वियना समझौतों की आलोचना - Effects of the Vienna Conventions on the Various Powers

वियना समझौतों की आलोचना - Effects of the Vienna Conventions on the Various Powers


वियना कांग्रेस द्वारा संपन्न प्रादेशिक पुनर्गठन स्थायी सिद्ध नहीं हो सका। सम्मेलन में विजयी देशों के राजनयिकों ने यूरोपीय जनता की भावना की अवहेलना की। उन्होंने यूरोप का पुनर्गठन इस रूप में किया मानों वह उनकी व्यक्तिगत संपत्ति हो। उन्होंने उन सभी तत्वों की अनदेखी की जो समझौतों को स्थायी बना सकते थे। इसीलिए 1815 ई0 के पश्चात् यूरोप के कई देशों में क्रांतियाँ हुई, जिन्होंने वियना सम्मेलन द्वारा की गई गलतियों को छू किया।


वस्तुतः वियना सममेलन के समझौते किसी उदात्त सिद्धांत के परिणाम नहीं थे।

सम्मेलन में भाग ले रहे विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने यूरोप की जनता को प्रभावित करने के लिए 'सामाजिक व्यवस्था के पुनर्निर्माण', 'यूरोप की राजनैतिक व्यवस्था का पुनरुत्थान', 'न्यायसंगत शक्ति विभाजन पर आधारित स्थायी शांति जैसे मुहावरों का प्रयोग किया, लेकिन यूरोप की जनता को धोखा नहीं दिया जा सकता था। यूरोप की जनता ने विजयी देशों द्वारा विजित प्रदेशों की छीना-झपटी को स्पष्ट रूप से देखा। उसने देखा कि यूरोप के राजा, जो जनता के अधिकारों का सम्मान न करने के लिए नेपोलियन की निंदा करते थे, वियना में उसी तरह का व्यवहार कर रहे थे।


वियना में वैधता की बात फ्रांसीसी राजनयिक टेलीरैण्ड ने उठाई।

इसके पीछे उसका उद्देश्य फ्रांस को प्रादेशिक लूटमार से बचाना था। वैधता की व्याख्या इस रूप में की गई कि किसी देश का शासनाध्यक्ष वहीं व्यक्ति बन सकता है जिसने दीर्घ अवधि तक उस पद का उपभोग किया हो और उस रूप में उसे यूरोपीय देशों ने मान्यता भी प्रदान किया हो। इस बात पर बल दिया गया कि क्रांति के पूर्व की स्थिति पुनः बहाल की जाए और सभी वैध शासकों को पुनर्स्थापित किया जाए। इसे इस तरह कहा जा सकता है कि जिस प्रकार दीर्घ अवधि तक किसी वस्तु पर अधिकार से वह वस्तु किसी की संपत्ति हो जाती है, शासन का अधिकार भी किसी को उसी तरह प्राप्त होता है। यह निर्णय लिया गया कि यूरोप का प्रादेशिक समायोजन किया जाए और नेपोलियन के पूर्व यूरोपीय देशों की जो सीमाएँ थीं, उन्हें पुनर्निधारित किया जाए।


वैधता का सिद्धांत प्रतिक्रियावादी शासकों के हित में था। इसीलिए इस सिद्धांत को उन शासकों का भरपूर समर्थन मिला। इस सिद्धांत का अनुसरण करते हुए बूब राजवंश को फ्रांस, स्पेन तथा नेपुल्स में तथा ऑरेंज राजवंश को हॉलैण्ड में पुनः स्थापित किया गया। इसी सिद्धांत के अनुसार, पोप को मध्य इटली में अवस्थित उसके सारे प्रदेश वापस कर दिए गए। इसी प्रकार जर्मन राजाओं को उनके सभी प्रदेश वापस कर दिए गए जिन्हें नेपोलियन ने राइन महासंघ में सम्मिलित कर लिया था। स्विस महासंघ को भी पुनर्स्थापित किया गया और विजयी देशों द्वारा स्विट्जरलैण्ड की तटस्थता सुनिश्चित की गई।


किंतु वैधता का यही सिद्धांत वियना कांग्रेस में कई बार जान बूझकर नजरअंदाज कर दिया गया।

ऐसा प्रायः तब हुआ जब विजयी देशों को क्षतिपूर्ति देने की आवश्यकता महसूस की गई। उदाहरणस्वरूप, नॉर्वे को डेनमार्क से अलग कर दिया गया और उसे स्वीडेन को क्षतिपूर्ति स्वरूप इसलिए दे दिया गया, क्योंकि स्वीडेन ने रूस को फिनलैण्ड तथा प्रशा को स्वीडिश पोमेरेनिया दिया था। इस प्रकार डेनमार्क को नेपोलियन का साथ देने के लिए दंडित किया गया और स्वीडेन को मित्रराष्ट्रों का समर्थन करने के लिए पुरस्कृत किया गया। इसी प्रकार, वैधता का सिद्धांत वेनिस एवं जेनोआ जैसे गणराज्यों पर लागू नहीं किया गया। इन्हें इसलिए समाप्त कर दिया गया, क्योंकि फ्रांस के विरुद्ध उत्तरी इटली की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ऐसा करना आवश्यक था।


फ्रांस की क्रांति के परिणामस्वरूप संपूर्ण यूरोप में राष्ट्रीयता की भावना का खूब प्रचारप्रसार हुआ था। किंतु वियना में एकत्रित विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने सिर्फ शक्ति संतुलन एवं वंशगत हितों को ध्यान में रखा और यूरोप की जनता की भावना की उन्होंने पूरी तरह उपेक्षा की। यही कारण था कि वियना सम्मेलन में जर्मन परिसंघ के विभिन्न राजाओं को सर्वशक्तिमान बना दिया गया और इटली में ऑस्ट्रिया का प्रभुत्व स्थापित किया गया। इसी प्रकार बेल्जियम को हॉलैण्ड तथा नॉर्वे को स्वीडेन के साथ संयुक्त कर राष्ट्रीय आकांक्षाओं की पूरी तरह अवहेलना की गई।


