकों के वर्ग तथा उद्योगपतियों के वर्ग का उदय हुआ। औद्योगिक क्रांति से शोषक उद्योगपतियों और शोषित श्रमिक दो नवीन वर्गों का निर्माण हुआ।
उद्योगपतियों द्वारा किये जा रहे शोषण से मजदूरों में वर्ग भावना का उदय हुआ। उनको इस बात का बोध हुआ कि उनकी वास्तविक शक्ति उनकी एकता में ही है। फलतः मजदूर संगठित होने लगे और श्रमिक संघ अस्तित्व में आये। इससे श्रमिक आंदोलन प्रारंभ हुए। मजदूरों और पूँजीपतियों में अपने-अपने हितों, अधिकारों और स्वार्थों को लेकर भयंकर संघर्ष होने लगे। इससे नवीन आर्थिक और राजनीतिक विचारधाराओं का जन्म हुआ तथा नये सुधार हुए।
उद्योगों पर शासकीय नियंत्रण
नये नये कारखानों के निर्माण से कई दुर्गुण फैक्टरी जीवन में उत्पन्न हो गये। इसमें मजदूरों की सामाजिक और आर्थिक दशा दयनीय हो गयी।
कई प्रकार की दुर्दशा को सुधारने के लिये कई देशों की सरकारों ने अनेक कानून बनाये और खदानों, कारखानों और नये उद्योग-धंधों पर नियंत्रण करने का काम अपने हाथों में ले लिया।
नवीन आर्थिक और औद्योगिक संस्थाएँ
औद्योगिक केन्द्रों और व्यापारिक क्षेत्रों में व्यवस्था को ठीक करने के लिये और अच्छा संगठन करने के लिये कई नवीन आर्थिक और औद्योगिक संस्थाओं का निर्माण किया गया जैसे बैंक, स्टाक मार्केट, शेयर होल्डर्स मार्केट, सहकारी संस्थाएँ आदि। मजदूरों ने भी अपने हितों की रक्षार्थ पूँजीपतियों से संघर्ष करने हेतु अपने ट्रेड यूनियन या औद्योगिक संघ स्थापित किये।
सामाजिक प्रभाव एवं परिणाम
मध्यम वर्ग का विकास और वर्ग संघर्ष
औद्योगिक क्रांति और नवीन उद्योग व्यवसायों के फलस्वरूप समाज में धनी वर्ग, मध्यम वर्ग और श्रमिक वर्ग का जन्म हुआ और इनके पारस्परिक संघर्ष बढ़ने लगे जिससे राजनीतिक, सामाजिक क्षेत्र में क्रांतियाँ हुई और मध्यम वर्ग ने उनका नेतृत्व किया। इस प्रकार वर्ग संघर्ष को खूब प्रोत्साहन मिला और समाजवाद की नवीन विचारधाराएँ प्रकट हुई
प्राचीन सामाजिक व्यवस्था का अंत
कल-कारखानों से गाँवों के कुटीर उद्योग, शिल्पियों के गृह उद्योग नष्ट हो गये जिससे बेकारी बढ़ गयी और एक स्थान पर परिवार के सभी लोगों को काम,
मजदूरी या नौकरी नहीं मिलने से परिवार के लोग बिखर गये और परिवार प्रथा टूट गयी। पहले परिवार आर्थिक इकाई थे। पर अब उनका आर्थिक संगठन नष्ट हो गया। एक ही परिवार के सदस्य अलग-अलग स्थानों पर विभिन्न कल-कारखानों में काम करने लगे। इससे पुरानी सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो गयी। सामन्तवादी युग का ढाँचा बिखर गया व मनुष्यों के पारिवारिक संबंध बदल गये।
औद्योगिक शिक्षा का प्रचार व प्रसार
औद्योगिक दक्षता प्राप्त करने के लिये औद्योगिक और तकनीकी शिक्षा का प्रचार बढ़ा और इससे अप्रत्यक्ष रूप से सार्वजनिक शिक्षा की भी उन्नति हुई ।
नवीन सामाजिक संस्थाएँ
औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप आबादी का स्थानांतरण हुआ। औद्योगिक केन्द्रों में और खदानों के आसपास लोग बड़ी संख्या में छू-दूर से आकर बस गये। खेती का स्थान कारखानों, खदानों और नगरों में • विभिन्न कार्यों की मजदूरी ने ले लिया। बड़े नगरों की समस्याएँ बढ़ने लगीं, विभिन्न रोग, अपराध, व्यभिचार, दुराचार, व्यसन, जुआ, चोरी, मारकाट, हिंसा, लम्बी चाल वाले और स्वास्थ्य को हानि पहुँचाने वाले मकान, तंग गंदी गलियाँ नालियाँ, सड़कें आदि इन औद्योगिक नगरों की समस्याएँ हो गयीं। समाज के प्रत्येक वर्ग में अशांति और असंतोष फैल गया और धार्मिक तथा नैतिक पतन हुआ। कला साहित्य भी प्रभावित हुए सांस्कृतिक जीवन आमूल रूप से परिवर्तित हो गया।
इससे जन कल्याण की नवीन विचारधाराएँ और व्यवस्थाएँ कार्यान्वित की जाने लगीं। जीवन के सभी क्षेत्रों में समस्याओं को दूर कर विकास की ओर सक्रिय कदम उठाये जाने लगे।
नवीन दृष्टिकोण और विचारधाराएँ
औद्योगिक क्रांति के कारण प्राचीन सामाजिक व्यवस्था और रूढ़िवादिता को गहरा आघात पहुँचा। विभिन्न प्रकार की मशीनें, प्रकृति पर मनुष्य की विजय का प्रतीक बन गयीं। यंत्रों के उपयोग और उत्पादन में वृद्धि द्वारा मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रत्यक्ष अनुभव से भाग्यवाद और अंधविश्वास समाप्त होने लगा। तर्क, विवेक और बुद्धिनिष्ठ वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रोत्साहन मिला। आवागमन के द्रुतगामी साधनों से विश्व संकुचित होकर छोटा हो गया। इससे विभिन्न देशों में विचारों और ज्ञान-विज्ञान का आदान-प्रदान हुआ।
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