पूर्व मध्यकालीन भारत : वेशभूषा एवं आभूषण - Early Medieval India: Costume and Jewelry
पूर्व मध्यकालीन भारत : वेशभूषा एवं आभूषण - Early Medieval India: Costume and Jewelry
वेशभूषा
खजुराहो में प्राप्त मूर्तियों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि उस समय स्त्रियों की वेशभूषा लगभग वैसी ही थी, जैसी आज भी भारत के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। खियाँ और पुरुष दोनों धोती पहनते थे, उसे कमर में लपेटकर शेष भाग को स्कंध पर डाल देते थे। ऊपर पहनने का वस्त्र उत्तरीय था जिसे स्त्री-पुरुष दोनों पहनते थे। स्त्री समाज अलंकरण और प्रसाधन में रुचि रखता था। अनेक प्रकार की केश विन्यास प्रणालियाँ प्रचलित थीं। वे गंधतेल, चंदन, कज्जल, सुरमा, मिस्सी आदि सौन्दर्य प्रसाधनों का प्रयोग करती थीं। उनके प्रमुख आभूशण वलय, मुक्ताहार, कुण्डल, कांची, नूपुर आदि थे। नीवी, चोलक, दुकूल आदि परिधान स्त्रियों द्वारा धारण किये जाते थे।
परिधान नील, लोहित, आदि रंगों के होते थे। धनिक वर्ग में चीनांशुक का प्रयोग होता था। रेशमी वस्त्र के विषय में सुलेमान लिखता है कि वह मुद्रिका के मध्य से निकल जाता था। पुरुषों के वस्त्र अधिकतर श्वेत होते थे। बौद्ध भिक्षु भिक्षुणियाँ गेरुए चीवर धारण करती थीं। जैन सन्यासी पीत तथा हिंदू सन्यासी काषाय वस्त्र धारण करते थे। अलबरूनी का मत है कि पुरुष धर्म-उपानह धारण करते थे परंतु स्त्री समाज में इनका उपयोग नहीं होता था।
आभूषण
पूर्व मध्य कालीन स्त्रियाँ आभूषणों तथा चित्रकारी से भी शृंगार करती थीं। प्रबोध चन्द्रोदय के एक स्थल से चन्देलयुगीन स्त्रियों के शृंगार पर प्रकाश डाला गया है।
'महामोह' नामक पात्र का मिथ्यादृष्टि के संबंध में यह कथन है कि वह मन्थर गति से बाहु हिलाने से कंकण ध्वनि करती हुई क्रीड़ा से भूपति पुष्प माला को कौतुक से उठाती हुई आ रही है। उसी नाटक के एक अन्य स्थल में तत्संबंधी और विवरण भी है। स्त्रियों के शृंगार का वर्णन करते हुए 'वस्तु विचार नामक पात्र का कथन है कि “खनखनाते हुए मणिमुक्ताहार सोने के चरणालंकार कुंकुम के राग सुगंधित पुष्प विचित्र मालों, रंग-बिरंगी कपड़ों से नारी की कल्पना की गई है। ललितपट्टन अभिलेख में दन्तपंक्तियों के रंगने का उल्लेख हैं।
इन निर्देशों से स्पष्ट है कि स्त्रियाँ अपने शरीर को सोने, चाँदी तथा अनेक मणि के आभूषणों तथा पुष्प और मौक्तिक मालाओं से सुसज्जित करती थीं कभी-कभी अपने पक्ष को भी वे छोटी-छोटी पंक्तियों से सुसज्जित करती थी
और सीमेन्ट की भाँति के एक सुगंधित पदार्थ द्वारा शरीर में संलग्न करती थी। इन सभी श्रृंगारों में सिन्दू का बड़ा महत्व था। इसका उल्लेख शिलालेखों तथा साहित्य में है। आज की भाँति उस युग में भी यह सधवाओं का सौभाग्य चिन्ह माना जाता था और इसी कारण विजेता नरेशों का उल्लेख शत्रु पत्नियों के सिन्दू के संदर्भ में मिलता है। प्रबोध चन्द्रोदय में 'राजा' नामक पात्र का कथन है कि "सूर्यास्त की भाँति रक्त सिन्दू जिससे ईश्वर विरोधियों की पत्नियों की सीमन्त सजाई जाती थी, उस सिन्छू के प्रक्षालन में आप दक्ष हैं। राजा के वीरोचित कार्यों के वर्णन में 'रिपुबिलासिनी सीमन्तोद्धरण हेतु पद का प्रायः उल्लेख होता है। भीम नगरी गढ़ ताम्रलेख में 'शत्रु सीमन्तनीकेशपासकुसुम' वासित पद से प्रतीत होता है कि सिन्दूर के अतिरिक्त पुष्पों से भी सियाँ अपने बालों का शृंगार करती थीं।
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