वर्ण व्यवस्था - character system

वर्ण व्यवस्था - character system


पूर्व मध्यकालीन वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोच्च था। अलमसूदी तथा अलबरूनी के कथन से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है। इनका प्रमुख कार्य अध्ययन व अध्यापन, यज्ञ करना, पूजा करना तथा बलि देना था। कुछ ब्राह्मणों ने अन्य व्यवसाय भी अपना लिये थे क्योंकि वर्णाश्रम व्यवस्था में शिथिलता आने लगी थी। कुछ ब्राह्मण राज्य में उच्च पदाधिकारी थे तो कुछ ने व्यापार करना प्रारंभ कर दिया था। यों तो ब्राह्मण अन्य कोई भी व्यवसाय अपना सकता था परंतु यह समाज में अच्छा नहीं समझा जाता था। वल्लभट्टस्वामिन के ग्वालियर अभिलेख में ग्वालियर दुर्ग के कोट्टपाल अल्ल को ब्राह्मण जाति का बताया गया है।

अबू जैद का भी कथन है कि धार्मिक कार्य में रत व्यक्ति ब्राह्मण कहलाते थे तथा दरबार में कवि, ज्योतिषी, दार्शनिक आदि का कार्य भी करते थे। ब्राह्मणों के पश्चात् समाज में दूसरा वर्ग क्षत्रियों का था इनका युद्ध और शासन का कार्य करना था। राजपूतों के गुणों की प्रशंसा करते हुए कर्नल टाड महोदय ने लिखा है, "उच्चकोटि का साहस, देशभक्ति, स्वामिभक्ति, आत्म-सम्मान, अतिथि सत्कार तथा सरलता के गुण राजपूतों में पाये जाते हैं।" इस सम्बन्ध में डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है, परंतु राजपूत सामाजिक जीवन में कम ऊँचे न थे। वे वीर तथा रणप्रिय होते थे और सम्राट आर्थर के गोलमेज के वीरों की शति उच्चादर्षो की रक्षा के लिये उद्यत रहते थे।" वैश्यों का समाज में तीसरा स्थान था। इनका कार्य कृषि व व्यापार करना था।


वर्ण व्यवस्था में शूद्रों का स्थान निम्न था। इनका कार्य उपरोक्त सभी वर्णों के व्यक्तियों की सेवा करना था। इन्हें धार्मिक कार्य तथा पूजा उपासना की अनुमति नहीं थी परंतु मेघातिथी के मतानुसार शूद्र यजनयाजन और बलि जैसे प्रकरण, श्राद्ध, अष्टका और वाषवदेव आदि धार्मिक कार्य कर सकते थे। शूद्रों में ऊँच-नीच की भावना थी। जो जातियाँ अधिक गंदे कार्य करती थीं वे अंत्यज कहलाती थीं इसके अन्तर्गत धोबी, मोची, जुलाहे, नट, टोकरी बनाने वाले, कुंजडे, मछली मारने वाले और शिकारी आते थे।


ये नगर ग्राम या कस्बे के बाहरी भाग में रहते थे। इनका स्पर्श वर्जित था तथा असावधानी वश स्पर्श होने पर शुद्धि के लिये स्नान तथा प्रायश्चित करना होता था।