वैश्वीकरण और स्त्री - globalization and women

वैश्वीकरण और स्त्री - globalization and women


वैश्वीकरण की नीतियों के संदर्भ में हमें इस तथ्य को ध्यान में रखना होगा कि भारत एक विकासशील देश है और काफी समय तक औपनिवेशिक हुकूमत का हिस्सा रहा है। इसके साथ-साथ मानव विकास सूचकांक, जेंडर सूचकांक और ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भी भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश में जहाँ आज भी अर्द्धसामंती मूल्यों की जड़ें बहुत मजबूत हैं वहाँ पर इन नीतियों का क्या असर पड़ेगा यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है।


वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने भारत में कल्याणकारी राज्य की भूमिका को काफी सीमित किया है। इन नीतियों की वजह से ही शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी चीजों को भी बाजार के हवाले किया जा रहा है।

]इन सुविधाओं के निजीकरण ने हाशिएकृत तबकों तक इनकी पहुँच को मुश्किल बना दिया है।


प्रभा खेतान कहती हैं कि “जब मैं 'भारतीय स्त्रियों' जैसे संबोधन को प्रयुक्त करती हूँ तो उसमें लाखों स्त्रियाँ शामिल होते हुए भी कुछ स्त्रियाँ शामिल नहीं हो पाती, क्योंकि वे चुनाव करने में असमर्थ हैं और गरीबी की सीमा रेखा के नीचे हैं। भूमंडलीय समाज में मुक्ति की कामना केवल वही स्त्री करने में समर्थ है, जो गरीबी की सीमा रेखा के ऊपर है।


भारत में पिछले पच्चीस सालों में सरकार की नीतियों ने स्त्रियों के एक तबके को आधुनिक शिक्षा से लैस किया है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने स्त्रियों के एक छोटे से तबके के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों,

आईटी कंपनियों व काल सेंटर के दरवाजे खोले हैं। इस प्रक्रिया ने इस तबके की स्त्रियों के लिए बाजार के रास्ते सुगम किए हैं, लेकिन इसके साथ-साथ आज भी स्त्रियों की बड़ी आबादी पर श्रम के लैंगिक विभाजन का असर साफ-साफ दिखाई पड़ता है।


इसके साथ-साथ स्त्रियों की बड़ी आबादी आज भी अनौपचारिक क्षेत्र में ही काम करने के लिए विवश है। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली स्त्रियाँ लगभग 96 फीसदी के आस-पास हैं। इनके अधिकतर काम अकुशल श्रेणी में रखे जाते हैं। यहाँ पर काम के घंटे तय नहीं होते,

मजदूरी तय नहीं होती व इसके साथ किसी भी तरह के श्रम कानूनों का पालन नहीं किया जाता है। किसी भी समय निकाले जाने का भय और आय का कोई और जरिया न होने की वजह से वह कम वेतन पर भी काम करने के लिए मजबूर होती हैं। अर्थव्यवस्था का यह अनौपचारिकीकरण शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में देखा जा सकता है। निजीकरण की इस प्रक्रिया ने श्रम के अनौपचारिकरण को और अधिक बढ़ाया है। लगातार सार्वजनिक इकाइयों को बेचा जा रहा है या उनका विनिवेश किया जा रहा है। सार्वजनिक इकाइयों के बंद होने से भी रोजगार के अवसर कम हुए हैं। निजीकरण का सबसे नकारात्मक असर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर पड़ रहा है।

शिक्षा के निजीकरण ने निम्न मध्यम परिवारों की लड़कियों को उच्च शिक्षा से दूर कर दिया है। इसी तरह से खियों का एक बड़ा हिस्सा आज भी उचित स्वास्थ्य सुविधाओं से दूर है। गोपा जोशी लिखती हैं कि “महिला स्वास्थ्य में एक बहुत बड़ी बाधा अधिकतर स्त्रियों को पर्याप्त मात्रा में पोषक आहार नहीं मिलना भी है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान की तरफ से जारी रपट के अनुसार भारत भुखमरी के मामले में पाकिस्तान और श्रीलंका से भी आगे है। यहाँ पर तकरीबन 45 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं।


वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने उपभोक्तावाद को भी बहुत बढ़ावा दिया है। इस बाजार आधारित उपभोक्तावाद ने समाज के हर हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया है।

समाज का कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं रह गया है। इस उपभोक्तावाद ने स्त्रियों के खिलाफ होने वाली एक नई तरह की हिंसा को जन्म दिया है, जिसे हम भ्रूण हत्या के नाम से भी जानते हैं। तकनीकों के माध्यम से भ्रूण का लिंग परिक्षण कर महिला भ्रूण की हत्या कर दी जाती है। इस भ्रूण हत्या में वैश्वीकरण से उपजी तकनीक ने भी काफी मदद पहुँचाई है। हालाँकि इस तकनीक से पहले भी नवजात लड़कियों की हत्या का इतिहास काफी भयावह रहा है। यह सुनने में बड़ा ही अजीबो-गरीब लग सकता है कि किस तरह से आज के समय में मध्ययुगीन बर्बरता आधुनिकता का सहारा लेकर आगे बढ़ रही है। इसे इस तरह से भी कहा जा सकता है। कि वैश्वीकरण पर आधारित समाज ने पितृसत्तात्मक मूल्यों को कमजोर करने की बजाय और मजबूत किया है।