भक्ति आंदोलन की असफलता - Failure of Bhakti Movement

भक्ति आंदोलन की असफलता - Failure of Bhakti Movement


वर्तमान में सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि मध्यकाल में पूरे देश में यह आंदोलन लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। समाज की जड़ मान्यताओं, उपासना पद्धति आदि पर उन्होंने प्रश्न-चिह्न लगाए। समाज के उपेक्षित और पीड़ित लोगों को एक सम्मान का जीवन प्रदान करने का मार्ग भी दिखाया फिर आखिर मध्यकाल के आंदोलन कोई मूलभूत परिवर्तन करने में असमर्थ क्यों रहे? ज्ञान - विज्ञान और तकनीकी को नए रूप में ढालने में यह क्यों असमर्थ रहे? यूरोप जो भारत से कई दृष्टियों में पिछड़ा हुआ था वह यह काम करने में कैसे समर्थ हुआ, जबकि भारत औद्योगीकरण करने में क्यों असमर्थ रहा? इन कारणों पर बिना विचार किए हम अपने नवजागरण पर भी सही ढंग से विचार नहीं कर सकते हैं।


आज इन प्रश्नों का सीधा उत्तर देना संभव नहीं है, किंतु इसे भारत की जटिल सामाजिक- राजनैतिक स्थिति में खोजा जा सकता है- मध्यकाल के इतिहासकारों ने इसके उत्तर देने के प्रयास किए हैं, किंतु इस प्रश्न पर बहस अब भी जारी है। प्रो. इरफान हबीब ने जो वर्षों से इस विषय पर निरंतर लिख रहे हैं, निम्न प्रमुख कारण उल्लिखित किए हैं।


1. चिंतन और साहित्य की भाषा फारसी थी, जिसका साधारण जनता से कोई रिश्ता नहीं था, यह विशिष्ट लोगों की भाषा थी, जनता और भद्रलोक की भाषाओं में इतनी भिन्नता है

कि वहाँ नए ज्ञान-विज्ञान का प्रदान मुश्किल है। इससे पूर्व संस्कृत भी जनता की भाषा नहीं थी।


2. मध्यकाल में भारत तथा इस्लामी दुनिया में दार्शनिक और स्वतंत्र चिंतकों को धर्मशास्त्रियों के मुकाबले कोई महत्व नहीं दिया जाता था। धर्मशास्त्रियों ने सदैव दर्शन और विज्ञान का जमकर विरोध किया। इन दोनों को धर्म विरोधी बताया जाता रहा। इस संदर्भ में एक उदाहरण इसे स्पष्ट करने के लिए काफी होगा सूफी संत शेख निजामुद्दीन का एक वार्तालाप एक समकालीन इतिहासकार ने लिखा है- एक बार खलीफा एक दार्शनिक के प्रभाव में आ गए। दार्शनिक खलीफा को ब्रहमांड की गति के नए नियम समझा रहा था, यह बात सूफी शहाबुद्दीन सुहरावर्दी को मालूम हुई तो उन्होंने कहा कि है दार्शनिक

तुम क्यों झूठी बातें बता रहे हो, ये धरती और सितारों को तो ईश्वर के देवदूत चलाते हैं, प्रकृति और कोई अन्य शक्ति नहीं, दार्शनिक हँसकर चुप हो गए। इसके बाद खलीफा (सम्राट) ने उन विचारों को तिलांजलि दे दी और फिर से इस्लाम की शिक्षाओं पर पूर्ण विश्वास करने लगे।"


3. ज्ञान विज्ञान और चिकित्सा में शास्त्र का प्रयोग केवल शासक वर्ग तक ही सीमित रहा। ज्योतिष शास्त्र का प्रयोग मक्का की शिक्षा और नमाज का समय जानने के लिए ही होता था।


4. कट्टर धार्मिक लोग जिनका शासक वर्ग पर बहुत प्रभाव रहा है।

यह विज्ञान, तर्कशास्त्र और दर्शन को धर्मविरोधी मानते थे। हर नया विचार यदि धर्म शास्त्र की कसौटी पर कसा जाएगा तो कभी नए विचार को पनपने का अवसर नहीं मिलेगा। भारत में ऐसा ही हुआ यहाँ के शासक वर्ग ने सदैव धर्मशास्त्र अथवा दूसरी व्याख्याओं को ही सदैव महत्व दिया। इससे विज्ञान तकनीक और तर्कशास्त्र का एक सीमा से अधिक विकास संभव नहीं हुआ। यही नहीं भारत के पुराने विज्ञान गणित और तर्कशास्त्र पर भी मध्यकाल में कोई विशेष काम नहीं हुआ। अलबरूनी ने भारतीय विज्ञान पर भी 11वीं शताब्दी में एक पुस्तक अवश्य लिखी थी, परंतु बाद में इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ।


