स्त्री शिक्षा की अंतर्वस्तु - content of female education
स्त्री शिक्षा की अंतर्वस्तु - content of female education
स्त्रीशिक्षा के प्रसार / विस्तार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण ध्यातव्य बात यह है कि स्त्रियों को पाठ्यक्रम के नाम पर जो कुछ पढ़ाया जाता रहा है, वह क्या है? उसकी अंतर्वस्तु क्या है? 18वीं- 19वीं सदियों के नवजागरण काल में स्त्रीशिक्षा को लेकर अनेकानेक समाजसुधारकों, शिक्षाविदों, कार्यकर्ताओं इत्यादि में जो सक्रियता दिखाई देती है, उनकी जो भौतिक उपलब्धियाँ रही हैं: उनमें स्त्रियों को दी जाने वाली शिक्षा के पाठ्यक्रम, पढ़ाये जाने वाले विषयों, पढ़ाये जाने के तरीकों, पढ़ाने वाले अध्यापक- अध्यापिकाओं के स्तर इत्यादि के बारे में खूब लंबी और लगातार बहसें चली हैं. स्कूल खोलने का काम और ये समस्त बहसें एक साथ समानान्तर चली हैं. ये बहसें बहुआयामी और बहुस्तरीय रही हैं. इस पूरे मसले को यहाँ दो उपबिंदुओं में आख्यायित किया जा सकता है-
स्त्रीशिक्षा की पाठ्यवस्तु
स्त्रीशिक्षा के विविध आयाम और अंतर्सम्बद्धताएँ
स्त्रीशिक्षा की पाठ्यवस्तु
लड़कियों को क्या पढ़ाया जाए और क्या नहीं, नवजागरण काल में यह गहन विमर्श का मुद्दा रहा है. ऊपर कुछ संकेत इसके आए हैं हिंदी-प्रदेश में इसे लेकर भारी असमंजस और अंतर्विरोध की स्थिति देखी जा सकती है. भारतेंदु हरिश्चन्द्र, मदनमोहन मालवीय, सैयद अहमद खान इत्यादि सभी लगभग एकमत से इस बात का समर्थन करते हैं कि लड़के और लड़कियों की पढ़ाई के विषय,
पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्या अलग-अलग होने चाहिए, लड़कियों के बारे में इन सबकी लगभग यही राय है कि उन्हें आगे चलकर चूँकि घर सँभालना है, इसलिए उन्हें वही विषय पढ़ाये जाएँ, उन्हीं की प्रशिक्षा उन्हें दी जाए, जो इस कार्य में उन्हें प्रवीण बना सकें. उदाहरण के लिए हिंदी प्रदेश के नवजागरण के पुरोधा माने जाने वाले भारतेंदु हरिश्चन्द्र का यह स्पष्ट मानना था कि 'चरित्र निर्माण (मोरालिटी) और घरेलू प्रबन्ध वगैरह के बारे में बताने वाली अच्छी पाठ्यपुस्तकें उनके पाठ्यक्रम में लगनी चाहिए xxx हमारे उहाँ गृहशिक्षा का चलन है, यह गृहशिक्षा अक्सर धार्मिक क्रिस्म की होती है और पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान से इसका कोई संबंध नहीं होता. धार्मिक किताबों से उन्हें चरित्र सम्बन्धी सिद्धान्तों और घरेलू कर्तव्यों के पाठ पढ़ाये जाते हैं. मुसलमान अपनी लड़कियों को कुरआन पढ़ाते हैं.'
(द्रष्टव्य: तलवार, वीरभारत; रस्साकशी (19 वीं सदी का नवजागरण और पश्चिमोत्तर प्रांत, दूसरा संशोधित संस्करण: 2006; सारांश प्रकाशन, दिल्ली; ISBN 81-7778-007-7 पृष्ठ-34). भारतेन्दु ने अपने बलिया में दिए भाषण में स्त्रियों को आधुनिक शिक्षा देने का स्पष्ट विरोध किया था. उनका कहना था “ऐसी चल से उनको शिक्षा दीजिए कि वे अपना देश और कुल- धर्म सीखें, पति की भक्ति करें " (वही; पृष्ठ 39). लेकिन लड़कों को जो चाहें शिक्षा आप दें, उन्हें कोई आपत्ति नहीं! लड़कों को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा दी जाए, हर तरह की शिक्षा उन्हें दी जाए- “लड़कों को सहज में शिक्षा दें. " ( वही). प्रेमसागर', 'विद्यांकुर, 'इतिहासतिमिरनाशक' जैसी तर्काधारित पुस्तकों को भी, जो कि भारतीय लेखकों द्वारा ही लिखी गई थीं; वे लड़कों को तो पढ़ाये जाने के हिमायती थे, पर लड़कियों को पढ़ाये जाने को नहीं. (वही; पृष्ठ 34).
