द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण - due to world war II
द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण - due to world war II
पेरिस शांति सम्मेलन में 28 जून, 1919 ई. की वर्साय की अपमानजनक संधि के पश्चात् फ्रांस के मार्शल फॉच ने कहा था- 'यह शांति संधि नहीं 20 वर्ष के लिए युद्ध विराम मात्र है।' उसकी यह भविष्यवाणी सत्य साबित हुई। इसी प्रकार एजवर्गर ने भी कहा था कि 'जर्मन जाति कष्ट सहेगी पर मरेगी नहीं। अंततः जर्मन जाति के कष्टों को दूर करने का बीड़ा हिटलर ने उठाया। सर्वप्रथम उसने जर्मनी की सत्ता प्राप्त कर वहाँ अधिनायक तंत्र की स्थापना की। उसे इटली के मुसोलिनी एवं जापान के सैन्यवादियों का सहयोग मिला। इन सभी की अधिनायकवादी नीति ने एक बार पुनः विश्व को द्वितीय विश्व युद्ध की ज्वाला में झोंक दिया।
(1) वर्साय संधि- पेरिस शांति सम्मेलन में मित्र राष्ट्रों इंग्लैंड एवं फ्रांस द्वारा जर्मनी पर वर्साय जैसी अपमानजनक संधि आरोपित करना द्वितीय विश्वयुद्ध का एक प्रमुख कारण था। जर्मनी के अल्सास एवं लारेन प्रदेश वापस ले लिए। जर्मनी से सार घाटी का महत्वपूर्ण प्रदेश 15 वर्ष के लिए छीन लिया गया। जर्मनी की सामुद्रिक एवं नौसैनिक शक्ति को दुर्बल बना दिया गया। जर्मनी की जनता ने अपने आपको काफी अपमानित महसूस किया। जर्मन जनता प्रतिशोध की ज्वाला में जलने लगी। जब उन्हें हिटलर के रूप में एक अधिनायक मिला तो उनकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। हिटलर ने सत्ता प्राप्त कर वर्साय की संधि की धाराओं को तोड़ा।
सार की घाटी पुनः प्राप्त की। उसने जर्मन जनता से कहा था- मेरे समय युद्ध छिड़ जाना चाहिए। उसने जो कहा कर दिखाया। हिटलर के पोलैंड पर आक्रमण के साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया।
(2) जर्मनी में उग्र राष्ट्रीयता जर्मनी में हिटलर के सत्ता में आते ही जर्मन जनता में अत्यधिक उत्साह का संचार हुआ। जर्मन जनता में जातीय उच्चता का तेजी से प्रसार हुआ। वे अपने को विश्व की सर्वश्रेष्ठ जाति समझने लगे। जर्मनी के उग्र विदेशनीति को अपनाते ही जर्मनी में उग्र राष्ट्रीयता के विकास ने द्वितीय विश्वयुद्ध का मार्ग प्रशस्त किया।
(3) इटली एवं जापान में उग्रराष्ट्रवाद एवं सैन्यवाद का विकास- 1919 ई. के पेरिस शांति सम्मेलन की स्थिति देखें तो इस सम्मेलन में फ्यूम न मिल पाने के कारण असंतुष्ट होकर इटली सम्मेलन का परित्याग कर लौट आया था। दूसरी ओर जापान को इस सम्मेलन द्वारा चीन में जर्मन क्षेत्र प्राप्त हुए थे। 1921-22 ई. के वाशिंगटन सम्मेलन ने जापान की पेरिस शांति सम्मेलन की उपलब्धियों को धो डाला। अब इटली की तरह जापान भी अत्यंत असंतुष्ट हो गया। इटली में मुसोलिनी के अधीन फासीवाद का उदय हुआ एवं जापान में सैन्यवादी शासन स्थापित हुआ। इस प्रकार इटली एवं जापान में उग्रराष्ट्रवाद एवं सैन्यवाद के विकास ने भी द्वितीय विश्वयुद्ध का मार्ग प्रशस्त किया।
