औपनिवेशिक साम्राज्यवाद - colonial imperialism

औपनिवेशिक साम्राज्यवाद - colonial imperialism


यूरोपीय राज्यों के बीच संघर्ष ने औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना की प्रक्रिया को जन्म दिया। फलतः यूरोप के विभिन्न राज्य, जैसे- स्पेन, पुर्तगाल, इंग्लैण्ड और फ्रांस विभिन्न क्षेत्रों में साम्राज्य विस्तार का कार्य करने लगे। यूरोपीय राज्यों की साम्राज्य स्थापना की इस प्रक्रिया को साम्राज्यवाद की संज्ञा दी गयी। फ्रांस ने कनाडा में और इंग्लैण्ड ने अमेरिका में अपना प्रभाव क्षेत्र स्थापित कर लिया।


साम्राज्यवाद ने यूरोप की राजनीति में एक नये सिद्धान्त को जन्म दिया, जिसे शक्ति-संतुलन का सिद्धान्त कहते हैं। इस सिद्धान्त के परिपालन के लिये यूरोपीय राज्यों के बीच गुट निर्माण की नवीन पद्धति का सूत्रपात हुआ।

'शक्ति-संतुलन के सिद्धान्त का तात्पर्य यह है कि किसी भी राष्ट्र को इतना शक्तिशाली न होने दिया जाये, जिससे कि वह अन्य राज्यों के लिए खतरे का कारण बन जाये। 


राष्ट्रीय भावना का विकास


बारूद के आविष्कार ने सामन्तीय व्यवस्था की जड़ें खोखली कर दीं और उसके स्थान पर केन्द्रीय शक्ति का विकास हुआ। धार्मिक आन्दोलन के कारण लोगों में राष्ट्रीयता की भावना जागृत हुई और राष्ट्रीय चर्चों की स्थापना की गई। लूथरवाद ने जर्मन राष्ट्रीयता,

कैल्विनवाद ने डच राष्ट्रीयता और आंग्ल चर्च ने ब्रिटिश- राष्ट्रीयता की भावना को जन्म दिया। इसी समय यूरोप के अनेक विद्वानों द्वारा राष्ट्रीय भाषाओं में प्रादेशिक साहित्यों का सृजन किया गया। इन बातों से यूरोप में राष्ट्रीयता की भावना का अभ्युदय हुआ। इस कारण समान जाति, धर्म और भाषा वाले लोगों ने अपने को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने का कार्य प्रारम्भ किया। राष्ट्रीयता की भावना के विकास के कारण यूरोप का विभिन्न देशों में विभाजन भी प्रारम्भ हो गया।


कला का विकास


इस काल में कलाकारों और शिल्पियों ने भी प्राचीन ललितकलाओं से प्रेरणा प्राप्त की और नये आदर्श स्थापित किये। मध्ययुगीन कला धर्म से प्रभावित थी,

पर प्राचीन साहित्य और कला के प्रति विद्वानों और कलाकारों की अभिरूचि एवं अध्ययनशीलता ने मध्यकालीन विविध कलाओं के स्वरूप को परिवर्तित और परिवर्द्धित कर दिया। अतः कला के सभी क्षेत्रों में प्राचीनता के आदर्श अपनाये जाने लगे और उनकी उन्नति होने लगी । पुनर्जागरण के युग में कला के विविध अंगों मूर्ति निर्माण, स्थापत्य कला, चित्रकला और संगीत-कला का जो अपूर्व विकास हुआ, उसका संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है-



मूर्ति कला


पुनर्जागरण के काल में मूर्तिकला का प्रथम पथ-प्रदर्शक लोरेंजो गिबर्टी था। बाद के कलाकारों ने उनसे अनुप्राणित होकर मूर्तिकला को विकसित किया।

