मुस्लिम आक्रमणों के परिणाम और प्रभाव - Consequences and Effects of Muslim Invasions
मुस्लिम आक्रमणों के परिणाम और प्रभाव - Consequences and Effects of Muslim Invasions
भारत पर मुस्लिम आक्रमणों के परिणाम एवं प्रभाव निम्नलिखित हैं:-
भारतीय राजसत्ता और शक्ति का अंत
मुहम्मद गोरी के आक्रमणों और विजय के पूर्व उत्तरी भारत में हिंदुओं के विभिन्न स्वतंत्र राज्य विद्यमान थे। उनमें अनेक शक्तिशाली और समृद्ध थे। उनमें से कुछ उत्तरी भारत में अपनी सार्वभौम सत्ता स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे और यह संभव था कि भारत में उस समय गुप्त साम्राज्य या वर्द्धन साम्राज्य की भाँति कोई विशाल सार्वभौम सशक्त साम्राज्य स्थापित हो जाता। परंतु मुहम्मद गोरी के अभियानों और विजयों ने हिंदुओं के इस प्रयास को समाप्त कर दिया।
उसके तुर्की साम्राज्य स्थापित करने के प्रयासों और दिग्विजयों ने हिंदुओं की साम्राज्यवादी राजसत्ता और शक्ति को इतना गहरा आघात लगाया कि तराइन के युद्ध के बाद ऐसा कोई बलशाली और प्रभावशाली हिंदू नरेश नहीं बचा था, जो हिंदुओं की शक्ति संवारता, संगठित करता और विदेशी आक्रांताओं को देश से खदेड़ देता। भारत की राजधानी दिल्ली पर गोरी और बाद में तुर्क शासकों का अधिकार हो गया, जिससे उत्तरी भारत के विभिन्न स्थ क्षेत्रों की विजय करना उनके लिए सरल हो गया। एक नवीन मुस्लिम साम्राज्य का अभ्युदय हुआ। यद्यपि मराठों और राजपूतों ने अनेक बार दृढ़ केंद्रीय साम्राज्य की स्थापना के प्रयास किए, पर वे असफल रहे और वे मुस्लिम सत्ता और सम्राज्य का शीघ्र अंत नहीं कर सके।
मुस्लिम राजसत्ता की स्थापना
मुहम्मद गोरी के अभियानों और विजयी होने का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम था भारत में मुस्लिम राज्य और शक्ति की स्थापना। इससे पूर्व अरब विजेताओं और महमूद गजनवी ने जो प्रयत्न किए थे, वे कई कारणों से असफल रहे। गोरी का लक्ष्य ही भारत में मुस्लिम साम्राज्य स्थापित करना था और यह मुस्लिम साम्राज्य भारत में लगभग छह सदियों तक विद्यमान रहा, जिसके परिणामस्वरूप मुसलमान शासक भारत के विधाता रहे।
खलीफा से मान्य धर्म सापेक्ष राजसत्ता
दिल्ली में जो राजसत्ता स्थापित हुई उसे सल्तनत कहा गया।
उत्तरी भारत की विजय के पूर्व तुर्कों ने फारस पर विजय प्राप्त कर ली थी और वहाँ के रीति-रिवाज, शासन प्रणाली तथा अन्य विभिन्न विचारधाराओं को अपना लिया था। जब दिल्ली की सल्तनत स्थापित हुई, तब उन्होंने यह सल्तनत फारसी परंपराओं पर आधारित की। इस सल्तनत को उन्होंने शरीयत और इस्लाम से प्रभावित एक धर्म सापेक्ष राज्य बना दिया, जो सत्ताशाही या बादशाही के ऊपर निर्भर था। इस सल्तनत की दूसरी विशेषता यह थी कि यह पूर्वी खिलाफत के अधीन मानी जाती थी। अपने पद को स्थायित्व देने के लिए दिल्ली के सुल्तान अपने को खलीफा का अधीनस्थ प्रतिनिधि कहकर खलीफा की मान्यता प्राप्त करते थे क्योंकि खलीफा इस्लामी जगत का सर्वोच्च राजनीतिक और धार्मिक सत्ता का अधिकारी था।
सुल्तान इल्तुतमिश दिल्ली का प्रथम सुल्तान था जिसने अब्बासी खलीफा से प्रार्थना करके सुल्तान के रूप में मान्यता प्रदान कर ली थी। खलीफा ने उसे वफादार का नायब' कहा। बाद में दिल्ली के सुल्तानों में खलीफा की स्वीकृति प्राप्त करने की परंपरा बन गई। दिल्ली के शासकों को खलीफा की ओर से 'नसीर- ए-अमी- उलमोनिन (स्वामिभक्त सरदारों के सहायक) की उपाधि प्रदान की जाती रही।
केंद्रीकृत साम्राज्यवाद का प्रारंभ
तुर्कों के आक्रमणों का तात्कालिक प्रभाव यह रहा कि उत्तरी भारत में राजपूतों की सामंतवादी परंपराएँ और छोटे-छोटे राज्य नष्ट हो गए।