वस्तुतः वियना कांग्रेस के विरुद्ध सबसे मुख्य आरोप यही लगाया जाता है कि इसके द्वारा संपन्न यूरोप के प्रादेशिक पुनर्गठन में जर्मनी एवं इटली को विभाजित रखकर,

पोलैंड को विघटित करके, बेल्जियम एवं हॉलैण्ड को संयुक्त करके तथा नॉर्वे को स्वीडेन के साथ संलग्न करके राष्ट्रवाद की पूरी तरह उपेक्षा की गई। भविष्य में इटली एवं जर्मनी का एकीकरण हुआ। एक सदी के बाद पोलैंड को भी एकीकृत किया गया। इसी प्रकार, 1830 में बेल्जियम को हॉलैण्ड तथा 1905 में नॉर्वे को स्वीडेन से पृथक किया गया। इस प्रकार यह कहना गलत नहीं है कि एक तरह से 1815 ई0 के बाद का यूरोपीय इतिहास वियना कांग्रेस द्वारा संपन्न कार्यों को व्यर्थ करने का इतिहास रहा है।


फिर भी, वियना कांग्रेस के विरुद्ध इन सारी आलोचनाओं के बावजूद यह निर्विवाद है कि इस सम्मेलन में संपन्न समझौतों में भविष्य में घटित होनेवाली कई महत्वपूर्ण घटनाओं के बीज निहित थे।

यद्यपि सम्मेलन के अधिकांश कार्य प्रतिक्रियावादी थे, इसके द्वारा संपन्न प्रादेशिक पुनर्गठनों के दूरगामी परिणाम निकले। उदाहरणस्वरूप, जेनोआ के मिलने से सर्डीनिया का राज्य अधिक सुदृढ़ हो गया। इससे सेवाय राजवंश को इटली के द्वीप समूहों के बीच एकता स्थापित करने की प्रेरणा मिली। इस प्रकार, वियना कांग्रेस द्वारा अनजाने में इटली के एकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। इसी प्रकार, प्रशा द्वारा राइन के किनारे अवस्थित प्रदेशों का अधिग्रहण जर्मनी के प्रशाईकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। इसके पश्चात् ऑस्ट्रिया के स्थान पर प्रशा ने फ्रांस के विरुद्ध जर्मनी का नेतृत्व किया। इसी के बाद जर्मनी से ऑस्ट्रिया को निष्कासित कर दिया गया और प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण हुआ। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इटली एवं जर्मनी के एकीकरण के बीज वियना सम्मेलन के कार्यों में निहित थे।


निःसंदेह, वियना समझौतों के सुरक्षा की जिम्मेवारी सामूहिक रूप से सभी विजयी देशों की थी, किंतु यूरोप की शांति एवं सुरक्षा तब तक सुनिश्चित नहीं की जा सकती थी जब तक किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना नहीं हो जाती। इस संबंध में वियना सम्मेलन की समाप्ति के पश्चात् यूरोपीय देशों के समक्ष दो योजनाएँ रखी गई। इनमें पहली योजना रूस के जार अलेक्जेण्डर द्वारा समर्थित पवित्र संधि थी। यह संधि ईसाई धर्म को लोक जीवन में लाने का एक प्रयास था, किंतु जार के अतिरिक्त किसी अन्य देश ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। दूसरी योजना चतुर्राष्ट्र संधि पर आधारित यूरोपीय कन्सर्ट की थी। यह संधि नवबंर 1815 में रूस, प्रशा, ऑस्ट्रिया एवं इंग्लैंड के बीच संपन्न हुई। इसके द्वारा यूरोपीय कन्सर्ट की स्थापना की गई और यह तय किया गया कि मित्रराष्ट्र यूरोप की शांति व्यवस्था एवं आपसी हितों पर विचार-विमर्श करने के लिए समय-समय पर सम्मेलनों का आयोजन करते रहेंगे।


वियना में एकत्रित राजनयिकों का उद्देश्य यूरोप में शांति एवं स्थायित्व को सुनिश्चित करना था। पिछले पच्चीस वर्षों से यूरोप की जनता युद्धों एवं क्रांतियों से त्रस्त थी, लेकिन 1815 के वियना सम्मेलन के बाद लगभग आधी सदी तक यूरोप में कोई बड़ा युद्ध नहीं हुआ और शांति बनी रही। इस दृष्टि से वियना सम्मेलन को एक सफल सम्मेलन माना जाना असंगत नहीं है। इसके साथ ही, वियना कांग्रेस ने यूरोप में एक उत्कृष्ट शक्ति-संतुलन की स्थापना की। तभी से शक्ति-संतुलन का यह सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय संबंधों का मूल आधार रहा है। पिछले दो दशकों तक संपूर्ण यूरोप में फ्रांस के रूप में एक शक्ति का प्रभुत्व बना रहा था। वियना कांग्रेस ने यूरोप का नियंत्रण बड़ी शक्तियों के हाथों में देकर यूरोपीय कन्सर्ट की स्थापना की जो कई अर्थों में राष्ट्रसंघका पूर्वगामी साबित हुआ। इसलिए कहा जा सकता है कि वियना कांग्रेस द्वारा निर्मित नींव पर ही उन्नीसवीं सदी के यूरोप का निर्माण हुआ।