चंदेल वंश - Chandela dynasty
चंदेल वंश - Chandela dynasty
वंशावली
(1) नन्नुक (831-844 ई.),
(3) जयशक्ति
(5) राहिल (900-915 ई.),
(9) गण्ड (1003-1017 ई.),
(13) कीर्तिवर्मा (1060-1100 ई.),
(7) यशोवर्मा (930-950 ई.),
(11) विजयपाल ( 1030-1050 ई.),
(15) जयवर्मा ( 1115-1120 ई.),
(19) परिमर्दिदेव (1165-1202 ई.),
(17) मदनवर्मा (1129-1163 ई.),
(21) अन्य उत्तराधिकारी।
प्रमुख शासकः यशोवर्मा, धंग विद्याधर और मदनवर्मा। यशोवर्मा
(2) वाक्पति (844-870 ई.),
(6) हर्ष (915-930 ई.)
(4) विजयशक्ति (870-900 ई.).
(8) धंग (950-1002 ई.),
(12) देववर्मा (1050-1060 ई.),
(16) पृथ्वीवर्मा (1120-1129 ई.),
(10) विद्याधर ( 1018-1029 ई.),
(14) सल्लक्षवर्मा ( 1100-1115 ई.),
(18) यशोवर्मा द्वितीय ( 1163-1165 ई.),
(20) त्रैलोक्यवर्मा (1203-1247 ई.).
प्रारंभिक चंदेल राजाओं में यशोवर्मन बड़ा शक्तिशाली तथा प्रतापी राजा हुआ। उसने मालवा, चेदि और महाकौशल को जीतकर अपना राज्य विस्तृत कर लिया।
उसने कालिंजर को अपने अधिकार में कर लिया और महोबा को अपनी राजधानी बनाया। उसने प्रतिहारों के राजा देवपाल को बाध्य कर उससे विष्णु की मूर्ति खजुराहो मंदिर के लिये उपहार स्वरूप प्राप्त की। धंग
यशोवर्मन का उत्तराधिकारी उसका पुत्र धंग था। उसने उत्तर तथा दक्षिण के कई राज्यों पर विजय प्राप्त की। उसने प्रतिहारों से गोपाद्रि या ग्वालियर छीन लिया। उसने दक्षिण में चेदि तथा मालवा के राजाओं को परास्त कर अपने राज्य की सीमा बढ़ाई।
उसने तुर्कों के विरूद्ध जयपाल की सैनिक सहायता भी की थी। उसने गंगा-यमुना के संगम में शिव का जप करते हुए जल समाधि ले ली थी। विद्याधर गण्ड के पश्चात् 1018 ई. में उसका पुत्र विद्याधर चंदेल साम्राज्य की गद्दी पर बैठा। वह अपने पितामह धंग की भाँति शक्तिशाली और युद्धप्रिय सम्राट था। उसका काल चंदेल सत्ता के परमोत्कर्ष और सर्वाधिक गौरव का काल माना जाता है।
तुर्की के आक्रमणों से डर कर प्रतीहार नरेश राज्यपाल 1018-1019 ई. में महमूद से लड़े बिना भाग जाने के कारण विद्याधर,
राज्यपाल पर अत्यधिक क्रोधित हुआ। विद्याधर ने राज्यपाल को दण्डित करने के लिए उसके राज्य पर आक्रमण कर उसे परास्त कर मौत के घाट उतार दिया। इब्न-उल्- अतहर विद्याधर के बारे में लिखता है कि राज्यपाल को दण्डित करने से विद्याधर की राजनीतिक प्रतिष्ठा बढ़ गई और महमूद के वार्षिक आक्रमणों से त्रस्त राजा उसकी ओर देखने लगे।
अतः विद्याधर ने अपनी विशाल सेना को संगठित और शक्तिशाली बनाकर उसके आक्रमण की चुनौतियों का दृढतापूर्वक मुकाबला करने का निश्चय किया। महमूद को अपने भारतीय सैनिक अभियान में विद्याधर एक ऐसी चट्टान के रूप में मिला जिसे वह तोड़ न सका। मदनवर्मन
पृथ्वीराज के बाद उसका पुत्र मदनवर्मा राजगद्दी पर आसीन हुआ। वह अपने वंश का एक शक्तिशाली राजा सिद्ध हुआ। उसके समय के पन्द्रह अभिलेख तथा सोने एवं चाँदी के सिक्के उपलब्ध हुए हैं जो उसकी राजनीतिक प्रतिष्ठा एवं आर्थिक समृद्धि के द्योतक हैं। मदनवर्मा विद्याधर के बाद अपने वंश का सर्वाधिक प्रतापी राजा प्रमाणित हुआ जिसने अपने समकालीन चैलुक्यराज जयसिंह सिद्धराज और गोविंद चंद्र गहड़वाल जैसे महत्वाकांक्षी राजाओं को अपनी ओर आँख उठाने का कोई अवसर नहीं दिया। मदनवर्मा अपने समय का एक महान् सम्राट सिद्ध हुआ। उसने चंदेल वंश की प्रतिष्ठा को पुनस्थापित करने के प्रयत्न किये जिसमें उसे सफलता भी मिली।
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