तुर्क शासकों ने मुख्य रूप से राजपूत शासकों और सामंतों को उनके स्थानों से पृथक कर दिया और शेष से कुछ शर्तों पर अपनी राजसत्ता की अधीनता स्वीकार करवा ली। तुर्की की राजसत्ता से, राजपूत शासकों और सरदारों की सत्ता का ह्रास हुआ, परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे-छोटे राजपूत सरदारों जैसे- राय, राणा, रावत, ठाकुर आदि का जड़ से उन्मूलन नहीं किया जा सका।
तुर्की ने दिल्ली में केंद्रीय राजसत्ता और राजतंत्र स्थापित किया। सुल्तान इल्तुतमिश और बलबन दोनों सत्ता के केंद्रीकरण में विश्वास करते थे।
इससे केंद्रीय प्रशासन की प्रवृत्ति बढ़ी। सर्वोच्च सत्ता और अधिकार सुल्तान के हाथों में केंद्रित थे, जिससे राजनीतिक और आर्थिक केंद्रीकरण हुआ और शोषण की नवीन प्रणाली प्रारंभ हुई। दिल्ली साम्राज्य के सुदूर स्थित प्रदेशों को केंद्रीय शासन व्यवस्था में जोड़ने के लिए इक्ता' प्रणाली अपनाई गई। दिल्ली सल्तनत की संपूर्ण शक्ति का मूल आधार सेना थी। इसलिए पूरे साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों को इक्ता के रूप में विभाजित कर दिया गया और प्रत्येक इक्ता को एक प्रमुख सेनापति के अधिकार में दे दिया गया। वह अपने इक्ता क्षेत्र का राजस्व वसूल करता था। उसका एक विशेष भाग वह प्रशासन और अपनी सेना के रख-रखाव के लिए व्यय करता था और शेष भाग वह सुल्तान के केंद्रीय शासन को देता था।
इक्तादार का स्थानांतरण एक स्थान से दूसरे स्थान तक होता था। इक्तादार सुल्तान के प्रति स्वामिभक्त और निष्ठावान रहता था। इसके अतिरिक्त केंद्रीय और प्रांतीय अधिकारियों की नियुक्ति तैनाती, स्थानांतरण पदोन्नति, पदावनति और सैनिक प्रशासन में एकरूपता लाई गई। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत में केंद्रीकरण की प्रवृत्तियाँ और साम्राज्यवादी भावनाएँ बढ़ गई।
केंद्रीय अधिकारियों के विषय में एक विशेष तथ्य यह है कि राजपूत सामंतों की भाँति ये किसी श्रेष्ठ कुलीन वर्ग के नहीं थी। वे किसी एक वंश की परंपरा में विश्वास नहीं करते थे।
सल्तनत की राजनीति और प्रशासन में अमीर वर्ग के व्यक्ति प्रमुख थे, केंद्रीय और प्रांतीय प्रशासन में सभी महत्त्वपूर्ण पदों पर तुर्क अधिकारियों का विशिष्ट एकाधिकार था, पर ये सभी अधिकारी श्रेष्ठ उच्च कुलीन वंशों के नहीं थे, अपितु वे तथाकथित गुलामवंशों के थे। इन उच्च पदाधिकारियों को खाँ अमीर या मलिक कहा जाता था और वे अपने आपको राजसत्ता का अधिकारी और भागीदार मानते थे। वे सुलतान का विरोध भी करते थे और कभी-कभी षड्यंत्र कर उसकी हत्या भी कर देते थे।
नागरिक जीवन और शहरीकरण का नवीनीकरण
राजपूत राज्यों के नगर 'कुलीन नगर' थे, जहाँ ऊँच-नीच के भेदभाव थे, सामाजिक विषमताएँ और विसंगतियाँ थी। तुर्की ने अब ऐसी बस्तियों और नवीन नगरों का निर्माण किया,
जिनमें सामाजिक और आर्थिक जीवन भेद-भावों, छुआ-छूत और वर्ण व्यवस्था पर आधारित नहीं था। ये नगर के श्रमिकों, शिल्पियों, कारीगरों, दस्तकारों, शूद्रों, बुनकरों, कसाइयों, चांडालों, ब्राह्मणों, वैश्यों, हिंदुओं और मुसलमानों सभी के लिए खुले थे। भारत के बाहर के विभिन्न देशों से भी कारीगर और इस्तकार इन नवीन नगरों में आकर बस गए और कलापूर्ण कालीन और दरियाँ बुनने जैसे नवीन धंधे प्रारंभ हुए। आकर्षक हस्तशिल्प की वस्तुओं को बनाने के विभिन्न धंधों का खूब विकास हुआ। इन्हीं नगरों में सुल्तानों शासकों, अधिकारियों और धन संपन्न अमीरों के गुलाम भी रहने लगे और विभिन्न धंधों में लग गए। प्रारंभिक तुर्क सुल्तानों की मुख्य राजसत्ता और शक्ति ऐसे ही नवीन नगरों पर अवलंबित थी।