(4) प्रजातंत्रीय एवं एकतंत्रीय विचार धाराओं का विकास प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् विश्व दो विचारधाराओं में विभाजित हो गया। मित्र राष्ट्र इंग्लैंड, फ्रांस एवं अमेरिका प्रजातंत्र के समर्थक थे तो दूसरी ओर धुरी राष्ट्र जर्मनी, इटली एवं जापान एकतंत्र के समर्थक थे। इन दो विचारधाराओं में बटे विश्व के बारे में मुसोलिनी ने कहा था- इन विचारों में समझौता होना असंभव है। इस संघर्ष के कारण हम रहेंगे या वे ही रहेंगे। मुसोलिनी के इस कथन में द्वितीय विश्वयुद्ध का स्पष्टतः संकेत मिल रहा था। समस्त विश्व दो गुटों में विभाजित था। इन गुटों के मध्य बढ़ती ईर्ष्या, द्वेष, संदेह एवं घृणा ने अंततः समस्त विश्व को द्वितीय विश्वयुद्ध के द्वार पर ला खड़ा किया।
(5) ब्रिटेन एवं फ्रांस में मतभेद यद्यपि प्रथम विश्वयुद्ध में ये दोनों विजयी राष्ट्र थे, पेरिस शांति सम्मेलन में ये दोनों ही प्रमुख कर्ता-धर्ता थे, तथापि इनमें आधारभूत मतभेद थे। फ्रांस जर्मनी को पूर्णतः पंगु बनाना चाहता था। इंग्लैंड कूटनीति से काम ले रहा था। वह शक्ति संतुलन बनाना चाहता था। एक ओर इंग्लैंड जर्मनी को कमजोर करना चाहता तो दूसरी ओर वह फ्रांस को भी अधिक शक्तिशाली नहीं बनने देना चाहता था। इंग्लैंड की इस नीति का एवं इंग्लैंड व फ्रांस के मध्य दृष्टिकोण के अंतर का लाभ हिटलर ने उठाया। जर्मनी, जापान व इटली इन दोनों राष्ट्रों के मतभेद का लाभ उठाकर राष्ट्रसंघ की अवहेलना करते रहे। अंततः ब्रिटेन व फ्रांस के आपसी मतभेदों ने भी द्वितीय विश्वयुद्ध के आरंभ में अप्रत्यक्ष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
(6) विश्वव्यापी आर्थिक मंदी 1929-30 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी भी अप्रत्यक्ष रूप से द्वितीय विश्वयुद्ध के आरंभ के लिए जिम्मेदार थी। विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के कारण जर्मनी एवं इटली भी प्रभावित हुए। हिटलर एवं मुसोलिनी ने अपने देशों की सरकार को इस आर्थिक संकट से निपटने में असफल बताया
और जनता की सहानुभूति अर्जित की। जनता ने नाजीवादी एवं फासीवादी विचार धाराओं का समर्थन किया। हिटलर एवं मुसोलिनी ने वैधानिक रूप से सत्ता प्राप्त कर ली।
आर्थिक संकट का लाभ उठाकर इटली ने अबीसीनिया पर एवं जापान ने मंचूरिया पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार ये देश द्वितीय विश्वयुद्ध की ओर कदम बढ़ाते रहे।
(7) राष्ट्रसंघ की असफलता प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् अंतरराष्ट्रीय शांति की स्थापनार्थ अमेरिका के राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन की 14 सूत्रीय योजनानुसार राष्ट्रसंघ की स्थापना की गई थी। अमेरिका ही राष्ट्रसंघ का सदस्य नहीं बना। इस संबंध में गैथान हार्डी ने सत्य ही लिखा था एक बालक यूरोप के दरवाजे पर अनाथों की भाँति छोड़ दिया गया, जिसके चेहरे-मोहरे से अमेरिकन पैतृकता स्पष्टतः दिखाई दे रही थी । "
अमेरिका की अनुपस्थिति से इंग्लैंड एवं फ्रांस ने राष्ट्रसंघ को अपनी कूटनीति का अखाड़ा बनाया। राष्ट्रसंघ के प्रति विभिन्न देशों में अविश्वास की भावना व्याप्त थी । जर्मनी ने इसे 'विजेता राष्ट्रों का संघ कहा', इटली ने इसे संतुष्ट राष्ट्रों का संघ, रूस के लेनिन ने इसे 'पूँजीवाद हथियार' कहा।
राष्ट्रसंघ की असफलता इन शब्दों में उजागर होती है जहाँ वियेना विवाद ने राष्ट्रसंघ की विवशता को उजागर किया वहीं मंचूरिया संकट संघ की दुर्बलता का घोतक बना। इसके बाद कोर्फ विवाद ने राष्ट्रसंघ को पूर्णतः नपुंसक बना दिया। रही सही कसर हिटलर ने पूर्णकर राष्ट्रसंघ की अंत्येष्टि कर दी।
