औद्योगिक क्रान्ति के कारण - due to industrial revolution
औद्योगिक क्रान्ति के कारण - due to industrial revolution
18वीं सदी के मध्य तक इंग्लैण्ड मुख्यतया एक कृषि प्रधान देश था, पर इसके बाद वह उद्योग प्रधान देश होता गया। यह औद्योगिक क्रान्ति की प्रक्रिया लगभग 1750 ई. से 1850 ई. तक निरंतर चलती रही। अतः औद्योगिक क्रान्ति के कारण निम्नलिखित हैं-
वस्त्र उद्योग में विविध यांत्रिकी आविष्कार
18वीं सदी के मध्य में अंतराष्ट्रीय व्यापार में ब्रिटेन के सूत और सूती कपड़े की अत्यधिक माँग थी। इसलिये वस्त्र उत्पादन के क्षेत्र में विभिन्न यांत्रिकी शोध कार्य होने लगे और औद्योगिक क्रान्ति का प्रारंभ हुआ। 1753 ई. में जान नामक एक अंग्रेज बुनकर ने एक ऐसा करघा बनाया जो 54 इंच चैड़ा कपड़ा बुन सकता था।
इससे बुनकरों की बुनने की गति में दुगनी वृद्धि हो गयी। 1764 ई. में लंकाशायर के जुलाहे जेम्स हारग्रीव्ज ने सूत कातने के लिये “स्पिनिंग जेनी" नामक यंत्र बनाया। यह 8 तकलियों वाला एक करघा था। इससे 8 गुना अधिक सूत बनने लगा। इसके पश्चात् इसमें सुधार करके पवन चक्की से चलने वाला करघा बनाया। इसके बाद 1779 ई. में क्राम्टपन ने इन दोनों आविष्कारों को मिलकार पतला और मजबूत सूत कातने वाला “स्पिनिंग म्यूल" बनाया। इस आविष्कार से सूत बहुत तेजी से बनने लगा और बुनकरों को सस्ते दर पर पर्याप्त सूत मिलने लगा। कुछ समय बाद 1785 ई. में एडवर्ड कार्टराइट ने पानी और घोड़ों की शक्ति से चलने वाला यांत्रिक करघा बनाया।
1792 ई. में एली. व्हिटनी नामक एक अमेरिकन ने "काटनजिंग नामक एक ऐसी मशीन बनायी जो तीव्र गति से रूई से बिनौले निकाल देती थी। 1825 ई. में रिचर्ड राबर्ट्स ने पहला स्वचलित यंत्र बनाया। 1846 ई. में एलियास होप नामक अमेरिकी ने सिलाई मशीन का आविष्कार किया। इसके अतिरिक्त वस्त्र को सफेद बनाने की प्रक्रिया, रंगाई, छपाई आदि के लिये नवीन श्रेष्ठ प्रणालियों की खोज की गयी। 1785 ई. में टामसबेल ने कपड़ा छापने का सिलेंडर प्रिंटिंग यंत्र बनाया, जिससे ऊनी, तथा सूती कपड़े की छपाई में बहुत विकास हुआ। इन आविष्कारों का प्रयोग सूती वस्त्रों के क्षेत्र में किया जाने लगा और मशीनों से कपड़ा बुनने और छपने लगा। फलतः मेनचेस्टर और लंकाशयर में कपड़ा बनाने के बड़े-बड़े कारखाने स्थापित हो गये।
वाष्प शक्ति का आविष्कार और यंत्र
अब तक कारखानों की मशीनें नदियों के जल से चलती थीं। कल-कारखानों की मशीनों को तीव्र गति से चलाने के लिये अधिक शक्ति की आवश्यकता हुई। भाप शक्ति का आविष्कार हुआ। न्यू कामन ने सबसे पहले वाष्प से चलने वाला इंजिन तैयार किया। जेम्सवाट ने 1769 ई. में इस वाष्प चलित इंजिन में सुधार करके उसे अधिक उपयोगी और व्यावहारिक बनाया। 1775 ई. में जेम्सवाट के वाष्प इंजिन बनाने का कारखाना स्थापित हो गया। अब मशीनें, पानी के बजाय भाप से चलने लगीं। पहले वाष्प शक्ति से चलित यंत्रों का उपयोग कारखानों में फिर गाड़ियाँ खींचने और बाद में जहाज चलाने के लिये होने लगा।
