भारत विभाजन की अंतहीन और अनवरत अंतहीन और अनवरत त्रासदी - The Endless and Endless Endless and Endless Tragedy of the Partition of India
भारत विभाजन की अंतहीन और अनवरत अंतहीन और अनवरत त्रासदी - The Endless and Endless Endless and Endless Tragedy of the Partition of India
भारत विभाजन की त्रासदी विश्व इतिहास की गंभीरतम घटनाओं में से एक रही है। इस विभाजन से किसे क्या मिला? इस मुद्दे पर विचार करते हैं तो इतिहास की तरफ देखकर भारी पीड़ा से मन भर जाता है प्रसिद्ध पत्रकार और पूर्व राज्यसभा सांसद कुलदीप नैयर जो स्वयं सियालकोट से विस्थापित होकर भारत आए थे; ने आज से लगभग तीन साल पहले के लिखे अपने एक लेख 'The tragedy of Partition' में लिखा है, जब उन्होंने आज़ादी मिलने (यानी विभाजन) के 32 दिन बाद अपने घर से चलकर सीमा को पार किया तो हालाँकि हिंदू-मुसलमानों के झगड़े और लूटपाट तो बंद हो गए थे,
लेकिन मैंने देखा कि अपने छोटे-मोटे सामान को अपने सिर पर लादे इधर-उधर होते अनेक स्त्री-पुरुषों के चेहरों पर अभी भी दर्द की लकीरें थीं। उनके चेहरे तनाव से ग्रस्त थे। उनके पीछे-पीछे उनके डर से सहमे हुए बच्चे चले जा रहे थे! आगे इस लेख में उन्होंने लिखा है, "विभाजन की त्रासदी इतनी गहरी है कि इसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता. (x-x-x) यह ग्रीक ट्रेजेडी की तरह थी" ( वही)। इस त्रासदी का सबसे भयावह पक्ष यह था, "हिंदू और मुसलमान दोनों ईश्वर में आस्था के नाम पर, ईश्वर और अल्लाह का नाम- 'हर-हर महादेव' तथा 'या अली' लेते हुए एक-दूसरे के तलवार और बरछी धौंप रहे थे " (वही)। इस लेख में उन्होंने यह भी लिखा कि विभाजन में हुई हिंसा और क्रूरता के सबसे अधिक शिकार दोनों ही तरफ़ की खियाँ और बच्चे हुए (वही) ।
भारत-विभाजन एक अंतहीन और अनवरत त्रासदी के बतौर सामने आता है। इतिहासकार सलिल मिश्र ने 12 अगस्त 2012 ई. के Deccan Herald ( Sunday Herald) में प्रकाशित अपने *The tregedy of Partition' शीर्षक लेख में लिखा है, भारत का विभाजन एक अंतहीन और निरंतर जारी रहने वाली त्रासदी है। यह दरअसल एक प्रक्रिया है, जो 1947 ई. में तो केवल शुरू हुई थी; वस्तुतः यह आज भी जारी है- "विभाजन कोई अचानक घटी घटना नहीं थी। इसके पीछे और आगे घटनाओं की एक लंबी शृंखला है। इसके नतीजे आज भी हम भुगत रहे हैं।" हिंदी कथाकार स्वयं प्रकाश की एक कहानी कुछ समय पहले आई थी- 'पार्टीशन"। इस कहानी में अंत में एक वाक्य आता है, जिसका तात्पर्य भी लगभग यही है- “आप क्या खाक हिस्ट्री पढ़ाते हैं?
कह रहे हैं पार्टीशन हुआ था! हुआ था नहीं हो रहा है, जारी है..." भारतीय समाज की अंत: संरचना दरअसल कुछ ऐसी है कि वहाँ किसी समुदाय को किसी से अलग नहीं किया जा सकता। यह एक साँझी संस्कृति वाला समाज है। धर्म के आधार पर किया गया कोई भी विभाजन यहाँ अव्यावहारिक और ट्रेजिक ही होगा। प्रसिद्ध पाकिस्तानी इतिहासकार आयेशा जलाल ने लिखा है, "विभाजन बीसवीं शताब्दी के दक्षिण एशिया की सबसे केंद्रीय ऐतिहासिक घटना है। यह एक ऐसा वाकया हुआ है, जिसकी न शुरुआत का पता चलता है, न अंत का । उत्तर- औपनिवेशिक दक्षिण एशिया जब भी अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य पर विचार करेगा, विभाजन का उस पर ज़रूर असर दिखेगा।"
विभाजन एक निरंतर त्रासदी की तरह लगातार जारी रहा है। विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान छोटे-बड़े युद्धों में तीन बार आमने-सामने भिड़ चुके हैं। इसी क्रम में 1971 ई. में पाकिस्तान का एक बार फिर विभाजन हुआ और बांग्लादेश बना। बांग्लादेश के निर्माण में भारत की केंद्रीय भूमिका थी। विभाजन के बाद इन दोनों तीनों देशों के बीच तनाव की स्थितियाँ लगातार बनी हुई हैं। पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर एक अंतहीन समस्या की तरह बना हुआ हैं। इसे लेकर कई युद्ध तो हो ही चुके हैं, इसके अलावा पिछले तीस साल से पाकिस्तान सेना तथा खुफिया एजेंसी आई. एस. आई. द्वारा भारत के विरुद्ध प्रॉक्सी-वार निरंतर चालू किया हुआ है।