मध्यकाल के सुप्रसिद्ध विज्ञान और इतिहासकार अबुल फ़ज़ल ने भारत में वैज्ञानिक चेतना पर अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए लिखा था,

परंपरा की तेज हवा ने ज्ञान के दीपक को सदैव मद्धिम रखा। किसी संबंध में क्यों और कैसे का प्रश्न नहीं हो सकता। तर्क करना व्यर्थ है। जाँच पड़ताल का कार्य कुफ्र की सीमा में आ जाता है। बस जो हमें पिता, अध्यापक, रिश्तेदार, मित्र और पड़ोसियों से मिलता है। वही ईश्वर कृपा समझकर ग्रहण कर लिया जाता है। जो परंपरा के विचारों के विपरीत मत रखते हैं वे अच्छी दृष्टि से नहीं देखे जाते। हालाँकि कुछ विद्वानों ने अलग मार्ग पर चलने का प्रयास किया, लेकिन इस सत्य के पथ पर वे आधे मार्ग से अधिक कभी नहीं बढे।


सूफी संतों ने आरंभ में जड़ परंपराओं का काफी विरोध करके मार्ग प्रशस्त करने का प्रयास किया इनका भारत में एक समय बहुत व्यापक प्रभाव पड़ा।

कठमुल्लापन का उन्होंने विरोध किया लेकिन धीरे- धीरे धर्मशास्त्रियों और सूफियों के बीच विशेष मतांतर नहीं रहा दोनों विचारधाराओं के लोगों में एक मूक समझौता हो गया। अनेक ऐसे अनुवायी थे जो एक साथ कठमुल्ला धर्मशास्त्रियों को तथा सूफी संतों को समान रूप से प्रिय थे। प्रसिद्ध इतिहासकार बर्नी का नाम इस संदर्भ में विशेषरूप से उल्लेखनीय है। इसका एक परिणाम यह हुआ कि भारत में धर्म की परंपरागत परिभाषाओं से अलग विचारों की जो एक हवा चली थी, वह धीरे-धीरे मंद पड़ती गई। इसके पश्चात् सूफीवाद वैचारिक रहस्यवाद की टेड़ी मेड़ी पगडंडियों की ओर अग्रसर होता गया। इस प्रकार वैचारिक संघर्ष और विचारों की द्वंद्वात्मकता से उत्पन्न नई विचारधाराओं की संभावना नहीं पनप सकी।

इसके साथ ही “अहं ब्रह्मास्मि" की भावना भी सूफी संतों में पैदा होती गई। फलतः सामाजिक और धार्मिक उदारता पर आधारित सूफीवाद भी धार्मिक कठमुल्लापन और परंपरावाद में जड़ पकड़ गया। शेख अहमद सरहिंदी का उदाहरण इसी प्रवृति का द्योतक है। इसी प्रकार प्रचलित सूफी उदारता की धारणा के विपरीत शेख निजामुद्दीन जो अपने युग के अत्यंत प्रतिष्ठित सूफी संत थे वे भी गैर मुसलमानों का स्वर्ग में प्रवेश वर्जित मानते थे।


सूफियों की भाँति पंथवादियों का भी एक सीमा तक तर्कसंगत आधार नहीं हैं। पंथवादियोंने विवेकशीलता तथा तार्किकता को बहुत महत्व नहीं दिया।

एक सीमा के बाद विभिन्न पंथवादी पुराने विचारों का ही मंथन करते रहे। एकेश्वरवादियों ने तत्कालीन समाज की बुराइयों पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए समाज को चुनौती देने का जो साहसिक प्रयास किया वह आगे चलकर पंथवाद की परंपरा में धूमिल हो गया। इस प्रकार वैज्ञानिक चिंतन के माध्यम के नए समाज की संरचना के विचार को बहुत धक्का लगा। एकेश्वरवाद की पंथवाद में परिणति, समाज के अंतर्विरोधियों से एक सीमा के संघर्ष के स्थान पर समझौतापरस्ती के कारण हुई।