इस प्रकार हम देखते हैं कि जो राष्ट्रसंघ आगामी युद्ध की स्थिति रोकने के लिए बना था वही राष्ट्रसंघ की असफलता अंततः द्वितीय विश्वयुद्ध का अप्रत्यक्ष कारण बनी।
(8) मोर्चाबंदी - जर्मनी, इटली एवं जापान की 1930 ई. के पश्चात् की विस्तारवादी कार्यवाहियों ने विभिन्न राष्ट्रों के बीच असुरक्षा का भाव जाग्रत किया। विभिन्न राष्ट्र अपनी सुरक्षा सैन्य तैयारियों एवं मोर्चाबंदी में लग गए। जिस प्रकार 10 मई 1871 की फ्रेंकफर्ट संधि के पश्चात् जर्मनी को फ्रांस के आक्रमण का भय था उसी प्रकार 28 जून 1919 ई. को वर्साय की संधि के पश्चात् फ्रांस को जर्मनी के प्रतिशोध का भय सता रहा था।
इसी भय को दूर करने के लिए फ्रांस ने अपनी उत्तर-पूर्वी सीमा पर जमीन के नीचे किलों की एक श्रृंखला बनाई जिसे 'मैजिनो लाइन' कहा गया। क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया स्वरूप जर्मनी ने भी अपनी सीमा पर किलेबंदी की जिसे - सीजफाइड लाइन' कहा जाता है। इस प्रकार की मोर्चाबंदियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध को अनिवार्य बना दिया।
(9) हिटलर की विदेश नीति हिटलर की आक्रामक विदेश नीति द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए पूर्णतः जिम्मेदार थी। उसने जर्मन जनता को स्वयं विश्वास दिलाया था कि 'मेरे समय युद्ध छिड़ जाना चाहिए' इससे स्पष्ट है कि हिटलर तो द्वितीय विश्व युद्ध के छिड़ने का ही इंतजार कर रहा था।
समस्त विश्व को स्तब्ध करने वाली हिटलर की विदेश नीति के प्रमुख पड़ाव यह थे आस्ट्रिया का जर्मनी में विलय, चेकोस्लोवाकिया का अंग-भंग, लिथुआनिया से मेमल प्रदेश छीनना, एवं पौलैंड के गलियारे एवं डेजिंग बंदरगाह को छीनने का प्रयास। इस प्रकार हिटलर की विदेश नीति ने विश्व को एक ऐसे विश्वयुद्ध की ओर अग्रसर किया जहाँ से वापस लौट पाना नामुमकिन था।
(10) द्वितीय विश्वयुद्ध का तात्कालिक कारण हिटलर अपनी आक्रामक विदेश नीति के तहत जब भी किसी देश को या उसके भाग को हड़पता था तो इंग्लैंड को यह कह कर संतुष्ट करता था कि- 'वह तो यह कार्यवाही रूस के साम्यवादी विस्तार को रोकने के लिए कर रहा है।' पूँजीवादी देश इंग्लैंड एवं फ्रांस इस समय रूस के साम्यवादी विस्तार से अत्यधिक चिंतित थे। इसी कारण वे हिटलर की आक्रामक कार्यवाहियों के प्रति तुष्टीकरण की नीति अपना रहे थे। हिटलर इसका फायदा उठा रहा था।
1 सितंबर 1939 ई. को हिटलर ने पोलैंड पर आक्रमण किया। इस समय तक इंग्लैंड की जनता तुष्टीकरण की नीति की विरोधी हो गई थी। फ्रांस में भी भय की भावना व्याप्त थी। अतः इंग्लैंड के चैम्बरलेन ने हिटलर को चेतावनी दी कि वह फौरन पौलैंड से सेना वापस बुलाए। हिटलर को अपने कदम पीछे हटाने की आदत नहीं थी, उसने इसे इंग्लैंड की कोरी धमकी माना। मगर यह कोरी धमकी नहीं थी। इंग्लैंड ने जो कहा वह कर दिखाया। इंग्लैंड ने 3 सितंबर 1939 ई. को जर्मनी के विरुद्ध युद्ध आरंभ कर दिया। इस प्रकार हिटलर का पोलैंड पर आक्रमण ही द्वितीय विश्वयुद्ध का तात्कालिक कारण बना।
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