पूर्व मध्यकालीन भारत : शिक्षा पद्धति एवं शिक्षण संस्थायें - Early Medieval India: Education System and Educational Institutions

पूर्व मध्यकालीन भारत : शिक्षा पद्धति एवं शिक्षण संस्थायें - Early Medieval India: Education System and Educational Institutions


शिक्षा पद्धति


राजशेखर के ग्रंथों में मसिपिंड, अष्टादश लिपि, केतलीदल लेख पाठ इत्यादि शब्द मिलते हैं। जिनसे ज्ञात होता है कि शिक्षा की समुचित व्यवस्था थी। राजशेखर ने 'कर्पूरमंजरी' में विद्यार्थियों के तीन वर्गों का वर्णन किया है, सहजा (जो एक बार सुनकर याद कर ले), आहार्यबुद्धि (जो अभ्यास से याद करे) और औपदेशिका (जो उपदेश से भी शिक्षा ग्रहण न कर सके। परंपरागत चैदह विषयों के अतिरिक्त वार्ता ( कृषि और वाणिज्य), दंडनीति कामशास्त्र, शिल्पशास्त्र, और साहित्य विद्या की शिक्षा दी जाती थी। नालन्दा, विक्रमशिला, वलभी, काम्पिल्य, पाटलिपुत्र, अविन्त, भिनमाल, कन्नौज आदि शिक्षा के केन्द्र थे। इन केन्द्रों में समय-समय पर ब्रह्म सभाएँ होती थीं जो काव्य शास्त्र की परीक्षा लेती थीं।


संस्कृत सदैव से ही विद्वानों की भाषा रही और उच्च कक्षाओं के पाठ्यक्रम में उसका समावेश था। साधारण ज्ञान की प्रारंभिक शिक्षा साधारणतः जन साधारण की भाषा में ग्रामों में अध्यापकों द्वारा दी जाती थी। इन अध्यापकों का मुख्य कार्य अपने विद्यार्थियों को लिखने-पढ़ने तथा गणित का व्यवहारिक ज्ञान कराना था। उच्च शिक्षा का पाठ्यक्रम अधिक जटिल था। शिलालेखों के साक्ष्य से ज्ञात होता है कि वेद, वेदांग (व्याकरण, साहित्य, धर्म, श्रुति तथा तर्कशास्त्र) उच्च शिक्षा के मुख्य अंग थे। देववर्मा के ननयौरा ताम्रलेख में ब्राह्मण अभिमन्यु का उल्लेख है।

जो वेदांग का पूर्ण ज्ञाता था। धंगदेव के खजुराहो शिलालेख में उसके रचयिता 'राम' का निर्देश सूक्ति रचना दक्ष के रूप में है। उसका पिता बलभद्र साहित्य रत्नाकर तथा श्रुतिपारदर्शिन और पितामह नन्दन कविचक्रवर्तिन था। चन्देल वंश के अंतिम महान नरेश परमर्दिदेव ने शुद्ध संस्कृत में भगवान् शंकर की स्तुति लिखी थी। व्याकरण सभी शास्त्रों के ज्ञान की कुंजी समझी जाती थीं और उसके अध्ययन का बड़ा प्रचार था। देश में उत्तम वैयाकरणों की कमी न थी। शिलालेखों में देहु वैयाकरणी का उल्लेख मिलता है।

उसके पुत्र माधव ने यशोवर्मन के खजुराहो शिलालेख की रचना की थी। उस समय विज्ञान की अनेक शाखाओं के अध्ययन का भी सम्यक् प्रचार था। कवीन्द्र देवधर रचित बघरी शिलालेख में यह वर्णन है कि लक्ष्मीधर समस्त विज्ञानरूपी जलाशय में निवास करने वाले राजहंस के समान था। निःसंदेह "समस्त विज्ञान" के उल्लेख से कोई बात स्पष्ट नहीं होती है फिर भी तत्कालीन स्थापत्य कला के विकास एवं अभ्युदय से स्पष्ट है कि इस दिशा में भी विशेष प्रगति हुई थी। मूर्तिकला भी अपनी चरम सीमा पर थी। किन्तु विद्योन्नति की इतिश्री यहीं से नहीं । साहित्य, स्थापत्य तथा मूर्तिकला के साथ ही साथ अन्य लाभदायक विज्ञानों की भी समुचित उन्नति हुई। थी। अनेक शिलालेखों में वैद्यों का उल्लेख है। इससे प्रकट होता है कि उन दिनों आयुर्वेद का पर्याप्त प्रचार था। इसके अतिरिक्त पशुचिकित्सा का भी समुचित विकास था जैसा कि अश्ववैद्य के निर्देश से स्पष्ट है। 