विभाजन की त्रासदी अभी जारी है। आज भी स्थितियाँ बदली नहीं हैं, बल्कि आज तो स्थितियाँ और ज्यादा बदतर हुई हैं। आज की तारीख में दोनों देशों के बीच बातचीत ही बंद है। विलियम डेलरिम्पल ने अपने उक्त लेख के अंत में लिखा है, “आज की स्थितियाँ भी ज्यादा उत्साहवर्द्धक नहीं हैं। दिल्ली में इस समय एक ऐसी कट्टर दक्षिणपन्थी सरकार है जिसने इस्लामाबाद से बातचीत बरतरफ़ कर दी है। दोनों देश इस समय धार्मिक अतिवाद से पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा गिरफ्त में हैं। एक तरह से 1947 ई. अभी भी जारी है। वह ख़त्म नहीं हुआ है।"
भारत-विभाजन की त्रासदी का सबसे दुःखद पक्ष है, इसमें हुई हिंसा का स्वरूप और चरित्र ।
यह हिंसा पूर्ववर्ती व आम हिंसा से अलग और विशिष्ट प्रकार की थी। विभाजन की इस हिंसा की निम्नलिखित प्रवृत्तियाँ रहीं, जो इसे अन्य प्रकार की हिंसाओं से अलग करती हैं-
1. यह हिंसा सामूहिक या समूहबद्ध थी। झुंड के झुंड एक-दूसरे पर टूट पड़ते थे और जो भी घरेलू क़िस्म के हथियार हाथ लगा, उसी से 'दुश्मन' पर पिल पड़ते थे; जैसे तलवार, फरसा, कुल्हाड़ी, लाठी, बरछी इत्यादि ।
2. इस हिंसा में शामिल लोग पेशेवराना हत्यारे नहीं थे, अपितु साधारण लोग थे, ये अधिकांशतः वे लोग थे, जो अमूमन शांतिप्रिय होते हैं, लेकिन विभाजन के दंगों में ये अचानक वहशी हो उठे।
3. इतिहासकार सलिल मिश्र ने इस हिंसा के एक विशिष्ट चरित्र की ओर इंगित किया है। यह विशिष्ट चरित्र है, विकल्पहीनता । सलिल मिश्र ने अपने लेख 'The tregedy of Partition' में लिखा है, “उन्होंने किसी आवेश या घृणा के चलते सामने वाले को नहीं मारा, बल्कि इस अंदेशे में मारा कि यदि मैंने इसे नहीं मारा तो यह मुझे मार डालेगा। उन्होंने मारे जाने, ख़ुद मरने के स्थान पर सामने वाले को मारना ज्यादा बेहतर समझा।”
4. इस हिंसा का स्वरूप सांप्रदायिक था। इसमें एक तरफ़ हिंदू और सिख थे, तो दूसरी तरफ़ मुसलमान थे, विशेषतः सीमावर्ती इलाक़ों में हिंसा ज्यादा हुई।
यह हिंसा एक-दूसरे को नेस्तनाबूद करने के मकसद से की गई थी। यह हिंसा सामने वाले पर केवल हथियारों से हमले के रूप में नहीं थी बल्कि घर, दुकान, या जो कुछ सामने दिखे, उसे आग के हवाले कर देने, जलाकर राख कर देने के रूप में भी थी। यह जाति-संहार (genocide) के रूप में सामने आई। The New Yorker के 29 जून 2015 के अंक में प्रकाशित अपने 'The Bloody Legacy of Indian Partition' शीर्षक लेख में William Dalrymple ने लिखा है, "यह परस्पर जाति-संहार नितांत अप्रत्याशित था, क्योंकि ऐसा पहले कभी हुआ नहीं था।" आगे उन्होंने यह भी लिखा कि इस हिंसा के कई रूप थे। इसने सारी हदें पार कर दी- "यह हत्याकांड बहुत ही प्रचंड था। इसमें सामूहिक हत्याएँ आगजनी, बलपूर्वक धर्म- परिवर्तन, सामूहिक अपहरण और बर्बर यौनिक हिंसा यह सब कुछ हुआ"
5. विलियम डेलरिम्पल ने अपने इसी लेख में निसिद हजारी द्वारा अपनी पुस्तक 'Midnight's Furies' में दर्ज इस तथ्य का उल्लेख किया है कि विभाजन की हिंसा की बर्बरता नाज़ियों के डेथ कैम्पों से भी बदतर थी। निसिद हजारी ने लिखा है कि गर्भवती महिलाओं के स्तन काट दिए गए और उनका पेट चीर कर गर्भस्थ शिशु को निकालकर टुकड़े-टुकड़े कर दिया गया तथा शिशुओं को सलाखों पर शब्दशः भूना गया। (सन् 2002 के गुजरात दंगों में एक बार फिर ऐसे दृश्य दिखाई दिए थे)।
हिंसा का यह रूप अन्य हिंसाओं से भिन्न है। यह हिंसा यहीं देखने को मिली। जब यह बवाल थम गया और चीजें पटरी पर आई तो लोगों को आश्चर्य हुआ कि उन्होंने कैसे इतनी बर्बरता कर दी ! भारतीय उपमहाद्वीप के लोग सामान्यतः शांतिप्रिय हैं, किंतु धर्म ने जैसे उन्हें हिंसक पागल बना दिया! विद्वानों का मत है कि दुनिया में कहीं भी अन्यत्र ऐसी विभाजन की हिंसा नहीं हुई।
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