मुहम्मद गोरी की मृत्यु - Death of Muhammad Ghori

मुहम्मद गोरी की मृत्यु - Death of Muhammad Ghori


मध्य एशिया की राजनीति के कारण मुहम्मद गोरी अपनी विजय के उपरांत गजनी वापस चला गया। अपने भाई ग्यासुद्दीन की मृत्यु होने पर समस्त कार्य का भार उसके ऊपर आ गया था। यद्यपि उसका राज्य उसके अपने राज्य में सम्मिलित नहीं किया था। आरंभ में अपने प्रतिद्वंदी ख्वारिज्म के शाह के विरुद्ध उसको कुछ सफलता प्राप्त हुई, किंतु बाद में वह बुरी तरह परास्त हुआ। इस पराजय का परिणाम अच्छा नहीं हुआ। जनता में विद्रोह की भावना तथा सरदारों में स्वतंत्रता प्राप्त करने की इच्छा का उदय हुआ। पंजाब के विद्रोहियों का दमन करने के लिए उसने स्वयं प्रस्थान किया। जबवह विद्रोह का अंत कर गजनी वापस जा रहा था तो 15 मार्च, 1206 ई. को उसका वध कर दिया गया।


 मुहम्मद गोरी का चरित्र


इतिहासकारों ने मुहम्मद गोरी की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। प्रसिद्ध इतिहासकार मिन्हाज उस सिराज ने अपनी पुस्तक 'तबकात-ए-नासिरी में लिखा है कि वह बहुत ही शरीफ, धार्मिक, विश्वसनीय, न्यायप्रिय एवं जनप्रिय शासक था।" उसको अपने परिवार के सदस्यों से विशेष प्रेम था। उसने सदा अपने भाई ग्यासुद्दीन की अधीनता में कार्य किया और किसी भी समय उसके विरुद्ध आचरण करने के विचार उसके मस्तिष्क में नहीं आए। वह अंत तक उसका भक्त रहा। यद्यपि उसका बल उससे कहीं अधिक था और उसने बहुत-सी विजयों को प्राप्त की थी। सर बूल्जे हेग ने उसकी इस कार्य के लिए बड़ी प्रशंसा की है। वह मनुष्य के नाते एक उच्च कोटि का व्यक्ति था।

उसकी आदत तथा उसका स्वभाव बहुत अच्छा था। वह दृढ़ प्रतिज्ञ था। वह जिस बात का संकल्प कर लिया करता था उसको वह सदैव 'पूरा करने की चिंता में संलग्न रहता था। प्रथम तराइन के युद्ध में परास्त होने पर वह सदा इसी चिंता में लगा रहता था कि पराजय तथा अपमान के कलंक का किस प्रकार अंत किया जाए। उसने स्वयं स्वीकार किया है कि वह आराम से सोता जागता नहीं था, वरन शोक एवं चिंता में निमग्न रहता था। वह बड़ा उत्साही तथा साहसी था। वह भीषण से भीषण परिस्थिति के उत्पन्न हो जाने पर भी नहीं घबराता था।

उसको मानव चरित्र का अच्छा आकलन था। इसी कारण उसके लोगों ने उसको कभी धोखा नहीं दिया और सदैव उसके आज्ञापालक सेवक की तरह कार्य करते रहे। वह कुशल राजनीतिज्ञ था। वह स्थिति का वास्तविक ज्ञान सरलतापूर्वक कर सकता था। उसने भारत की राजनीतिक स्थिति का खूब लाभ उठाया और अपने उद्देश्य में सफल हुआ। कहीं-कहीं युद्धों में उसने कूटनीति से भी लाभ उठाया। वह एक व्यवहारिक व्यक्ति था। वह न्यायप्रिय शासक था तथा प्रजा के हित का ध्यान रखता था। वह साहित्य तथा कला का प्रेमी था। उसने विद्वानों को अपने दरबार में आश्रय दिया।

वह कट्टर मुसलमान था, किंतु उसने हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को इतनी ठेस नहीं पहुंचाई, जितनी महमूद ने। वह एक योग्य सेनानायक या सैन्य संचालक नहीं था। अन्हिलवाड़ा तथा तराइन के युद्ध में वह बुरी तरह परास्त हुआ। ख्वारिज्म के शाह ने भी उसको परास्त किया। वह पृथ्वीराज तथा जयचंद से भी कम योग्यता रखता था। वास्तव में, जैसा डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने कहा है कि "यह सत्य है कि उसमें विजय के कारण परिस्थिति का उचित ज्ञान और उसका लाभ उठाने तथा अपने उद्देश्य व लक्ष्यों को प्राप्त करने की दृढ़ता थी। वह भारत में मुसलमानी साम्राज्य का संस्थापक था। इस दृष्टि से वह महमूद से उच्च था।'