चाहमान वंश - Chahamana dynasty

चाहमान वंश - Chahamana dynasty


वंशावली


(1) वासुदेव (संस्थापक 551 है.


(3) नरदेव,


(5) विग्रहराज प्रथम,


(7) गोपेंद्रराज,


(9) गूवक प्रथम,


(11) गूवक द्वितीय,


(13) वाक्पतिराज प्रथम, 


(15) विग्रहराज द्वितीय,


(2) सामंतराज,


(4) अजयराज प्रथम जयराज,


(6) चंद्रराज प्रथम,


(8) दुर्लभराज प्रथम,


(10) चंद्रराज द्वितीय,


(12) चंदनराज


(14) सिंहराज


(16)द्वितीय



गोविन्दराज द्वितीय,


(18) वाक्पतिराज द्वितीय,


(19) वीर्यराम,


(20) चामुण्डराज


(22) विग्रहराज तृतीय,


(21) दुर्लभराज तृतीय,


(24) अजयराज द्वितीय (1105-1130 ई.),


(26) विग्रहराज चतुर्थ (1150-1164 ई.),


(23) पृथ्वीराज प्रथम,


(25) अर्णोराज (1130-1150 ई.),


(28) पृथ्वीराज द्वितीय (1164-1169 ई.),


(30) पृथ्वीराज तृतीय (1178-1192 ई.),


(27) अपरगांगेय (1164 ई.),


(29) सोमेश्वर (1169-1177 ई.),


(31) हरिराज (1198 ई.),


प्रमुख शासक: अजयराज, अर्णोराज विग्रहराज चतुर्थ और पृथ्वीराज तृतीय। 


अजयराज


यह इस वंश का अन्य प्रतापी नरेश था जिसने बारहवीं सदी में शासन किया।

सोमेश्वर के बिजोलिया अभिलेख के अनुसार परमार चाहमान सीमाओं पर अवंतिराज नरवर्मा (1094-1133 ई.) की सेनाओं से उसकी भयंकर लड़ाई हुई, जिसमें विजयश्री उसी के हाथों में रही। उसने तुर्कों के निरंतर आक्रमणों का प्रतिरोध किया, मालवा के परमार राजाओं से संघर्ष किया और अपने राज्य की सीमा की वृद्धि की। उसने अजयमेरू (अजमेर) नामक नगर स्थापित किया और इसे अपनी राजधानी बनाया। उसने इस नगर को राजप्रासादों, भवनों, और मंदिरों से अलंकृत किया।


अर्णोराज


अजयराज का उत्तराधिकारी उसका पुत्र अर्णोराज था। यह भी प्रसिद्ध नरेश था। उसने अजमेर के समीप अर्णोसागर झील और बाँध बनवाकर मुसलमानों के आक्रमणों से अपवित्र भूमि को पवित्र किया।

इसी झील के तट पर पुष्कर तीर्थ बसाया गया। संभवतः सन् 1150 के लगभग अर्णोराज और कुमारपाल में परस्पर युद्ध हुआ था।


विग्रहराज चतुर्थ


यह बड़ा प्रतापी और सफल शासक था। उसने बड़ी वीरता और साहस से मुसलमानों से संघर्ष किया और यमुना तथा सतलज नदी के बीच के प्रदेश को उनसे छीन लिया। उसने तोमर राजपूत नरेश से दिल्ली भी छीनकर उसके पार्श्ववर्ती प्रदेश पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। वह एक पराक्रमी योद्धा, वीर, सेनानी, महत्वाकांक्षी विजेता होने के साथ-साथ योग्य शासक और साहित्य तथा कला का उदार संरक्षक भी था।

