पुनर्जागरण के प्रभाव एवं महत्व - Effects and Importance of Renaissance
पुनर्जागरण के प्रभाव एवं महत्व - Effects and Importance of Renaissance
सर्वमान्य है कि पुनर्जागरण एक साहित्यिक क्रांति थी, किन्तु यह उचित नहीं है। पुनर्जागरण ने जीवन के प्रत्येक पहलू को प्रभावित किया। मानव जीवन की श्रेष्ठता एवं उसका महत्व बढ़ गया। लोग आशावादी होने लगे। भौतिक सुखों एवं मनोरंजनों को भी मानव जीवन के लिए परम आवश्यक माना गया। तत्कालीन कला एवं साहित्य ने मानव जीवन की कठिनाइयों तथा उनके दूर करने के उपायों को प्रस्तुत किया। गरीब व्यक्तियों की ओर जनता तथा सरकार का ध्यान आकर्षित हुआ। लोगों में मनुष्यता की भावना ने जन्म लिया। पुनर्जागरण के प्रभाव एवं महत्व निम्नानुसार समझा जासकता है -
धार्मिक आन्दोलन
धार्मिक क्षेत्र में पुनर्जागरण का महत्व आडम्बरों को त्याग कर सरल और धार्मिक नियमों का पालन करने में था। इससे जन-साधारण में फैले अन्धविश्वास और हानिकारक धार्मिक परम्पराओं की समाप्ति हो गई। मध्यकालीन यूरोप में चर्च सबसे अधिक प्रभावपूर्ण संस्था थी। यूरोप की जनता चर्च के अधिष्ठाता पोप में अपार श्रद्धा रखते हुए उसके आदेशों का पालन इस प्रकार करती थी मानों वे आदेश ईश्वरीय आदेश हों। इस प्रकार पोप का प्रभाव सम्पूर्ण यूरोप में शासकों और सम्राटों से अधिक फैला हुआ था। पादरी वर्ग जनता से उसके आदेशों का पालन कराता था। परन्तु पुनर्जागरण काल में नवीन विचारों के प्रसार ने जन-साधारण में आलोचना की शक्ति उत्पन्न की और वे धार्मिक आदेशों का अन्धानुकरण नहीं करके उनकी परीक्षा करने लगे। इसमें पोप का प्रभाव समाप्त होने लगा जनता का यही कार्य धर्म सुधार के नाम से प्रसिद्ध है।
इसके प्रभाव से धर्म में व्यापक और मौलिक सुधार किये जाने लगे तथा सभी देशों में राष्ट्रीय चर्च की स्थापना की जाने लगी। फिशर ने इस सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है कि “यूरोप में ऐसे समय नवीन ज्ञान ने राष्ट्रीयता के विचारों और स्वतन्त्रता की भावना से युक्त शितिज पर प्रोटेस्टेण्ट धर्म सुधार की ज्योति उत्पन्न की।" हेज के अनुसार "पुनर्जागरण काल में चर्च की बुराइयाँ यूरोपीय जनता के समक्ष प्रकट होने लगी और उनका धर्म सुधार के प्रति आकर्षण बढने लगा । " प्रसिद्ध इतिहासकार स्टब के अनुसार “इटली में घटित पुनर्जागरण ने सभी के सम्मुख विद्वानों की समिति को लाने का श्रेय प्राप्त किया। उस समिति ने धर्म सुधार की भावना को ग्रहण करने के लिये यूरोपीय जनता में योग्यता करने का प्रयास किया।”
इस प्रकार कहा जा सकता है कि पुनर्जागरण काल ने यूरोपीय जनता के मस्तिष्क से मध्य युग के राज्य, समाज, प्रकृति, कला और दर्शन का प्रभाव समाप्त करके उन्हें नवीन ज्ञान, विज्ञान, कला और दर्शन से परिचित कराया। इसीलिये पुनर्जागरण काल को मध्य युग के अन्त और नवयुग के आरम्भ का सन्धि काल भी स्वीकार किया जाता है।
मध्यकालीन यूरोप में धर्म की प्रधानता थी, जिसके कारण वहाँ अंधविश्वास, रूढ़िवादिता एवं कूपमण्डूकता की प्रधानता थी। चर्च के सिद्धान्तों के प्रति लोगों की दृढ़ आस्था थी, जिसकी अवहेलना करना वे घोर पाप समझते थे। चर्च की शक्ति बड़ी विशाल और संगठित थी तथा राज्य की तुलना में उसका स्थान ऊँचा था।