लोहे और कोयले की खानें
इंग्लैंड में भाप बनाने के लिये कारखानों में कोयले की आवश्यकता हुई। इंग्लैंड में खानों से कोयला सरलता से प्राप्त हो गया। इससे कोयला उत्खनन उद्योग अस्तित्व में आया और पर्याप्त कोयला निकाला जाने लगा। खानों में काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा के लिये डेवी नामक वैज्ञानिक ने 1815 ई. में एक सेफ्टी लेप बनाया। इसी बीच कोयले की खानों के पास लोहे की खानें भी मिल गयीं। अब लोहे को गलाने के लिये लकड़ी के कोयले के स्थान पर पत्थर के श्रेष्ठ कोयले का उपयोग होने लगा। 1709 ई. में अब्राहम डर्बी ने जले हुए कोयले से लोहे को पिघलाने का सफल प्रयोग किया। 1760 ई. में जान स्मीटन ने डर्बी द्वारा अविष्कृत विधि में अच्छे सुधार किये और 1784 ई. में हेनरी कोर्ट ने लोहे को पिघलाकर शुद्ध करने की नयी विधि की खोज की।
इससे लोहे की कच्ची धातु को मिट्टी से शुद्ध करक सुगमता से पिघलाया और फिर उसका फौलाद बनाया जा सकता था। लोहे की खानों में से मिट्टी मिला हुआ लोहा निकालकर मिट्टी से शुद्ध लोहा अलग करने की पद्धति का विकास हुआ। इसके कुछ समय बाद फौलाद को अधिक मजबूत और साफ बनाने के लिये कई प्रकार की मशीनों का उपयोग होने लगा। लोहे के साथ-साथ निकल, एल्युमीनियम, ताँबा, रांगा आदि वस्तुओं को गलाने और शोधन करने की भी नवीन प्रणालियाँ निकाली गयीं। अब कई प्रकार की मशीनें बनाने के लिये लोहे और फौलाद का उपयोग होने लगा। फलतः लोहे और कोयले की खानों के पास बड़े-बड़े कारखानें बन गये। यांत्रिक इंजीनियरिंग उद्योग के अंतर्गत विभिन्न प्रकार की मशीनें बनाने और उनके • उपयोग के लिए विभिन्न प्रकार के यंत्रों और औजारों का निर्माण हुआ। 1800 ई. में हेनरी माइटले ने लेथ मशीन का निर्माण किया।
परिवहन व्यवस्था
18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में जब माल अधिक मात्रा में बनने लगा तो उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिये यातायात के द्रुतगामी साधनों की आवश्यकता हुई। फलतः ब्रिटेनवासियों ने ऐसे साधनों की खोज की। स्काटलैंडवासी जान मेक-एडम ने पक्की सड़कें बनाने की विधि खोज निकाली, जिससे घोड़ागाड़ियों द्वारा आना-जाना सुगम हो गया। थोड़े दिनों के बाद गैस के लेम्प का आविष्कार हुआ जिससे सड़कों को प्रकाशित करने और खानों में रोशनी पहुँचाने में बहुत सहायता मिली। यातायात और परिवहन के लिये नदियों को काटकर अधिक चैड़ा किया गया और नहरें निकाली गयीं। अब भाप से चलने वाली नावों और जहाजों का निर्माण हुआ।