इन कलाकारों में दोनाटेलोए लुकादेला रोबियाए माइकेल एंजलो आदि प्रमुख थे। इनमें माइकेल एंजलो का नाम सबसे अधिक प्रसिद्ध है। उनकी कृतियों में आदर्श और यथार्थ का उचित सम्मिश्रण था। रोम में निर्मित मोसेज और फलोरेन्स में स्थित मेडिसी के गिरजाघरों की मूर्तियाँ इनकी उत्कृष्टतम कृतियाँ मानी जाती हैं। उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेक मूर्तियों का निर्माण किया। उनके द्वारा निर्मित मूर्तियों में सौन्दर्य-बोध अद्भुत था। वे मूर्तिकार और चित्रकार के साथ-साथ कवि भी थे। उनकी कृतियाँ उनकी अमरता का प्रमाण हैं। उनका काल 1475 ई. - 1564 ई. के बीच माना जाता है। वे कला की सभी विधाओं में पारंगत थे। 


स्थापत्य कला


मध्यकाल की स्थापत्य-कला में गॉथिक शैली की प्रधानता थी।

पुनर्जागरण के काल में स्थापत्य- कला के क्षेत्र में नवीन शैलियों का आविर्भाव हुआ, जिसमें मौलिकता और जीवंतता प्रमुख थी। इस काल में कलाकारों ने प्राचीन यूनानी और रोमन शैलियों को पुनस्थापित करने का प्रयास किया। स्थापत्य कला के क्षेत्र में एकता, सौन्दर्य और सूक्ष्मता के दर्शन हुए। इस काल में स्थापत्य कला का प्रारम्भ फलोरेन्स निवासी फिलियो ब्रुनेश्लेची द्वारा हुआ। इटली का सेंट पीटरर्स चर्च स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। इस कला के विकास में राफेल और माईकल एंजलो के नाम भी उल्लेखनीय हैं। 


 चित्रकला


राफेल उस युग का महत्वपूर्ण चित्रकार था, जिसने अपने चित्रों में सौन्दर्य, प्राणवता और भव्यता का दर्शन कराया।

उसने अपने चित्रों में नारी के भावों का बड़ी सजीवता के साथ चित्रण किया है। उसका काल 1483 से 1520 के बीच रहा। वह अल्पायु में ही परलोकवासी हो गया। स्पेन के शासक फिलिप द्वितीय और फ्रांस के शासक फ्रांसिस प्रथम ने इस कला को प्रोत्साहित किया। तत्पश्चात अन्य राज्यों ने भी चित्रकला को संरक्षण दिया।


यूरोप की मध्यकालीन चित्रकला धर्म से प्रभावित थी, पर पुनर्जागरण के काल में यथार्थ के चित्रण पर जोर दिया गया। चित्रों को जीवन के अधिक समीप लाने का प्रयास किया गया।

अन्य कलाओं की तरह चित्रकला के क्षेत्र में भी इटली ने यूरोप के अन्य राज्यों का पथ प्रदर्शन किया। राजाओं का आश्रय पाकर चित्रकला का विकास होने लगा। चित्रकला के क्षेत्र में लिओनार्दो द विन्सी का योगदान अत्यन्त ही महत्वपूर्ण था। वे अनेक गुणों की खान थे। वे इंजीनियर, संगीतकार, दार्शनिक और चित्रकार थे। उनमें अद्भुत कल्पनाशीलता और भाव-भंगिमा थी। वह फलोरेन्स का निवासी था और उसकी कृतियाँ उनकी प्रसिद्धि का प्रमाण हैं। मोनालीसा उनकी एक अमर कृति है। उनके चित्रों में प्रकृति और मानव जीवन की विशेषताओं का चित्रण बड़ी सजीवता के साथ किया गया है। उनका काल 1452 ई. से 1519 ई. के मध्य था। 


संगीत कला


पुनर्जागरण के काल में संगीत-कला के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। संगीत भी यूनानी और रोमन आदर्शों से प्रभावित हुआ। इटली में, इस युग के अनेक संगीतज्ञ थे, जिनमें ग्रेविली और पेलेस्ट्रीना आदि के नाम प्रमुख हैं।


