गहड़वाल वंश - Gahadwal dynasty

गहड़वाल वंश - Gahadwal dynasty


वंशावली


(1) यशोविग्रह (तिथि अज्ञात है),


(3) चंद्रदेव (10891104 ई.),


(5) गोविंदचंद्र ( 1114-1154 ई.),


(2) गोविंदचंद्र ( तिथि अज्ञात है),


(4) मदनलाल (1104-1114 ई.),


(6) विजयचंद्र (1155-1169 ई.),


(7) जयचंद्र (1170-1194 ई.),


(8) हरिश्चंद्र ( तिथि अज्ञात हैं)


प्रमुख शासक: गोविंदचंद्र और जयचंद्रा


गोविंदचंद्र


चंद्रदेव का उत्तराधिकारी उसका पुत्र मदनपाल था और मदनपाल का उत्तराधिकारी गोविंदचंद्र हुआ। गोविंदचंद्र अपने वंश का सर्वाधिक योग्य सम्राट माना जाता है। वह बड़ा प्रतापी, वीर और योग्य शासक था। उसने अपनी वीरता और योग्यता का परिचय अपने युवराज काल में ही दे दिया था,

जब उसने सन् 1109 में तुर्कों के आक्रमणों को विफल कर दिया था। उसने बंगाल के पाल राजा पर आक्रमण करके, मगध का पश्चिमी भाग विजय करके तथा मालवा का एक अंग भी जीतकर अपने राज्य में सम्मिलित कर लिये। उसने गुजरात, काश्मीर और दक्षिण के चोल राजाओं से मैत्री संबंध स्थापित कर अपनी शक्ति दृढ़ कर ली। इस प्रकार वह दूदर्शी कूटनीतिज्ञ भी था। विजयी नरेश होने के साथ-साथ गोविंदचंद्र बड़ा दानी और विद्यानुरागी विद्वान था। वह कवियों और लेखकों का उदार संरक्षक भी था। उसने अपनी बौद्ध रानी कुमारदेवी की प्रार्थना पर सारनाथ में एक बौद्ध विहार निर्मित करवाया था। उसके एक मंत्री लक्ष्मीधर ने कानून और राजनीति पर कृत्य कल्पतरू' नामक एक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। 


जयचंद्र


विजयचंद्र के बाद जयचंद्र कन्नौज का राजा बना। कतिपय विद्वानों की धारणा है कि उसने देवगिरि के यादव तथा गुजरात के सोलंकी नरेश को पराजित किया और तुर्कों को भी हराया। अपनी इन विजयों के उपलक्ष्य में उसने एक राजसूय यज्ञ किया। यद्यपि पूर्व में उसने अपना राज्य गया और वाराणसी तक फैला दिया था, परंतु पश्चिम में दिल्ली और अजमेर के अधिपति पृथ्वीराज चैहान से उसकी शत्रुता थी क्योंकि उसकी पुत्री संयोगिता को उसके स्वयंवर के समय पृथ्वीराज अपहरण कर ले गया था।

सन् 1193 में शहाबुद्दीन (मोहम्मद) गोरी ने पृथ्वीराज चैहान को तराइन के दूसरे युद्ध में परास्त कर, सन् 1194 में जयचंद्र पर आक्रमण कर दिया। कहा जाता है कि जयचंद्र ने गोरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था, किन्तु डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी ने अपनी रचना 'हिस्ट्री ऑफ कन्नौज' में संयोगिता का अपहरण और जयचंद्र द्वारा गोरी को आमंत्रित करना दोनों ही घटनाओं को मनगढ़ंत कथाएँ माना है। सन् 1194 में गोरी द्वारा जयचंद्र पराजित हुआ और मारा गया। इसके बाद गोरी ने कन्नौज और वाराणसी पर अधिकार कर उन्हें खूब लूटा। वह अपने साथ 1400 ऊँटों पर लूट का सोना, चाँदी तथा बहुमूल्य पदार्थों को लादकर गजनी लौट गया।