ऐसे नगरवासियों ने, वहाँ के श्रमिक वर्गों ने, मुसलमान गुलामों ने, धर्म परिवर्तित नवीन मुसलमानों ने और इस्लाम के विदेशी अनुयायियों ने नवीन तुर्की शासन की सेवाओं में अपने आपको समर्पित कर दिया। ऐसे श्रमिक वर्गीय नगरों के उदय और उत्कर्ष से तुर्की राजसत्ता दृढ़ होती गई। शासक वर्ग, श्रमिकों और कारीगरों के वर्गों तथा नए व्यवसायियों की मिली जुली आबादी वाले नवीन नगरों में नवीन व्यापार व्यवसायों का, मंडियों और बाजारों का विकास हुआ और वाणिज्य-व्यापार को खूब प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। इससे मध्य युग में एक नवीन शहरी अर्थ-व्यवस्था का सूत्रपात हुआ।
विदेशी व्यापार
भारत में मुस्लिम साम्राज्य स्थापित हो जाने से एवं नवीन स्वरूप की शहरी अर्थ-व्यवस्था प्रारंभ हो जाने से भारत का गजनी,
गोर, फारस, अरब, खुरासान, बल्ख आदि अन्य मुस्लिम देशों से तथा एशिया और अफ्रीका के निकटतम देशों में व्यापारिक संपर्क बढ़ गया। विदेशी व्यापारी भारतीय नगरों और मंडियों में आने-जाने लगे । विदेशी मुस्लिम व्यापारियों का हिंदू व्यापारियों से संपर्क बढ़ा। नहरवाला (गुजरात) के एक हिंदू व्यापारी विशाल अबजार ने गजनी से व्यापार किया। इसामी के कथनानुसार चीन के व्यापारी दिल्ली आते थे। भारत की अनेकानेक वस्तुएँ सीमांत क्षेत्र के दरों से इन दूस्थ देशों में पहुँचने लगीं। इससे राजनीतिक दृष्टिकोण विस्तृत हो गया और व्यापारिक अलगाव की नीति क्षीण हो गई। इसी बाहरी वाणिज्य व्यापार से भारतीय समृद्धि में खूब वृद्धि हुई।
सैन्य परिवर्तन
राजपूतों की सामंती सैनिक व्यवस्था के स्थान पर नवीन स्वरूप की सेना गठित की गई। राजपूतों के युग में सैनिक कार्य और युद्ध राजपूतों के एक वर्ग विशेष का ही विशिष्टि अधिकार था। राजपूत सामंत इसमें प्रमुख कर्ता थे। अब सामंती सेना की ये परंपराएँ त्याग दी गई। अब शक्तिशाली स्थायी सेना गठित की जाने लगी, जिनमें विभिन्न वर्गों के सैनिक थे, भारतीय भी और अरब पठान, तुर्क, मंगोल, जैसे विदेशी भी सेना में पदाति और सवारने मुकातला' (अश्वारोही लड़ाकू सैनिक) विशेष अंग बन गए। तीव्र गतिशील अश्वारोही सेना पर अधिक बल दिया जाने लगा। हाथियों वाली भारी भरकम सेना और उनकी शक्ति के स्थान पर सैन्य गतिशीलता और तीव्र आक्रमण क्षमता सैन्य संगठन के सिद्धांत हो गए।
नवीन धर्म और समाज का प्रारंभ
मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना के बाद भारत में मुस्लिम शासकों ने इस्लाम के प्रचार और प्रसार के लिए राज्य के सभी साधनों का उपयोग किया। राज्यपद, प्रगति और धन-संपत्ति और समृद्धि प्राप्ति के लिए इस्लाम अपनाना सरल मार्ग था। फलतः अनेकानेक हिंदू मुसलमान हो गए। इससे कालांतर में धार्मिक और सांप्रदायिक दुर्भावनाएँ और दोष उत्पन्न हो गए। समाज में हिंदू और मुस्लिम ऐसे दो वर्ग बन गए जो समानांतर रेखाओं के समान कभी मिल नहीं सकते थे। मुस्लिम वर्ग सदा ही हिंदुओं से अपने को अलग समझता रहा और प्रेरणा तथा प्रोत्साहन के लिए मक्का और मदीना की ओर देखता रहा। भारतीय जीवन के विभिन्न अंगों पर इन प्रवृत्तियों का बुरा प्रभाव पड़ा।
सांस्कृतिक प्रभाव
मुस्लिम साम्राज्य स्थापित होने से, इस्लाम धर्म के प्रचार और प्रसार से भारत में एक नवीन इस्लामी संस्कृति का विकास हुआ। इस्लाम की पाश्चात्य प्रवृत्तियाँ भारत में प्रविष्ट हो गई, जिससे भारतीय साहित्य, कला और दैनिक जीवन अत्यधिक प्रभावित हुए। स्थापत्यकला में मस्जिदों और मकबरों का निर्माण प्रारंभ हुआ। इनमें गुंबदों और मेहराबों के स्वरूप का विकास हुआ। साहित्य में फारसी व नई भाषा 'हिन्दवी' का प्रचार बढ़ा। प्राथमिक शिक्षा के लिए मस्जिदों में मकतब और उच्च शिक्षा के लिए मदरसों का प्रारंभ हुआ। इनमें इस्लाम की शिक्षा प्रमुख थी।
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