मुस्लिम समाज की स्थिति भी लगभग यही थी वह भी लड़कियों को ऐसी ही शिक्षा देने के हक में था, जो उन्हें एक योग्य माँ, पत्नी, बहन, बेटी इत्यादि बना सके, और बस! इस संबंध में नजीर अहमद की लिखी 'मिरातुल उरूस तथा मौलाना अशरफ अली थानवी की लिखी 'बहिश्ती जेवर' जैसी किताबों का नाम लिया जा सकता है, जो त्रियों को पढ़ाने को तैयार की गई थीं. बहिश्ती ज़ेवर' में मुस्लिम स्त्री को धर्म, पारिवारिक कानून, घरेलू संबंधों इस्लामी दवा-दारू आदि की शिक्षा दी गई है. स्पष्ट है कि इन पुस्तकों को पढ़ने पर कैसी स्त्री को निर्माण होगा!
किंतु जैसा कि ऊपर संकेत किया गया, गैर-हिंदी क्षेत्रों में स्त्रीशिक्षा के पाठ्यक्रमों में हिंदी- प्रदेश जैसा जेंडर विभेद नहीं था.
बंगाल, पंजाब, महाराष्ट्र तथा दक्षिण के कई राज्यों इत्यादि में लड़कियों की पाठ्यपुस्तकें लगभग वही थीं, जो लड़कों की थीं. बंगाल में बेथून, ईश्वरचंद्र विद्यासागर द्वारिकानाथ गांगुली आदि इस बात के उदाहरण रहे हैं कि लड़कियों को भी वही पढ़ाया जाए जो सामान्यतः स्कूल- कॉलेजों में पढ़ाया जाता है. यानी कि जो लड़कों को पढ़ाया जाए, वही लड़कियों को भी पढ़ाया जाए. यानी कि विविध प्रकार का ज्ञान-विज्ञान, ज्ञान के विभिन्न अनुशासन इत्यादि. इस संबंध में 'ब्राह्मोसमाज' के युवा सुधारकों के प्रयास उल्लेखनीय हैं, जिन्होंने 1870 के दशक में स्त्रियों की आधुनिक शिक्षा का आंदलनों शुरू किया. इन्होंने अपने वरिष्ठ नेतृत्वकर्ता केशवचन्द्र सेन का भी इस संदर्भ में विरोध किया. केशवचन्द्र सेन लड़कियों की उच्च शिक्षा और उन्हें ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा दिए जाने के विरोधी थे.
इसके विरोध में द्वारिकानाथ गांगुली ने अपने कुछ साथियों शिवदास शास्त्री, दुर्गामोहन दास और आनन्दचरण खास्तिगीर आदि के साथ मिलकर 'समदर्शी' ग्रुप बनाया. हिंदू महिला विद्यालय इसी ग्रुप ने स्थापित किया था. यह विद्यालय लड़कियों को ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने में अव्वल रहा. द्वारिकानाथ गांगुली ने इस हेतु स्त्रीशिक्षा के लिए नई किताबें तैयार कीं, जो आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से संबंद्ध थीं. (द्रष्टव्य : वही; पृष्ठ 45).
उधर महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले ने स्त्रीशिक्षा के पाठ्यक्रम में ज्ञान-विज्ञान के विषयों को शामिल किया. इस संबंध में वीरभारत तलवार का यह कथन उद्धरणीय है
कि "यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि शूद्र परिवार में जन्मे फुले स्त्रियों की आधुनिक शिक्षा के समर्थक थे और उनकी प्राथमिक कन्या पाठशाला में बच्चियों को व्याकरण के साथ अंकगणित भी पढ़ाया जाता था." (वही, पृष्ठ 46).
पंजाब में आर्यसमाज ने अपने स्कूलों- 'पुत्री पाठशाला' तथा 'कन्या विद्यालय में सरकारी पाठ्यक्रम चलाकर आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा लड़कियों को देने का उल्लेखनीय कार्य किया. लाला देवराज ने जिस विद्यालय को चलाया था, उसमें लड़कियों को व्यायाम, खेल इत्यादि भी कराए जाते थे. इसमें आगे शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम भी चालू हुए, खेल-खेल में तथा व्यावहारिक परिस्थितियों में पढ़ाने की तकनीक यहाँ विकसित की गई थी. लड़कियों के लिए ज्ञान-विज्ञान की नई-नई पुस्तकें तैयार कराना लाला देवराज की अन्यतम उपलब्धि थी.
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