अनुबंध काल की समाप्ति और इंडो-सूरीनामी डायस्पोरा के रूप में उद्भव - The end of the contract period and the emergence of the Indo-Surinamese diaspora

अनुबंध काल की समाप्ति और इंडो-सूरीनामी डायस्पोरा के रूप में उद्भव - The end of the contract period and the emergence of the Indo-Surinamese diaspora


1885 ई. में अनुबंध की समय सीमा (5 वर्ष) समाप्ति पर वापस अपने वतन लौटने वाले मजबू को डच सरकार ने उसी उपनिवेश में बसने के लिए प्रोत्साहन देना आरंभ किया। लौटकर नहीं जाने वाले अनुबंधित श्रमिकों को राज्य संचालित बगानों में बिना शुल्क रहने की व्यवस्था तथा 100 डच गिल्डर (डच मुद्रा) का बोनस देने की व्यवस्था की गई।


इस अवसर का लाभ उठाकर करीब 23,000 'हिंदुस्तानी' (सूरीनाम में रहने वाले भारतीयों को पुकारे जाने वाला नाम) ने सूरीनाम में सदा के लिए बसने का मन बना लिया।

कुछ समय के बाद भारतीयों ने कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के अलावा आर्थिक उपार्जन के अन्य साधन खोजना प्रारंभ किया। कुछ लोगों ने पैसे जमा करके जमीन खरीदी और उस पर चावल का उत्पादन बड़े पैमाने पर प्रारंभ किया। यद्यपि चावल का उत्पादन ये अनुबंधित भारतीय लोग अपने अनुबंध के काल से ही कर रहे थे। चावल का उत्पादन मुख्यत: सूरीनाम के पश्चिमी जिले निकेरी में किया जाता रहा था। यहाँ आज भी कई हिंदुस्तानी सूरीनामी के पास चावल उत्पादन के बड़े-बड़े फार्म हैं।


20वीं सदी के प्रारंभ से सूरीनामी हिंदुस्तानी अपने रोजगार के लिए व्यापार और यातायात के क्षेत्रों में कदम बढ़ाने लगे। इसी बीच क्रिश्चन मिशनरियों द्वारा शिक्षा के प्रचार-प्रसार के कारण भारतीय भी इनके संपर्क में आए। इस पश्चिमी शिक्षा के द्वारा वे अपने कौशल में वृद्धि कर समाज में उच्च स्थान को पा सकते थे, इस तरह की प्रेरणा सूरीनामी भारतीयों को हुई। वे अब अपने बच्चों को विद्यालय भेजने लगे और उच्च शिक्षा प्राप्त कर वे देश की नागरिक सेवा में आ सकते थे।

डच उपनिवेशवादी शासकों ने ऐसी कानूनी व्यवस्था की थी कि डच कॉलोनी में रहने वाले और यहाँ जन्म लेने वाले स्वभावत: डच नागरिक होंगे। इसके बावजूद दो विश्व युद्धों तक कुछ ही दर्जन शिक्षक, पुलिस सेवा और सरकार के निचले स्तर पर भारतीय मूल के लोग आ पाए। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भारतीय मूल के लोग डच विश्वविद्यालयों से बड़ी संख्या में पढ़ लिखकर अपने घर पहुँचने लगे, जिनमें शामिल थे— चिकित्सक, कानूनी कार्यवाले, न्यायालय के न्यायाधीश, प्रशासन, बैंक, राजनयिक सेवा और राजनीति क्षेत्र आदि।