जाति प्रथा - caste system

जाति प्रथा - caste system


इनके अतिरिक्त अलबरूनी अपने वर्णन में हादी, डोम, चांडाल और वधाताऊ जातियों का उल्लेख करता है। ये जातियाँ किसी वर्ग के अन्तर्गत नहीं आती थीं। इनका कार्य नगर, कस्बे तथा ग्राम की सफाई करना था। ये चारों वर्णों की अवैध संतान कहलाते थे।


पूर्व मध्यकाल में कायस्थ जाति का उल्लेख मिलता है। चारों वर्णों में कायस्थों की क्या स्थिति थी इस विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता। सम्भवतः कायस्थों का संबंध शासन से था। वे न्यायाधीश महकमों के अध्यक्ष तथा लेखा जोखा का कार्य करते थे।

मुस्लिम इतिहासकार इब्नखुर्दबदा के अनुसार भारतीय समाज सात भागों में विभक्त था सबकुप्रया- इसमें सर्वोच्च जाति के लोग रहते थे। राजा का चुनाव इसी वर्ग से होता था। शेष छह वर्गों के व्यक्ति इनका सम्मान करते थे। दूसरे वर्ग के अन्तर्गत - ब्राह्मण आते थे। ये सुरा तथा सभी व्यसनों से दूर रहते थे। तीसरा वर्ग कटारिया संभवतः क्षत्रिय जाति का था। ये तीन प्याले से अधिक सुरा का पान नहीं कर सकते थे। चैथा वर्ग सुदरियों का था। ये व्यवसाय करते थे। संभवतः इब्नखुर्दबदा ने वैश्यों को सुदरिया कहा है। पाँचवाँ तथा छठवाँ वर्ग बसुरिया तथा संडलिया का था बसुरिया बाँस से विभिन्न वस्तुओं का निर्माण करते थे तथा संडलिया का कार्य चांडलों के समान था। सातवाँ वर्ग लाहुद जाति का था इस जाति की स्त्रियाँ अपने को सजाने सँवारने में व्यस्त रहती थीं तथा पुरुष विभिन्न खेलों तथा तमाशों के प्रदर्शन का कार्य करते थे।


उपरोक्त वर्णित वर्णों की सामाजिक स्थिति में भिन्नता थी। अलबरूनी का कथन है कि इन वर्णों में आपस में सामान्यतः खान-पान नहीं होता था। शूद्र तथा उससे निम्न जाति वालों के यहाँ उच्च वर्ग के व्यक्ति पानी भी नहीं पीते थे। हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर प्रकाश डालते हुए वह कहता है किहिंदू म्लेच्छों के यहाँ अन्न जल ग्रहण नहीं करते थे। यदि किसी हिंदू दास को म्लेच्छ अपने देश ले जाते थे तो वहाँ से लौटने पर शुद्धीकरण के पश्चात् समाज उसे पुनः अपना लेता था। इस समय जबकि बलात् हिन्दुओं को मुसलमान बनाया जाता था शुद्धीकरण की यह प्रक्रिया सत्य प्रतीत होती है। दास प्रथा का प्रचलन था । राजशेखर और अलबरूनी दोनों दासों का वर्णन करते हैं। राज महल की दासियों की दशा अच्छी थी, वे राजकुमारियों की सखियों की भाँति रहती थीं। चंवर डुलाने वाली, तलवार लिये, केश संवारने वाली, बालिये, पानदान उठाने वाली, माला लिये, स्नान कराने वाली, ढाल, तलवार लिये केश तथा कविता करने वाली स्त्रियों का वर्णन मिलता है। इससे स्पष्ट है कि खियाँ सेवा तथा रक्षा दोनों कार्य करती थीं।