लोक भाषाओं का विकास


मध्यकाल में लैटिन और यूनानी भाषाओं की प्रधानता के कारण लोक भाषाओं का विकास बड़ी धीमी गति से हुआ, पर 16वीं सदी में लोक भाषाओं में रचित राष्ट्रीय साहित्य की गई जिसके प्रति लोगों का रूझान बढ़ने लगा, क्योंकि सर्वसाधारण लोग कठिन लैटिन और यूनानी भाषाओं की अपेक्षा लोक भाषाओं में रचित साहित्य को अधिक पसंद करते थे। छापेखाने ने लोगों में राष्ट्रीय साहित्य के अध्ययन के प्रति रूचि को बढ़ाने में सहायता पहुँचाई।

छापेखाने की सहायता से अधिक संख्या में पुस्तकें जनता के अध्ययन के लिये उपलब्ध होने लगीं। अब बड़ी संख्या में लोक-भाषाओं में रचित साहित्य, शब्द कोष, व्याकरण एवं पत्र- पत्रिकाएँ भी प्रकाशित होने लगी। राष्ट्रीय साहित्य में मार्टिन लूथर द्वारा जर्मन भाषा में लिखित बाईबिल, जॉन काल्विन द्वारा रचित "इन्स्टीट्यूट ऑफ दी क्रिश्चियन रिलीजन आदि प्रभावशाली रचनाएँ हैं। इस तरह इटली का मार्ग-दर्शन प्राप्त कर यूरोप में भी राष्ट्रीय साहित्य का सृजन होने लगा। दांते और पेट्रार्क जैसे विद्वानों ने इटालियन साहित्य को अमरता प्रदान की। इंग्लैण्ड के राष्ट्रीय साहित्य के निर्माण में मिल्टन, शेक्सपियर और टॉमस मूर आदि ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस तरह अब यूरोप में राष्ट्रीय साहित्य का उत्तरोत्तर विकास होने लगा।


इस प्रकार पुनर्जागरण होना यूरोप की एक महान् घटना थी। पुनर्जागरण का विद्यालयों, विश्वविद्यालयों तथा सम्पूर्ण समाज पर बहुत प्रभाव पड़ा। ऑक्सफोर्ड तथा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालयों में नये कॉलेज खोले गये। उच्च वर्ग में शिक्षा-संस्कृति का प्रचलन हो गया। इस आन्दोलन के परिणामस्वरूप 15वीं सदी के अंतिम पच्चीस वर्षों में काव्य के महान् पुष्प खिले। एक ऐसे युग का प्रादुर्भाव हुआ जिसमें पृथ्वी के नये क्षेत्र, चेतना के नवीन आयाम, एक साथ उद्घाटित हुए। वास्तव में यह एक महान् युग का प्रारम्भ था जिसके सुप्रभात में जीवन वरदान था।


भौगोलिक खोजें


आधुनिक यूरोप के प्रारम्भिक वर्षों में सांस्कृतिक पुनर्जागरण के साथ ही भौगोलिक खोजें भी बड़ी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

मध्ययुग में मुस्लिम आक्रमणकारियों की भारतीय विजयों के परिणामस्वरूप निकट- पूर्वी एवं मध्य-पूर्वी देशों के साथ भारत का व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हो गया था। किन्तु कुस्तुन्तुनि या के मार्ग के अवरूद्ध होने और पुनर्जागरण के कारण यूरोप में भौगोलिक अनुसंधान का कार्य प्रारम्भ हुआ, जिसने वहाँ के व्यापारियों और धार्मिक संस्थाओं के लिए नवीन कार्यक्षेत्र प्रस्तुत किया। केन्द्रीकृत राष्ट्रीय राज्यों के विकास ने सामुद्रिक गतिविधियों और भौगोलिक खोजों के कार्यों को और भी गति प्रदान की। इस कारण यूरोपीय देशों के जीवन की गतिशीलता में पर्याप्त रूप से वृद्धि हुई और यूरोपवासी नवीन देशों के साथ सम्पर्क साधने को प्रोत्साहित हुए।


