इंग्लैण्ड का औपनिवेशिक साम्राज्य - colonial empire of england
इंग्लैण्ड का औपनिवेशिक साम्राज्य - colonial empire of england
यूरोप में इंग्लैण्ड ऐसा राष्ट्र था जिसके पास सबसे अधिक उपनिवेश थे। एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों में इंग्लैण्ड का साम्राज्य फैला हुआ था। इन औपनिवेशिक देशों से इंग्लैण्ड को सुविधापूर्वक कच्चा माल प्राप्त हो जाता था और उसके कारखानों में निर्मित वस्तुओं का विक्रय भी इन उपनिवेशों की मंडियों में हो जाता था। 1.2.4.5 उत्कृष्ट नौ सेना
इंग्लैण्ड के पास सबसे अधिक शक्तिशाली सेना थी। इस शक्तिशाली सेना से इग्लैण्ड का विदेशी व्यापार सुविधापूर्वक संचालित होता था।
इस बलशाली जल सेना के माध्यम से इंग्लैण्ड विश्व के दूरस्थ कोनों से भी बिना किसी व्यवधान के उसके कल-कारखानों के लिये कच्चा माल प्राप्त करता था और अपने देश में निर्मित वस्तुओं को वहाँ सरलता से भेज सकता था।
स्वतंत्र विचारों का वातावरण
ब्रिटेन में 1688 ई. की वैभवशाली क्रान्ति के बाद लोकतंत्र स्थायी हो गया। इस लोकतंत्र ने ब्रिटेनवासियों को निर्भिक बना दिया और ये स्वतंत्र भाव से नित्य नवीन बातें सोचने लगे। नयी खोजों और उनके उपयोग के लिये स्वातंत्र्य और निर्भीक वातावरण आवश्यक होते हैं।
नये स्वतंत्र वातावरण ने वैज्ञानिकों तथा आविष्कारकर्ताओं को नये-नये प्रयोग तथा आविष्कार करने के लिये प्रेरित किया। फलतः नयी-नयी मशीनों और यंत्रों के आविष्कार हुए और यातायात तथा संचार के साधनों में वृद्धि हुई। नयी खोजों के परिणामस्वरूप नवीन मशीनों और कारखानों के निर्माण को गति मिली। इसके अतिरिक्त ब्रिटेन में सुव्यवस्थित शासन पद्धति होने से कृषि और उद्योग में वैज्ञानिक ढंग से मौलिक परिवर्तन हो सके।
लोहे व कोयले की पर्याप्त मात्रा
यंत्रों और कारखानों के निर्माण के लिये लोहे और कोयले की उपलब्धि आवश्यक थी।
इलैण्ड में पश्चिमी और उत्तरी भागों में लोहे और कोयले की समृद्ध खानों के पास-पास प्राप्त हो जाने से मशीनों और कारखानों के निर्माण में गति मिली और औद्योगिक क्रान्ति को प्रोत्साहन मिला।
अन्य अनुकूल स्थितियाँ
लोहे और कोयले की खानों के साथ-साथ ब्रिटेन की कुछ अन्य परिस्थितियाँ भी औद्योगिक क्रान्ति के अनुकूल थीं। वहाँ की नम हवा कपड़ा उद्योग के लिये आदर्श थी। साम्राज्य विस्तार के कारण ब्रिटेन के अधीन नवीन प्रदेशों से कच्चे मालों की पूर्ति कल-कारखानों के लिये हो रही थी।
तैयार माल की खपत के लिये ब्रिटेन के अधीन विस्तृत बाजार और मंडियाँ थीं। फलतः लोगों की प्रवृत्ति नवीन आविष्कारों, अन्वेषणों और सुधारों की ओर झुकी। इन अनुकूल परिस्थितियों ने ब्रिटेन में औद्योगिक क्रान्ति का मार्ग प्रशस्त किया। 1.2.4.9 श्रमिकों की संख्या वृद्धि
17वीं सदी में इंग्लैण्ड में ऊन का व्यवसाय अधिक था। अतः भेड़ों को पालने और चराने के लिये कृषि भूमि पर जमींदारों ने बाड़े लगा दिये। 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में जमींदारों ने लगभग 35 लाख एकड़ भूमि कृषकों को कोई मूल्य दिये बिना ही भेड़ों के लिये विशाल बाड़ों से घेर ली थी।
इससे छोटे कृषक और खेतिहर मजदूर कृषि और मजदूरी से वंचित होकर बेकार हो गये। अतः मजदूरी के लिये ये लोग शहरों में कारखानों में गये। इसी बीच मशीनों के उत्पादन के कारण स्वतः के उत्पादन साधनों से वंचित कारीगर और श्रमिक भी कृषकों और खेतिहर मजदूरों की भाँति ही शहर के कारखानों में अल्प मजदूरी में ही काम करने लगे। इस प्रकार कारखानों में मशीनों से उत्पादन के लिये अत्यन्त ही अल्प मजदूरी में अनेकानेक मजदूर मिल गए। इससे औद्योगिक क्रान्ति की गतिशीलता में वृद्धि हुई।
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