चर्च की इस महत्ता पर सर्वप्रथम पुनर्जागरण ने आघात पहुँचाया। पुनर्जागरण ने तर्क और बुद्धि-प्रयोग पर बल दिया, जिसके कारण धार्मिक विश्वासों की जड़ें हिलने लगीं। इस परिवर्तित स्थिति ने लोगों को चर्च के नियंत्रण से मुक्त कर स्वतंत्रतापूर्वक सोचने के लिए प्रेरित किया। फलस्वरूप चर्च के सिद्धान्तों पर आक्षेप होने लगे। विचार-स्वातंत्र्य और नवजागरण के कारण अब विचारशील लोगों के लिये चर्च के सिद्धान्तों को चुपचाप स्वीकार करना असंभव हो गया। वास्तव में लोगों की यह प्रवृत्ति आधुनिक युग के आगमन की सूचक थी। मार्टिन लूथर द्वारा जर्मन भाषा में बाइबिल का अनुवाद धर्म-सुधार आन्दोलन के लिये महत्वपूर्ण प्रेरक तत्व सिद्ध हुआ।
भौगोलिक खोजें
कुस्तुन्तुनिया के मार्ग के अवरूद्ध होने से यूरोप में भौगोलिक खोजों का कार्य अनिवार्य हो गया। इस कार्य का नेतृत्व स्पेन और पुर्तगाल ने किया, जिनके संरक्षण में अनेक साहसी नाविकों व व्यक्तियों ने नवीन स्थानों को ढूंढ निकाला। सन् 1492 ई. में स्पेन के संरक्षण में बहामा द्वीप को ढूंढ निकाला गया। सन् 1498 ई. में पुर्तगाल के वास्कोडिगामा ने भारतीय समुद्र तट को ढूँढ़ निकालने में सफलता प्राप्त की।
स्पेन और पुर्तगाल की इन सफलताओं ने दूसरे यूरोपीय देशों को भी खोज के कार्य के लिए प्रेरित किया। फलस्वरूप अब व्यापक रूप से नवीन मार्गों को ढूंढने का कार्य होने लगा।
सन् 1497 ई. में जॉन कैवट नामक वेनिस के यात्री ने केप ब्रिटेन द्वीप का पता लगाया। सन् 1499 ई. में पिंजो ने ब्राजील को ढूँढ निकाला। पश्चिमी गोलार्ध का नामकरण भी इसी समय हुआ और एक व्यापारी अमेरिगो के नाम पर उसका नाम अमेरिका पड़ा। इन खोजों के कारण विश्व का आकार विस्तृत हो गया, जिसने यूरोप के लिए अपार धन राशि प्राप्त करने का मार्ग प्रस्तुत कर दिया। अब यूरोपीय देशों के व्यापार और कला-कौशल में पर्याप्त रूप से वृद्धि होने लगी। साथ ही, धर्म-प्रचार और प्रसार के लिये भी नवीन क्षेत्र उपलब्ध हुए।
औद्योगिक क्रान्ति
यूरोप में भौगोलिक खोजों के कारण लोगों के समक्ष व्यापक क्षेत्र प्रस्तुत हुए,
जहाँ वे धर्म-सुधार, साम्राज्य विस्तार और व्यापार का कार्य करने लगे। नवीन देशों के साथ सम्बन्ध स्थापित होने के कारण उनसे एम.ए. इतिहास
विद्या और विज्ञान का परस्पर आदान-प्रदान संभव हुआ। उनसे व्यापारिक सम्बन्धों की स्थापना के कारण यूरोप के आर्थिक विकास का मार्ग भी प्रशस्त होता गया।
नवीन मार्ग, क्षेत्र, साधन और व्यापारिक वस्तुओं की उपलब्धि ने आर्थिक क्षेत्र में एक क्रान्तिकारी हलचल उत्पन्न कर दी, जिसे हम औद्योगिक क्रान्ति की संज्ञा देते हैं।
इस कारण यूरोप की मध्यकालीन व्यापारिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन आ गया और उसका स्वरूप अत्यंत विकसित हो गया। अब व्यापार के संचालन में बड़ी पूँजी की आवश्यकता पड़ने लगी। फलस्वरूप नवीन व्यापारिक कम्पनियों और मुद्रा नियंत्रण के लिये बैंकों की स्थापना हुई। व्यापारिक क्षेत्र में इस परिवर्तन ने कच्चे माल की आवश्यकता तथा निर्मित वस्तुओं की ब्रिकी के लिए बाजारों की आवश्यकताओं को जरूरी बना दिया। अतः यूरोपीय राज्यों में उक्त दोनों लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये आपसी संघर्ष होने लगे। अब यूरोपीय देश बाजारों की खोज के लिये उपनिवेशों की स्थापना को प्राथमिकता देने लगे।
वार्तालाप में शामिल हों