मध्ययुगीन व्यापार-मार्गों के बन्द हो जाने से यूरोपीय उपभोक्ताओं को पूर्वी देशों से प्राप्त दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति न हो सकी। अतः अब राज्यों द्वारा प्रोत्साहित होकर यूरोपीय साहसी नाविकों ने नये मार्गों की खोज प्रारंभ की। सौभाग्यवश इस समय तक कम्पास का आविष्कार हो चुका था, जिसके द्वारा दिशाओं का सही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता था। 15वीं सदी के उत्तरार्द्ध में बड़े उत्साह, लगन एवं अध्ययन के साथ नये व्यापार मार्गों की खोजें पूर्वी देशों से सम्बन्ध स्थापन हेतु आरम्भ की गयीं। पश्चिमी यूरोप के महत्वाकांक्षी राष्ट्रों ने अपने आर्थिक तथा व्यापारिक स्वार्थों एवं उद्देश्यों की पूर्ति हेतु इन साहसी नाविकों को पर्याप्त प्रोत्साहन तथा सहायता प्रदान की।

इन भौगोलिक खोजों का मुख्य उद्देश्य व्यापार था, किन्तु इसके परोक्ष उद्देश्य उपनिवेश स्थापना, धर्म-प्रचार एवं साम्राज्य विस्तार व राष्ट्रीय गौरव की वृद्धि इत्यादि भी थे। 16वीं सदी के प्रारम्भ में विविध देश अपने में ही सीमित थे एवं इन दिनों 'विश्व एकता की सभ्यता जैसी कोई धारणा न थी, परन्तु 16वीं सदी के भौगोलिक खोजों के परिणामस्वरूप विश्व के विविध क्षेत्र परस्पर सम्बद्ध हो गये। जिसके फलस्वरूप 'विश्व-सभ्यता' का सृजन सम्भव हो सका।


भौगोलिक खोजों के दो प्रमुख कारण थे (1) आर्थिक और (2) धार्मिक। इन दोनों कारणों से प्रेरित होकर यूरोप के निवासियों ने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्ध स्थापित किया।

विज्ञान के आविष्कारों और यात्रा संस्मरणों के कारण भी यात्राओं एवं भौगोलिक अनुसंधान का कार्य सरल हुआ


दिशा-सूचक-यंत्र और अक्षांश-देशांश जानने की सुविधा के कारण सामुद्रिक यात्राएँ खतरे से रहित हो गयीं। मानचित्रों और परिवहन सम्बन्धी सुविधाओं ने भी नाविकों को समुद्री अभियानों के लिए प्रोत्साहित किया।


मार्कोपोलो ने सन् 1260 ई. से 1295 ई. के बीच चीन, जापान और अन्य पूर्वी देशों की यात्राएँ की थीं। उसके द्वारा लिखित यात्रासंस्मरण के कारण भी नाविक पूर्व की ओर यात्रा करने के लिए प्रेरित हुए। उसके यात्रा विवरण में उन देशों की विशेषताओं और वहाँ से होने वाली व्यापारिक संभावनाओं का भी वर्णन निहित है।

मार्कोपोलो की यात्राओं से नाविकों को मार्गदर्शन मिला। इसी तरह 1507 ई. में जर्मनी में "कास्मोग्राफी - इन्ट्रोडक्शियो' नामक एक पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसमें अमेरिगो वैस्चुपी की यात्राओं का विवरण है। इससे भी यात्रियों को बड़ा लाभ हुआ।


पुर्तगाल एवं स्पेन का योगदान


नवीन भौगोलिक आविष्कार, व्यापार मार्गों की खोज एवं यूरोपीय विस्तार के क्षेत्र में पुर्तगाल सबसे अग्रगण्य राज्य था। यूरोप के दक्षिण-पूर्वी तटीय राज्य पुर्तगाल के राजा बड़े महत्वाकांक्षी एवं आविष्कारों तथा खोजों के प्रमुख समर्थक थे।