अजमेर में उसने सरस्वती का एक प्रसिद्ध मंदिर और संस्कृत महाविद्यालय का निर्माण किया था। बाद में इल्तुतमिश ने इन्हें नष्ट कर इनके भग्नावशेषों पर एक मस्जिद निर्मित की जो आजकल “अढ़ाई दिन के झोपड़े" के नाम से प्रख्यात है। विग्रहराज विद्वानों का आदर करता था और वह स्वयं भी एक यशस्वी लेखक और कवि था। उसने दो नाटकों की रचना की। 'अढ़ाई दिन के झोपड़े' में उपलब्ध उसके द्वारा रचित हरिकेली नाटक के कुछ अंश उसकी साहित्यिक प्रतिभा के उदारहण हैं। उसकी राजसभा के कवि सोमदेव ने बीसलदेव की प्रशस्ति में 'ललित विग्रहराज' नामक नाटक की रचना की।


पृथ्वीराज तृतीय


यह चैहान वंश का सबसे अधिक प्रसिद्ध और प्रतापी नरेश था। इसकी प्रशस्ति में इसके राजकवि चंदबरदाई ने ‘पृथ्वीराज रासो नामक अपभ्रंश महाकाव्य और जयानक ने पृथ्वीराज विजय नामक संस्कृत काव्य की रचना की।

राज्य विस्तार की अपनी महत्वकांक्षा वीरता और युद्धप्रियता से उसने पार्श्ववर्ती देशों को नतमस्तक कर उन्हें अपना शत्रु बना लिया। उसने मध्यप्रदेश में जैजाकभुक्ति के चंदेल नरेश परमर्दिदेव को सन् 1182 में परास्त किया और गुजरात के चालुक्य नरेश भीम द्वितीय से भी युद्ध कर उसे पराजित किया। स्वयंवर में संयोगिता का अपहरण कर उसने कन्नौज के गहड़वाल नरेश जयचंद्र को भी अपना शत्रु बना लिया। स्वयंवर के बाद हुए संघर्ष में उसने गहड़वाल नरेश की सेना को परास्त कर दिया।

पृथ्वीराज की दिग्विजयों से प्रभावित होकर मालवा के परमार नरेश ने पृथ्वीराज से बिना युद्ध किये मैत्री कर ली। फलतः पृथ्वीराज ने परमार राजकुमारी इंछिनी से विवाह भी कर लिया। यद्यपि इस प्रकार समस्त उत्तरी भारत में पृथ्वीराज की प्रभुता स्थापित हो गई थी, परंतु उसका अन्य राजाओं से वैमनस्य था। गजनी के तुर्क नरेश शहाबुद्दीन मोहम्मद गोरी ने उत्तरी भारत के राजाओं की पारस्परिक शत्रुता और गृह कलह का लाभ उठाया और उसने पश्चिमोत्तर प्रदेश पंजाब और दिल्ली पर आक्रमण किये। हम्मीर महाकाव्य के अनुसार पृथ्वीराज ने गोरी को अनेक बार परास्त कर, खदेड़ कर, छोड़ दिया। सन् 1191 में गोरी ने विशाल सेना से भारत पर आक्रमण किया।

पृथ्वीराज ने भारतीय नरेशों का एक सैनिक संघ बना कर गोरी को तराइन के युद्ध में बुरी तरह परास्त कर दिया। गोरी रणक्षेत्र में अत्यधिक घायल हुआ और अपनी जान लेकर भागा। अपनी इस पराजय से वह अत्यधिक क्षुब्ध हुआ और पूर्ण योजना बनाकर तैयारी से उसने सन् 1193 में पुनः विशाल सेना सहित दिल्ली पर आक्रमण किया। पृथ्वीराज ने गोरी का सामना करने के लिए पुनः भारतीय राजाओं का एक संघ बनाया। इसमें कन्नौज का राजा जयचंद्र सम्मिलित ही नहीं हुआ, अपितु ऐसा कहा जाता है कि उसने गोरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित भी किया। तराइन के मैदान में द्वितीय बार पृथ्वीराज और गोरी के मध्य भयंकर युद्ध हुआ। इसमें पृथ्वीराज पराजित हुआ और रणक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुआ। पृथ्वीराज की पराजय से अजमेर और दिल्ली दोनों ही, जहाँ चैहान वंश का राज्य था, तुर्कों के अधिकार में आ गये।