1802 ई. में भाप से चलने वाली नाव बनायी गयी और 1812 ई. में भाप से चलने वाला जहाज बन गया। इसके बाद जहजों के निर्माण में कई सुधार हुए और 19वीं सदी के अन्त में समुद्र में भाप से चलने वाले बड़े-बड़े जहाज चलने लगे। 1825 ई. में ब्रिटेन से पहला वाष्प चलित जहाज कलकत्ता आया था। 1825 ई. में जार्ज स्टीफन ने भाप से चलने वाला प्रथम रेल इंजिन बनाया और ब्रिटेन में पहली रेलगाड़ी 1825 ई. में स्टाकहोम और डार्लिंग्टन के बीच चली। 1830 ई. में लिव्हरपूल से मेनचेस्टर तक रेल लाइन हो गयी। धीरे-धीरे 1850 ई. तक सारे इग्लैंड में रेलगाड़ियाँ फैल गयीं। रेलमार्ग और जल मार्ग के बीच आने वाले पर्वतों की बाधाओं को सुरंगों द्वारा दूर करने का प्रारंभ ब्रिडली ने किया। रेल आविष्कारों ने औद्योगिक क्रांति के स्वरूप एवं प्रबलता में सर्वाधिक परिवर्तन किया।
बिजली, तार और टेलीफोन
18वीं सदी में माइकेल फेरेडे ने बिजली की क्रांतिकारी खोज की और बाद में अमेरिका के एडिसन ने बिजली के यंत्रों का आविष्कार किया। 1837 ई. में ब्रिटेन में चार्ल्स व्हिटली और अमेरिका में सेमुअल मोर्स ने एक ही साथ बिजली के तारों की सहायता से समाचार भेजने की प्रणाली का आविष्कार किया। 1877 ई. में अलेक्जेंडर ग्राहमवेल ने टेलीफोन का आविष्कार किया। इसके बाद समुद्र के जल के भीतर केबल (तार) डालकर समुद्र के पार दूर देशों को खबर भेजने की प्रणाली भी निकाली गयी। इसी बीच हिल ने इग्लैंड में डाक के विभाग में सुधार किये और देश-विदेश में सभी स्थानों पर निश्चित दर के टिकटों के पत्र भेजे जाने की प्रणाली आरंभ हुई।
पेट्रोल चलित यंत्र
19वीं सदी में पेट्रोल की खोज हुई और पेट्रोल से मोटरें व हवाई जहाज चलने लगे। बिजली की शक्ति से भी अन्य कई मशीनें चलने लगीं। औद्योगिक क्रांति में फिर एव नवीन युग प्रारंभ हुआ। 20वीं सदी के प्रारंभ में मोटर, हवाई जहाज, बेतार का तार और रेडियों के आविष्कार हुए, जिन्होंने औद्योगिक क्रांति में तीव्र गति लाने के लिये अपूर्व सहयोग दिया। आजकल बिजली की शक्ति के स्थान पर अणु शक्ति का उपयोग होने लगा है। इससे भी महान क्रांतिकारी परिवर्तन हुए।
कृषि की उत्पादन पद्धति में परिवर्तन
ब्रिटेन में औद्योगिक क्षेत्र में ही नहीं, अपितु कृषि के क्षेत्र में भी बड़े परिवर्तन हुए। कृषि उत्पादन के क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान होने लगे।
विभिन्न प्रकार के रासायनिक खाद डालने, फसलों को बदल-बदल कर बोने, सिंचाई करने आदि नवीन प्रणालियों से कृषि भूमि की उर्वरता बढायी गयी और कृषि उत्पादन में वृद्धि की गयी। बंजर भूमि जोती गयी और उपज बढ़ायी गयी। कृषि क्षेत्र में टाउनशेड और आर्थर यंग ने महत्वपूर्ण शोध कार्य किये। हल जोतने, बीज बोने, फसलों को काटने, छाँटने आदि के लिये नये-नये यंत्रों का प्रयोग होने लगा। इससे कृषि कार्य न केवल तीव्र और सरल हो गया, अपितु उत्पादन में भी भारी वृद्धि हुई । फलतः कल कारखानों में बढ़ रही कच्चे माल की मांग को भी पूरा किया जा सका। भेड़ों को पालने और उनकी नस्ल सुधार कर अधिक ऊन उत्पन्न करने में सफल प्रयत्न किये गये। इन प्रयोगों और खोजों से खाद्यान्न और ऊन की उत्पत्ति पहले की अपेक्षा
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