नये भौगोलिक आविष्कारों व खोजों की दिशा में प्रथम महत्वपूर्ण प्रयास 1415 ई. में अफ्रीका के तटीय प्रदेश सीटा पर पुर्तगाल द्वारा आधिपत्य करना था। वस्तुतः इसके परिणामस्वरूप पूर्वी दिशा की ओर आविष्कारों एवं खोजों का मार्ग प्रशस्त हो सका। पुर्तगाल के राजकुमार प्रिन्स हेनरी द नेविगेटर (1394 ई.-1460 ई.) के सतत् प्रयासों के परिणाम स्वरूप एजोरे एवं मडेरिया के द्वीप- समूहों को खोज निकाला गया। तत्पश्चात् 1486 ई. में पुर्तगाली नाविक बार्थलोमै डायस ने उत्तमाशा अन्तरीप को खोज निकाला। इसके बाद 1498 ई. में वास्को डि गामा ने उत्तमाशा-अन्तरीप का चक्कर काटकर भारत के कालीकट बन्दरगाह में पदार्पण किया। यह खोज यूरोप के इतिहास में बड़ी महत्वपूर्ण, प्रभावोत्पादक एवं सीमा-चिन्ह सिद्ध हुई।

इसने इटली एवं अरबों के व्यापारिक महत्व व एकाधिकार का अन्त कर दिया। अतः भूमध्यसागर का गौरव व प्रभुत्व पतनोन्मुख होने लगा।


स्पेन के राजाओं के संरक्षण एवं प्रोत्साहन से एक और नये मार्ग को खोज निकाला गया। स्पेन की सहायता से प्रोत्साहित होकर क्रिस्टोफर कोलम्बस नामक एक इटालियन साहसी नाविक ने विशाल अटलाण्टिक महासागर की लम्बी एवं खतरनाक यात्रा की एवं अन्ततः सन् 1492 में उसने अमेरिकी महाद्वीप का पता लगाया। 1497 ई. में जॉन केबट ने केप ब्रिटन द्वीप का पता लगाया। 1500 ई. में केब्राल ने ब्राजील को ढूंढ निकाला। 1519 ई. में स्पेन के कोर्तेज ने मेक्सिको की खोज की।

मैगेलन नामक व्यक्ति ने यूरोप से पश्चिमी दिशा की ओर निरन्तर यात्रा करने के उपरान्त समस्त विश्व की परिक्रमा की। 16वीं सदी के पूर्वार्द्ध में जहाँ एक ओर पूर्वी देशों में पुर्तगाल द्वारा व्यापार वृद्धि एवं शोषण हो रहा था, वहाँ दूसरी ओर अमेरिकी महाद्वीप में स्पेनी विस्तार एवं व्यापार-प्रसार हो रहे थे। 


अन्य राष्ट्रों का योगदान


पुर्तगाल एवं स्पेन से प्रोत्साहित होकर यूरोप के अन्य राष्ट्र भी भौगोलिक आविष्कार, व्यापार मार्गों की खोज, उपनिवेश स्थापना एवं साम्राज्यवाद के कार्यों में जुट गये।

यद्यपि कुछ समय तक अपनी आन्तरिक एवं राष्ट्रीय कठिनाइयों व समस्याओं के कारण अन्य राष्ट्रों के प्रयास विलम्ब से प्रारम्भ हुए, किन्तु अन्ततोगत्वा 16वीं सदी के अन्त एवं 17वीं सदी के पूर्वार्द्ध में फ्रांस, इंग्लैण्ड, इटली इत्यादि राज्य भी इस क्षेत्र में आ उतरे। फ्रांस के शासक हेनरी चतुर्थ के काल में न केवल शान्ति, व्यवस्था, आर्थिक उन्नति तथा सुरक्षा स्थापित की गयी, वरन् साथ ही कनाडा तथा लुसियाना में फ्रांसीसी उपनिवेश स्थापित किये गये। लुई चतुर्दश के काल में फ्रांस के औपनिवेशिक साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार हुआ। इसी प्रकार इंग्लैण्ड हॉलैण्ड, इटली इत्यादि राज्यों ने भी उपनिवेश स्थापन, व्यापार वृद्धि एवं साम्राज्य विस्तार के प्रयास प्रारम्भ किये। 


