औद्योगिक क्रांति के प्रभाव और परिणाम - Effects and Consequences of the Industrial Revolution
औद्योगिक क्रांति के प्रभाव और परिणाम - Effects and Consequences of the Industrial Revolution
राजनीतिक प्रभाव एवं परिणाम
नवीन राजनीतिक विचारधाराएँ
औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप नये स्थापित, उद्योग-धंधे और कल-कारखाने धनवानों और पूँजीपतियों के हाथों में आ गये, क्योंकि इसके लिए अधिक धन की आवश्यकता होती थी। इन मिलों और कारखानों में मशीनों द्वारा थोड़े से मजदूरों से अधिक उत्पादन का कार्य होने लगा। इससे उत्पादन तो बढ़ा पर बेरोजगारी और बेकारी बढ़ने लगी, मजदूरी के घंटे अधिक और मजदूरी कम होने लगी। अपनी आर्थिक कमियों को पूरा करने के लिये स्त्रियाँ बच्चे भी काम पर जाने लगे। उनका स्वास्थ्य गिरने लगा।
इससे श्रमिकों में असंतोष बढ़ा, दंगे-फसाद होने लगे, मिलों और कारखानों में झगड़े होने लगे। अतः लोगों में राजनीतिक चेतना और अधिकारों की भावना उत्पन्न हुई और वे अनुभव करने लगे कि अधिकांश मजदूर और जनता गरीब हैं, परन्तु कारखानों, मिलों और उद्योगों के मालिक, और अधिक धनवान बनते जा रहे हैं। वे मजदूरों का शोषण कर रहे हैं। धीरे-धीरे यह विचारधारा फैलने लगी की उत्पादन के साधन जैसे भूमि, खनिज पदार्थ आदि पूँजीपतियों और उद्योगपतियों की निजी संपत्ति नहीं है, अपितु देश की राष्ट्रीय और सामूहिक संपत्ति है। इसलिये इस पर राज्य का अधिकार होना चाहिए एवं उत्पादन के साधनों और उत्पादित वस्तुओं का उपयोग राज्य के सभी व्यक्तियों के हित में होना चाहिये तथा धन का वितरण भी व्यक्तियों की कार्यशक्ति के अनुसार होना चाहिये।
कल-कारखानों, उद्योगों और मिलों को सहकारिता के सिद्धांतों के आधार पर चलना चाहिये। इन सब नवीन लक्षणों को तथा श्रमिकों का पूँजीपतियों द्वारा शोषण देखकर राबर्ट ओवन, सेंट साइमन, लुई ब्लांक और कार्ल माक्र्स जैसे विद्वानों, दार्शनिकों और विचारकों ने सुधार के लिये कुछ नवीन सिद्धांत प्रतिपादित किये। इन सब बातों का परिणाम यह हुआ कि समाजवादी, साम्यवादी, समष्टिवादी आदि राजनीतिक सिद्धांतों का जन्म हुआ। इनमें कार्ल माक्र्स के साम्यवाद के सिद्धांतों का खूब प्रभाव पड़ा।
जागीरदारी का अन्त तथा पूँजीवाद का आरंभ
औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप ब्रिटेन में सामन्तवादी अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे नष्ट हो गयी और उसके स्थान पर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था अस्तित्व में आयी।
नवीन उद्योग धंधों और कल-कारखानों को स्थापित करने में अत्यधिक धन की आवश्यकता होती थी जो साधारण मनुष्यों या श्रमिकों की शक्ति व सामथ्र्य के बाहर की बात थी। इससे धनवानों ने अपनी पूँजी लगाकर ये कल-कारखाने स्थापित किये। मशीनों से जो अधिक उत्पादन हो जाता था, उससे भी मिलों और कारखानों के मालिक अधिक धनवान होते गये। इससे पूँजीपतियों और मजदूरों के दो विभिन्न वर्गों का प्रादुर्भाव हुआ। श्रमिकों की विवशता का लाभ उठाकर उनसे कम से कम मजदूरी पर अधिक से अधिक देर तक काम लिया जाने लगा। इस पूँजीवादी व्यवस्था में आर्थिक स्वतंत्रता के नाम पर उत्पादन की अनियंत्रित स्पर्धा चलने लगी। इस नवीन अर्थव्यवस्था और स्पर्धा से मालिक और मजदूर वर्गों के मध्य संघर्ष प्रारंभ हो गया।
उपनिवेशों की स्थापना एवं परस्पर संघर्ष
यूरोप के विभिन्न उद्योग प्रधान देशों और ब्रिटेन ने ज्यों-ज्यों अधिकाधिक वस्तुएँ उत्पन्न कीं, त्यों- त्यों उन्हें विश्व के उन देशों की खोज करना पड़ी जहाँ उनकी बनायी हुई तथा तैयार या उत्पादित वस्तुओं की खपत हो सके तथा जहाँ से उनको कच्चा माल प्राप्त हो सके। इससे उद्योग प्रधान देशों ने विश्व के पिछड़े हुए देशों व भागों में अपने-अपने उपनिवेश स्थापित किये। फलतः यूरोपीय राष्ट्रों में परस्पर उपनिवेशों और सामुद्रिक व्यापार के लिये दीर्घकालीन संघर्ष और युद्ध प्रारंभ हो गये ।
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