वाणिज्यवाद के परिणाम और महत्व - Consequences and importance of mercantilism

वाणिज्यवाद के परिणाम और महत्व - Consequences and importance of mercantilism


लगभग 250 वर्षों तक वाणिज्यवाद की विचारधारा का प्रभाव यूरोप में रहा। वाणिज्यवाद की विचारधारा ने यूरोप के राष्टों की आर्थिक नीति को निर्धारित किया। यूरोप में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का प्रारम्भ वाणिज्यवाद से होता है। आर्थिक लाभ के लिए विभिन्न राष्ट्रों ने सन्तुलित आयात-निर्यात की नीति अपनायी। वाणिज्यवाद के कारण नवीन उद्योगों के माल को अधिकाधिक निर्यात कर विदेशों से बड़े पैमाने पर सोना चाँदी और धन प्राप्त किया गया। इस सिद्धान्त को अपनाया गया कि वस्तुओं का अधिकाधिक निर्यात करना और आयात कम करना, जिससे देश अधिक समृद्ध हो जाये।

विदेशी माल की खरीद और आयात को निरूत्साहित किया गया। स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहित करके उत्पादन में अधिकाधिक वृद्धि की गई। कच्चा माल प्राप्त करने और बने हुए माल की बिक्री और खपत के लिए नवीन उपनिवेशों की स्थापना की गई। इससे औपनिवेशिक साम्राज्य बने। वाणिज्यवाद की नीतियाँ और सिद्धान्त अपनाने से यूरोप में इंग्लैण्ड, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी जैसे महान् शक्तिशाली राज्यों का निर्माण हो सका। शीघ्र ही इनका साम्राज्य यूरोप के बाहर अन्य महाद्वीपों में भी फैल गया जिसके परिणाम स्वरूप विश्व में शक्ति संतुलन की समस्या उत्पन्न हो गई।


शासकों द्वारा पोप के विरोधियों को सहयोग, (ग) धार्मिक करों में वृद्धि। (4) तात्कालिक कारण क्षमा पत्रों की बिक्री |


धर्म सुधार आन्दोलन का प्रारंभ पोप का विरोध और आन्दोलन का आरम्भ। जॉन विक्लिफ और जॉनहस द्वारा पोप के अधिकारों का विरोध और कैथोलिक धर्म उत्पन्न बुराइयों की ओर जनता का ध्यान आकर्षित करना।


धार्मिक आन्दोलन का आरम्भ जर्मनी में होने के कारण (1) राजनीतिक दशा, (2) रोमन सम्राट की हस्तक्षेप करने में असमर्थता (3) मार्टिन लूथर का प्रचार मार्टिन लूथर का जन्म, शिक्षा और पोप का विरोध - 1483 ई. में आइसलेबेन में जन्म, एरफर्ट विश्वविद्यालय से कानून और धर्म में डिग्री प्राप्त करना, 1510 ई. में रोम की यात्रा और पोप के दरबार में व्याप्त भ्रष्टाचार को स्वयं देखना 1517 ई. में बर्टेम्बर्ग में क्षमापत्रों की बिक्री का विरोध 95 अकाट्य तर्कों को लिखकर गिरजे के द्वार पर टाँगना। लूथरवाद के सिद्धान्त - ( 1 ) बाह्याडम्बर का त्याग, (2) परमेश्वर में आस्था, (3) पुरोहितों का विरोध, (4) राष्ट्रीय चर्च का समर्थन,

(5) संस्कारों की बहुसंख्या का विरोध (6) ईश्वर की कृपा में दृढ विश्वास और (7) सेवा एवं शान्ति में विश्वास । धर्म सुधार की प्रमुख घटनायें (1) कृषक आन्दोलन, (2) प्रोटेस्टेंट मत की स्थापना ( 1529 ई.) (3) श्मालकाल्डेन संघ का निर्माण, (4) लूथर का स्वर्गवास, (5) ट्रेंट की परिषद् (6) चार्ल्स का जर्मनी से निष्कासन | आम्सवर्ग की सन्धि की धारायें (1) धर्म अपनाने की राज्यों को स्वतन्त्रता, (2) कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट धर्म को मान्यता, (3) चर्च की सम्पत्ति की सुरक्षा ।


इंग्लैंड में धर्म सुधार का विकास हेनरी अष्ठम के काल में धर्म सुधार (1) मानववादियों का प्रभाव- सर थामस मूर, जॉन कोलेट और इरेस्मस द्वारा पोप और चर्च की त्रुटियों का प्रदर्शन।

हेनरी अष्टम द्वारा पोप तथा रोमन चर्च के साथ सम्बन्ध विच्छेद, (2) ऐन्नाटेज अधिनियम पास करके पोप को भेजे जाने वाले धार्मिक करों का भेजना बन्द करना, (3) अपीलों का विधान लागू करना और कैथेराइन को तलाक तथा ऐने बोलेन से विवाह, (4) प्रभुत्व विधान पास करा कर राजा को चर्च को अधिष्ठाता स्वीकार करना, (5) मठों का नाशा हेनरी की धार्मिक नीति- अंग्रेजी में बाईबिल का प्रकाशन (2) धर्मयात्रा, क्षमापत्रों की खरीद, पापमोचन आदि धार्मिक क्रियाओं पर प्रतिबंध (3) छः धाराओं का प्रकाशना एडवर्ड षष्ठम के काल में धर्म सुधार (1) नवीन प्रार्थना पुस्तकों का गिरजों में प्रयोग (2) 42 धाराओं के नियम का प्रयोग (3) मास पूजा पर प्रतिबंधा (4) गिजों से कैथोलिक चित्रों और मूर्तियों का हटाया जाना, (5) प्रोटेस्टैण्ट धर्म के प्रचार के लिये पुस्तकों का प्रकाशना


यूरोप में वाणिज्यवाद का विकास वाणिज्यवाद से अभिप्राय । वाणिज्यवाद के प्रमुख लक्षण - (1) सोने और चाँदी का संचय (2) अंतर्राज्यीय व्यापार (3) अनुकूल और संतुलित व्यापार (4) औद्योगिक प्रतिबंध और व्यापारिक नियंत्रण (5) नवीन व्यापारिक मण्डियाँ और उपनिवेश। वाणिज्यवाद के विकास के कारण- (1) समुद्री यात्राएँ और भौगोलिक खोजें (2) पुनर्जारण का प्रभाव (3) मुद्रा प्रचलन और बैंकिंग प्रणाली (4) नवोदित राष्ट्रीय राज्यों द्वारा प्रोत्साहन और संरक्षणा वाणिज्यवाद के दोष (1) पूँजीवाद (2) संकीर्ण राष्ट्रीयता (3) अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक और औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धा (4) सोने-चाँदी के संचय की निरर्थकता (5) कृषि की उपेक्षा (6) लोककल्याण का अभाव (7) राजसत्ता और शक्ति में वृद्धि