भौगोलिक खोजों के परिणाम


15वीं सदी से लेकर 17वीं सदी के मध्य तक यूरोपीय राज्यों द्वारा किये गये भौगोलिक खोजों के अनेक महत्वपूर्ण एवं क्रान्तिकारी परिणाम हुए। इन खोजों ने यूरोपीय जनता की ज्ञान-परिधि में वृद्धि की जिससे मध्ययुगीन रूढ़िवादिता, अंधविश्वास और धर्म का प्रभाव कम हुआ तथा इन खोजों ने पूर्वी देशों और अमेरिका के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन को बड़ा प्रभावित किया।


भौगोलिक अनुसंधान के कारण यूरोपीय व्यापार और वाणिज्य में अपूर्व वृद्धि हुई और नयी पद्धति से बड़े पैमाने पर व्यापार होने लगा। यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति आरम्भ हो गयी।

इसके कारण मध्ययुगीन व्यापारिक संस्थाओं के स्थान पर बड़ी-बड़ी कंपनियाँ और बैंकों की स्थापना होने लगी। नवीन खोजे हुए प्रदेशों से यूरोपीय राज्यों को अपार धनराशि और प्राकृतिक साधन प्राप्त हुए। पूँजीवाद के विकास ने यूरोपीय राजनीतिक और सामाजिक दिशा को प्रभावित किया। नये देशों से अपार साधनों की प्राप्ति ने यूरोपीय देशों में आपसी औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धाएँ और साम्राज्य विस्तार के लिये होड़ आरम्भ कर दी। फलस्वरूप उनके बीच अनेक युद्ध हुए। इस प्रकार एशियायी, अफ्रीकी और अमेरिकी देशों में यूरोपीय व्यापार विस्तार की पूर्ति होने लगी। इसके कारण यूरोप की जनता का जीवन सुखी और सम्पन्न हो गया, किन्तु कालान्तर में इस धन सम्पन्नता ने उन्हें अकर्मण्य, आलसी और विलासी बना दिया।


स्पेन एवं पुर्तगाल द्वारा उपनिवेशीकरण की नीति के परिणामस्वरूप घृणित दास व्यापार का प्रारम्भ हुआ, क्योंकि उपनिवेशों की वृद्धि के लिए सस्ते मजदूरों की आवश्यकता थी।

अतः पश्चिमी द्वीपसमूह, मैक्सिको, पेरू एवं ब्राजील इत्यादि देशों में नीग्रो -दास व्यापार को अत्यधिक प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। अब नये क्षेत्रों में यूरोपीय लोग जाकर व्यापार करने लगे और वहाँ रहने वाले मूल निवासियों को दास बनाकर उनका व्यापार आरम्भ कर दिया, जो एक अमानवीय कृत्य था। इस प्रकार भौगोलिक अनुसंधान के कारण दास प्रथा आरम्भ हुई, जो आगे चलकर मानवता के इतिहास में एक कलंकपूर्ण अध्याय बनकर रह गई। नई दुनिया की खोज के कारण अब यूरोप छोटा प्रतीत होने लगा। उसने पूर्व के देशों और नयी दुनिया से कुछ नई बातें सीखीं। फलस्वरूप मध्यकालीन धर्म-प्रधान परम्पराएँ अमान्य की जाने लगीं और अंततः यूरोप में धर्म-सुधार आन्दोलन प्रारम्भ हो गये। इन नये भौगोलिक आविष्कारों तथा व्यापार मार्गों की खोजों के परिणामस्वरूप भूमध्यसागर का व्यापारिक महत्व घटने लगा, इटली के नगर राज्यों की पूर्व प्रसिद्धि तथा व्यापारिक महत्ता समाप्त हो गयी एवं अटलाण्टिक महासागर का महत्व बढ़ने लगा।