परवर्ती तुगलक और सैय्यद शासकों के समय चिश्ती संप्रदाय का पतन - Decline of the Chishti sect during the later Tughlaq and Sayyid rulers

परवर्ती तुगलक और सैय्यद शासकों के समय चिश्ती संप्रदाय का पतन - Decline of the Chishti sect during the later Tughlaq and Sayyid rulers


कुछ विद्वानों का मानना है कि दिल्ली में चिश्ती संप्रदाय के पतन का कारण सुल्तान मुहम्मद तुगलक का रवैया और नीतियाँ थी। पर यह ध्यान रखना चाहिए कि व्यक्तिगत रूप में सुल्तान सूफियों का विरोधी नहीं था। सुल्तान ने सूफियों को राज्य की सेवा स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। इसके बावजूद कुछ सूफी, यहाँ तक की शेख नसीरुद्दीन चिराग ए दिल्ली भी पूरे समय दिल्ली में ही रहे। मुहम्मद तुगलक की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी फिरोज़शाह तुगलक ने सूफियों को धार्मिक दान दिया और खानकाह फिर सक्रिय हो उठे।

1356 ई. में शेख नसीरुद्दीन की मृत्यु के बाद दिल्ली में कोई ख्याति प्राप्त चिश्ती हस्ती नहीं रह गई। अपने किसी धार्मिक उत्तराधिकारी की नियुक्ति किए बगैर उनकी मृत्यु हो गई। तैमुर के आक्रमण (1398 ई.) के समय उनका एक प्रमुख शिष्य गेसूदराज दिल्ली छोड़कर दक्कन जैसी सुरक्षित जगह चला गया। दिल्ली सल्तनत के पतन के बाद सूफी अपेक्षाकृत स्थायित्व प्राप्त राज्यों में फैलने लगे और वहीं अपने खानकाह स्थापित किए। 14वीं शताब्दी के उतरार्द्ध और 15वीं शताब्दी का चिश्ती संप्रदाय देश के विभिन्न भागों में फैल गया। इससे चिश्ती सूफियों के दृष्टिकोण और प्रथाओं में मूलभूत बदलाव आया। 


दूसरा दौर सल्तनत काल में शेख नसीरुद्दीन की मृत्यु के बाद चिश्ती सिलसिले का पतन आरंभ हुआ और दिल्ली से बिखरकर यह विभिन्न क्षेत्रीय राज्यो में फैल गया। यहीं से चिश्ती सिलसिलों के इतिहास का दूसरा दौर शुरू होता है। 13वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से ही सूफी दक्कन की ओर जाने लगे थे, पर दक्कन में चिश्ती संप्रदाय की नींव मुहम्मद तुगलक के शासन काल में शेख बुरहानुद्दीन गरीब ने डाली। बाद में कई सूफी चिश्ती बहमनी राज्य (1347-1538 ) की राजधानी गुलबर्गा जाकर बस गए। गुलबर्गा में इन सूफियों ने दरबार से अपना रिश्ता कायम किया और राज्य संरक्षण स्वीकार किया। इस प्रकार शासक वर्ग के प्रति चिश्ती संप्रदाय के रवैये में परिवर्तन आ गया।

दूसरी तरफ बहमनी शासकों ने उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए भूमि अनुदान प्रदान किए। मुहम्मद बंदा नवाज (लगभग 1321-1422) इन चिश्तियों में प्रमुख थे। यह दक्कन चले गए और बहमनी सुल्तान फिरोजशाह बहमनी (1397-1422) से बतौर भू- अनुदान चार गाँव प्राप्त किए। यह कट्टरपंथी सूफी थे और उन्होंने सूफी मत की मान्यताओं की अपेक्षा इस्लामी कानून (शरीयत) को प्रमुखता दी। गेसूदराज ने चिश्तियों की उन सभी प्रथाओं को छोड़ दिया जो कट्टरपंथी उलेमा को नहीं भाती थी। अपने पूर्ववर्ती चिश्ती गुरुओं के विपरीत उन्होंने तसव्वुफ़ पर या सूफी चिंतन पर खूब लिखा। उनकी मृत्यु के बाद भी बहमनी सुल्तान उनके परिवार को भूअनुदान देते रहे। गुलबर्गा स्थित उनकी दरगाह बाद में दक्कन का एक प्रमुख तीर्थ स्थल बन गया।