शिक्षण संस्थायें


विशाल एवं सुन्दर मंदिर राजपूत युग की देन थे और अतीतकाल से मंदिर ही शिक्षा तथा संस्कृति के केन्द्र रहे हैं। मंदिरों को राज्य की ओर से अथवा धनी-मानी व्यक्तियों द्वारा दान प्राप्त होता था। मंदिरों में देश-विदेश से आये हुए छात्रों को विद्यादान किया जाता था। उस युग में 'अग्रहार' ग्राम भी विद्या तथा शिक्षा के केन्द्र थे। राजपूत शिलालेखों में अनेक अग्रहार ग्रामों का उल्लेख मिलता है। विक्रमाब्द 1107 में देववर्मन का "कंठहऊ" नामक ग्राम वेदवेदांग पारंगत, ब्राह्मणोचित छहों कत्र्तव्यों में रूचि रखने वाले ब्राह्मण अभिमन्यु को दान दिया गया था, परमर्दिदेव के विक्रमाब्द 1203 के महोबा दानलेख में दंडीव महाग्रहार से आये हुए ब्राह्मणरत्न शर्मन को मकर संक्रान्ति के अवसर पर धनौरा ग्राम की भूमि के दान उल्लेख है।

इन अग्रहार ग्रामों में शिक्षा संस्थाएँ थीं और वहाँ निवास करने वाले विद्वान् ब्राह्मण शिक्षा तथा विद्या की उन्नति के प्रति प्रयत्नशील रहते थे।


इन सभी प्रयत्नों के फलस्वरूप विद्या की बड़ी उन्नती थी। विद्या का प्रचार केवल ब्राह्मणों तक ही सीमित न था। राजकुमार भी साहित्य, कला तथा कविता में निपुणता प्राप्त करने के लिये प्रयास करते थे। परमर्दिदेव ने भगवान् शंकर की स्तुति में सुन्दर श्लोक लिखे गंड ने भी सुलतान महमूद की प्रशंसा में कुछ छन्द लिखे थे।


पूर्व मध्यकालीन शिलालेखों के विश्लेषण से स्पष्ट है

कि उस समय उत्कृष्ट कविताओं की रचना सफलतापूर्वक की जाती थी। अधिकांश राजपूत शिलालेखों की रचना शासन अधिकारियों द्वारा हुई थी, किन्तु उनके काव्य सौष्ठव को देखकर प्रतीत होता है कि उन कवियों ने काव्य मर्मज्ञता प्राप्त करने के लिये पर्याप्त प्रयास किया होगा। उनमें से अधिकांश उल्लेख कवि चक्रवर्ती, साहित्य रत्नाकर आदि के रूप में हुआ है, जिससे जनसाधारण तथा राज्य की रूचि का बोध होता है। इस साहित्यिक विकास के साथ-ही- साथ दर्शन शास्त्र में भी लोगों की विशेष रूचि थी। प्रबोध चन्द्रोदय नामक दार्शनिक नाटक का अभिनय कीर्तिवर्मन के समक्ष प्रस्तुत हुआ था। इससे भी उस युग की दार्शनिकता का बोध होता है।


राजपूत नरेश विद्वानों के आश्रयदाता थे। प्रसिद्ध विद्वान राजशेखर इस युग की साहित्यिक विभूति थे, जिन्होंने कर्पूरमंजरी, विद्धशालभंजिका काव्यमीमांसा, बाल-भरत आदि ग्रंथों की रचना की। क्षेमेश्वर भी संभवतः राजपूतों की राज सभा में रहता था।


 खान-पान


मदिरा पान का समाज में प्रचार था। राजशेखर ने राजा, सन्यासी और साधारण प्रजा तीनों में मंदिरा पान का प्रचलन बताया है। राजशेखर की साहित्यिक कृतियों में मदिरापान का इतना वर्णन है कि तत्कालीन समाज में इसकी लोकप्रियता प्रमाणित हो जाती है। अलमसूदी और राजशेखर का कथन है कि स्त्रियाँ भी सुरापान करती थीं।


ब्राह्मण समाज में माँस भक्षण निषिद्ध था परंतु इस विषय में मुस्लिम इतिहासकारों के वर्णन में विरोधाभास है। अलमसूदी का कथन है कि ब्राह्मण किसी भी जानवर का माँस नहीं खाते थे किन्तु अलबरूनी का कथन है कि वे गैंडे का माँस खा सकते थे। सामान्यतः भेड़, बकरी, खरगोष, भैंस, मछली, मुर्गा, बदक, मोर आदि जानवरों का माँस खाया जाता था। पशुओं में घोड़ा, गाय, खच्चर, गधे, ऊँट, तथा हाथी का माँस भक्षण वर्जित था। इनकी स्वतः मृत्यु हो जाने पर शूद्र इनका माँस भक्षण कर सकते थे। ब्राह्मणों के लिये लहसुन, प्याज, गाजर, एक प्रकार की लौकी तथा पानी में उगने वाली कमल ककड़ी का सेवन वर्जित था। वे गाय तथा भैंस के दूध के अतिरिक्त अन्य जानवरों के दूध का भक्षण नहीं करते थे।