अकबर अत्यंत उदार सम्राट थे। उन्होंने सुलह-कुल का सिद्धांत प्रतिपादित किया, जिसका अर्थ था हर वर्ग के अच्छे मूल्यों की एकता, सहनशीलता तथा विभिन्नता की स्वीकृति,

लेकिन यहाँ भी सम्राट को ईश्वर के समकक्ष मानने की शर्त थी। उसे आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार करना अनिवार्य था सुलह कुल का प्रभाव समाज के विभिन्न धार्मिक समुदायों पर तो अवश्य पड़ा। विभिन्न समुदायों के प्रति सहानुभूति और सहिष्णुता की भावना को बढ़ाने के लिए भी यह दर्शन सार्थक था, लेकिन सुलह कुल भी किसी प्रकार की कोई नई वैज्ञानिक और तर्कसंगत विचारधारा प्रतिपादित नहीं कर सकता था। कारण सुलह कुल भी धार्मिक ढाँचे में यथास्थितिवाद का समर्थन करते हुए केवल धार्मिक और सामाजिक संबंधों में सुधारवाद एक ही रूप था।


अबुल फ़ज़ल ने तार्किकता और विज्ञान की बात की तो उसका भारी विरोध हुआ उदाहरण स्वरूप अबुल फ़ज़ल ने गणित, कृषि, विज्ञान, बागवानी, सर्वेक्षण,

ज्यामिति गणित, खगोल शास्त्र, वास्तुकला, चिकित्सा शास्त्र, इतिहास आदि को शिक्षा के पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने पर जोर दिया। भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान और दर्शन को भी शिक्षा में शामिल करना चाहिए, यह अबुल फ़ज़ल का मत था। इसके लिए उन्होंने संस्कृत ग्रंथों का व्यापक रूप से अनुवाद कराया। इसका भारी विरोध हुआ और शेख अहमद सरहिंदी के नेतृव में कट्टरपंथियों ने उपरोक्त शैक्षिक पाठ्यक्रम को मान्यता दी। यह तथ्य अत्यंत दिलचस्प है कि इस समय में यूरोप के लोगों का आवागमन काफी बड़ी संख्या में शुरू हो गया था। इसके बावजूद यूरोपीय यात्रियों से विचार विमर्श धर्म और दर्शन तक ही सीमित थे, विज्ञान और तकनीकी पर अधिक बातचीत नहीं होती थी।

अकबर के दरबार में कई यूरोपीय मिशनरी आए। अबुल फ़ज़ल ने सम्राट अकबर की ओर से इन मिशनरियों को पत्र लिख कर आमंत्रित किया तथा यह आमंत्रण भी केवल धार्मिक मामलों पर विचार विमर्श के लिए ही था।


मध्यकाल में एक प्रवृत्ति और भी थी कि साधारण लोगों को किसी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं था। बुद्धिजीवी विशिष्ट वर्ग में साधारण जन का प्रवेश निषिद्ध था। शाह वलीउल्लाह ने तो यहाँ तक कहा कि शरीअत के कानून तक साधारण लोगों की पहुँच नहीं होनी चाहिए।

इससे अनेक भ्रम उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि शिक्षा एक विशिष्ट वर्ग तक ही सदैव सीमित रही। इससे साधारण वर्ग से बुद्धिजीवी और चिंतक विचारक वर्ग में रूपांतरण नहीं के बराबर हुआ और समाज अनेक नए विचारों की संभावनाओं से वंचित रहा। इसके विपरीत यूरोप में मध्यकाल तथा आधुनिक काल में एक बड़ी संख्या में किसानों की शिक्षा हुई। इस नए शिक्षक वर्ग द्वारा की गई विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र की क्रांति ही सामाजिक संरचना के परिवर्तन का एक प्रमुख कारण बनी। भारत में ऐसा कोई वैज्ञानिक अथवा तकनीकी उन्नति का आधार नहीं बन पाया क्योंकि यहाँ सभी परिवर्तनकारी प्रवृत्तियाँ केवल चंद सामाजिक एवं धार्मिक सुधारों तक ही सीमित रही तथा शिक्षा विशिष्ट वर्ग की शोभा की वस्तु बन कर रह गई।