वाणिज्यवाद के दोष - demerits of mercantilism
वाणिज्यवाद के दोष - demerits of mercantilism
पूँजीवाद
वाणिज्यवाद ने उद्योग-धन्धों के प्रसार से पूँजीवाद को जन्म दिया। इस पूँजीवाद से यूरोपीय समाज में दो वर्गों का उदय हुआ- प्रथम पूँजीपतियों और उद्योगपतियों का वर्ग जिसने उत्पादन के साधनों पर अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया और द्वितीय सर्वहारा वर्ग जिसके पास स्वयं के स्वामित्व के उत्पादन के साधन नहीं होने से उन्हें अपने श्रम को सस्ते दामों पर बेचना पड़ता था। इससे कालान्तर में पूँजीपति और सर्वहारा वर्ग में कड़ा संघर्ष छिड़ गया, जिससे विद्रोह और क्रान्तियाँ हुई तथा आर्थिक व्यवस्था डगमगा गयी।
संकीर्ण राष्ट्रीयता
वाणिज्यवाद ने एक राष्ट्र को महत्व देकर उसकी समृद्धि के लिए दूसरे अन्य राष्ट्रों के शोषण का मार्ग प्रशस्त किया। एक राष्ट्र अधिक सशक्त और सम्पन्न हो गया और अन्य छोटे-छोटे देश शोषित होने से दरिद्र और गरीब हो गये। इस प्रकार संकीर्ण राष्ट्रीयता का मार्ग प्रशस्त हुआ।
व्यापारिक और औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धा
वाणिज्यवाद ने विभिन्न देशों में मैत्रीपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के स्थान पर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक और औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया। इससे विध्वंसकारी युद्ध हुए।
सोने-चाँदी के संचय की निरर्थकता
वाणिज्यवाद के कारण कई पूँजीपतियों ने सोना-चाँदी प्राप्त कर उनके संचय को अधिक महत्व दिया। फलतः जिस वर्ग के पास स्वर्ण और चाँदी संचित होते गये वह विलासी और भ्रष्ट हो गया। समाज में नैतिक मूल्य समाप्त हो गये। उद्योग-धंधों के विकास स्पष्ट हुआ कि देश में सोने चाँदी के भण्डार की अपेक्षा लोहा, कोयला, खनिज, तेल आदि अधिक मूल्यवान हैं। इनके समुचित दोहन से राष्ट्र अधिक समृद्ध और शक्तिशाली होगा। इस सिद्धान्त ने सोने-चाँदी के भण्डार को निरर्थक कर दिया।
कृषि की उपेक्षा
वाणिज्यवाद के समर्थकों ने उद्योग-धंधों और व्यवसायों के अधिकतम विकास पर बल दिया। इससे कृषि का क्षेत्र अविकसित और पिछड़ा हुआ रह गया।
किसी भी देश की आर्थिक समृद्धि के लिए कृषि और उद्योग-धंधों का सन्तुलित विकास होना चाहिए। अतः वाणिज्यवाद से कृषि का ह्यास हुआ।
लोककल्याण का अभाव
वाणिज्यवाद ने राजनीतिक क्षेत्र में राज्य और शासक को और आर्थिक क्षेत्र में उद्योग-धंधों और व्यापार को आर्थिक महत्व दिया। जबकि सर्वहारा वर्ग या दरिद्र जनता या आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के हित में कोई रुचि नहीं ली। इस वर्ग के लिए कोई योजना या सिद्धान्त नहीं थे। अतः वाणिज्यवाद में गरीबों, शिल्पियों और श्रमिकों का शोषण हुआ।
राजसत्ता और शक्ति में वृद्धि
वाणिज्यवाद के समर्थकों, व्यापारियों और उद्योगपतियों ने शक्तिशाली राज्य का समर्थन किया। उसे धन से सहयोग दिया, क्योंकि उनके हित संवर्धन के लिए सशक्त राजा ही आन्तरिक शान्ति और बाह्य सुरक्षा प्रदान कर सकता था। कालान्तर में देश में धन की प्रचुरता और समृद्धि से बलशाली राजा निरंकुश स्वेच्छाचारी शासक हो गये। अतः निरंकुश शासकों ने अपनी शक्तियों और अधिकारों का दुरूपयोग किया। कालान्तर में उनकी निरंकुशता के विरुद्ध विद्रोह प्रारंभ हुए।
वार्तालाप में शामिल हों