पर उनके बाद किसी ने चिश्ती संप्रदाय में रुचि नहीं दिखाई और उनके परिवारजन भूमिधर कुलीन वर्ग का जीवन व्यतीत करने लगे। इससे उस क्षेत्र में चिश्ती संप्रदाय का अंत हो गया। 1422 ई. में बहमनी राज्य की राजधानी गुलबर्गा से बदलकर बीदर हो गई। इस कारण भी गुलबर्गा में चिश्ती संप्रदाय का पतन हो गया। यह भी बताया गया है कि बीदर स्थित बहमनी दरबार में विदेशियों की ओर विशेष झुकाव था और उनका दृष्टिकोण दक्कन विरोधी था। इस कारण से विदेशी सूफियों को आकर बसने के लिए प्रोत्साहित किया गया और चिश्तियों को अति भारतीय होने के कारण संरक्षण प्राप्त न हो सका।

पर 15वीं शताब्दी के अंत से एक बार फिर चिश्ती संप्रदाय शक्ति अर्जित करने लगा और 16वीं-17वीं शताब्दी तक इसका विकास हुआ। आदिलशाही सुल्तानों की राजधानी बीजापुर शहर के ठीक बाहर शाहपुर की पहाड़ी पर इनका नया केंद्र स्थापित हुआ। शाहपुर पहाड़ी पर स्थापित चिश्ती संप्रदाय गुलबर्गा में स्थापित चिश्ती संप्रदाय से भिन्न था। इसने दरबार और उलेमा से दूरी बनाए रखी और स्थानीय तत्वों को अपना आधार बनाया। इस प्रकार शाहपुर के सूफी अपने दृष्टिकोण में दिल्ली स्थित आरंभिक चिश्तियों से काफी मिलते-जुलते थे। पर यह याद रखना चाहिए कि शाहपुर स्थित चिश्ती संप्रदाय दिल्ली और गुलबर्गा स्थित चिश्ती संप्रदाय से बिल्कुल अलग रहकर विकसित हुआ।


उत्तर भारत में 15वीं शताब्दी के उतरार्द्ध और 16वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में चिश्ती संप्रदाय का पुनरुत्थान हुआ। चिश्ती संप्रदाय की तीन शाखाएँ उभर कर सामने आई, नागौरी (शेख हमीदुद्दीन नागौरी के नाम पर), साबिरी (शेख अलाउद्दीन कलियारी के नाम पर ) और निजामी (शेख निजामुद्दीन औलिया के नाम पर)। शर्की सुल्तानों की राजधानी जौनपुर भी इस समय चिश्ती संप्रदाय का केंद्र बना। 15वीं शताब्दी के आरंभ में लखनऊ के निकट रदौली में भी चिश्ती केंद्र स्थापित हुआ। लोदी काल में बहराइच (आधुनिक उत्तर प्रदेश में) भी चिश्ती संप्रदाय का केंद्र बना । शेख अब्दुल कुद्दूस गंगोही (1456-1537 (ई.) ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के गंगोह में एक प्रमुख केंद्र स्थापित किया।

उन्होंने सूफी मत और मान्यताओं तथा आध्यात्मिक विषयों पर अनेक पुस्तकें लिखीं। उन्होंने मौलाना दाउद की रोमानी हिंदवी में लिखित पुस्तक चंदायन का फारसी में अनुवाद भी किया। दूसरे दौर में बंगाल और मालवा में चिश्ती केंद्र स्थापित हुए। दूसरे दौर के कई सूफी संतों ने अरबी और फारसी के मानक ग्रंथों पर भाष्य लिखे और संस्कृत में रहस्यवाद पर लिखी पुस्तकों का अनुवाद फारसी में किया। दिल्ली के आरंभिक सूफियों की तरह बाद के चिश्ती सूफियों ने समाज के सभी तबके के लोगों को अपना शिष्य बनाया। पर उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चिश्तियों की मान्यताओं का ख्याल नहीं रखा और राज्य का संरक्षण स्वीकार किया।