सामान्यतः भोजन में अनाज, घी, दूध तथा शक्कर का समावेश रहता था। अलबरूनी कहता है कि ब्राह्मण एक-एक करके भोजन करते थे तथा भोजन के पूर्व तथा पश्चात् उस स्थान को गाय के गोबर से लीपते थे।


अन्तरजातीय भोज


अन्तर्जातीय विवाह के निषेध के साथ ही अन्तर्जातीय भोज के भी नियम कठोर हो गये थे। आंगिरस में शूद्र के साथ सहभोज का निषेध है। किन्तु राजपूत युग में ये नियम इतने कठोर हो गये थे कि ब्राह्मण भी बिना पाद-प्रक्षालन वटु के निवास में प्रवेश न कर सकाता था।

इन कठोर नियमों के होते हुए अन्तर्जातीय सहभोज संभव न था। अल्बरूनी का कथन है कि यदि कोई ब्राह्मण कुछ निश्चित दिनों तक शूद्र के घर का भोजन करता था वह जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता था। ब्राह्मण तथा क्षत्रियों के भोजन में अन्तर आ जाने से उनका परस्पर सहभोज असंभव हो गया था। ब्राह्मण पूर्ण शाकाहारी बन गये थे जब कि क्षत्रिय माँसाहारी हो रहे थे। इन परिस्थितियों में ब्राह्मण तथा वैश्यों का सहभोज भी असंभव हो गया था। इस प्रकार सवर्ण विवाह की भाँति, उस युग में, सजातीय सहभोज की ही प्रतिष्ठा थी ।


प्रमुख संस्कार


पूर्व मध्यकालीन सामाजिक जीवन सादा था। कर्पूरमंजरी में कहा गया है कि हिंदू परस्पर मिलने पर अभिवादन करते थे।


संतान प्राप्ति के लिये गर्भाधान संस्कार किया जाता था। गर्भधारण के चैथे मास में सीमन्तोन्नयन नाम संस्कार तथा पुत्र प्राप्ति होने पर जात्तकर्मन, नामकरण आदि संस्कार किये जाते थे। संतान उत्पन्न होने पर उस घर में अन्य व्यक्ति अन्न जल ग्रहण नहीं करते थे। यह अवस्था सभी जातियों के लिये अलग- अलग थी। संतान के तीन वर्ष का हो जाने पर चूड़ाकरण संस्कार तथा आठ वर्ष का हो जाने पर कर्णभेद नामक संस्कार किया जाता था।


मृतक का दाह संस्कार किया जाता था परंतु आश्रम में रहने वाले सिद्ध पुरुषों को समाधिस्थ किया जाता था।

अलबरूनी का कथन है कि निर्धनता के कारण जो व्यक्ति शव का दाहकर्म करने में असमर्थ होते थे वे शव को खुला छोड़ देते थे या जल में प्रवाहित कर देते थे। अल-उतबी का कथन है कि शव को जलाने के पश्चात् उसके अवशेषों को नदी में प्रवाहित कर दिया जाता था ऐसा करने से मृतक के पाप नष्ट हो जाते हैं। अलबरूनी कहता है कि मृतक के दाह स्थल पर स्मृति चिन्ह बनाया जाता था। मृतक के संस्कार के पूर्व उसे स्नान कराया जाता था तथा उसकी केशसज्जा की जाती थी। तत्पश्चात् चंदन तथा तीव्र अग्निग्राही पदार्थों की सहायता से उसका दहन किया जाता था। मृतक के शव के साथ जो व्यक्ति दाह स्थल तक जाते थे वे लौटते समय अपने कपड़े साफ करते तथा केशों को मुंडवाते थे।

शव घर में रहने पर कोई भोजन आदि ग्रहण नहीं करता था। अलबरूनी के वर्णन के अनुसार दाहकर्म के दसवें व तेरहवें दिन विशेष उत्सव होते थे तथा इनका क्रम एक वर्ष तक चलता था। 


ज्योतिष का प्रभाव


ज्योतिष तथा खगोल विद्या में लोगों की पूर्ण निष्ठा थी। लोगों के दैनिक जीवन में भी उनकी पैठ थी। इन विधाओं का प्रभाव केवल जनसाधारण तक ही न सीमित था। धनी, निर्धन, शिक्षित प्रशिक्षित सभी समान रूप से इनके महत्व को स्वीकार करते थे। साधारण कार्यों से लेकर राजाओं के सैन्य प्रस्थान तक के मुहूर्त ज्योतिषियों द्वारा निश्चित किये जाते थे। इसकी पुष्टि प्रबोध चन्द्रोदय से भी होती है। विजय- प्राप्ति के हेतु अनुष्ठान भी किये जाते थे।