वैश्वीकरण और स्त्री - globalization and women

वैश्वीकरण और स्त्री - globalization and women


प्रभा खेतान कहती हैं कि “जब मैं 'भारतीय स्त्रियों' जैसे संबोधन को प्रयुक्त करती हूँ तो उसमें लाखों स्त्रियाँ शामिल होते हुए भी कुछ स्त्रियाँ शामिल नहीं हो पाती, क्योंकि वे चुनाव करने में असमर्थ हैं। और गरीबी की सीमा रेखा के नीचे हैं। भूमंडलीय समाज में मुक्ति की कामना केवल वही स्त्री करने में समर्थ है, जो गरीबी की सीमा रेखा के ऊपर है।


भारत में पिछले पच्चीस सालों में सरकार की नीतियों ने महिलाओं के एक तबके को आधुनिक शिक्षा से लैस किया है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने महिलाओं के एक छोटे से तबके के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों, आईटी कंपनियों व काल सेंटर के दरवाजे खोले हैं।

इस प्रक्रिया ने इस तबके की महिलाओं के लिए बाजार के रास्ते सुगम किए हैं, लेकिन इसके साथ-साथ आज भी महिलाओं की बड़ी आबादी पर श्रम के लैंगिक विभाजन का असर साफ साफ दिखाई पड़ता है। महिलाओं का बड़ा हिस्सा आज भी घर में रहकर घरेलू काम को ही करता है जिसे अनुत्पादक श्रम माना जाता है। इस श्रम के एवज में उसे कोई मजदूरी नहीं दी जाती है। महिलाएँ आज भी घर में रहकर 12 से 14 घंटे तक काम करती हैं। बच्चों को पालना, साफ सफाई, खाना पकाना, बुजुर्गों की देखभाल के एवज में उन्हें कोई तनख्वा नहीं मिलती है। इन कामों की सकल घरेलू उत्पाद (Gdp) में भी कोई गणना नहीं होती है। इन सभी कामों को पूँजीवादी व्यवस्था उनसे मुफ्त में कराती है।


इसके साथ साथ महिलाओं की बड़ी आबादी आज भी अनौपचारिक क्षेत्र में ही काम करने के लिए विवश है। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएँ लगभग 96 फीसदी के आस-पास हैं। इनके अधिकतर काम अकुशल श्रेणी में रखे जाते हैं. यहाँ पर काम के घंटे तय नहीं होते, मजदूरी तय नहीं होती व इसके साथ किसी भी तरह के श्रम कानूनों का पालन नहीं किया जाता है। किसी भी समय निकाले जाने का भय और आय का कोई और जरिया न होने की वजह से वह कम वेतन पर भी काम करने के लिए मजबूर होती हैं। अर्थव्यवस्था का यह अनौपचारिकीकरण शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों दोनों में देखा जा सकता है। निजीकरण की इस प्रक्रिया ने श्रम के अनौपचारिकीकरण को और अधिक बढ़ाया है।

लगातार सार्वजनिक इकाइयों को बेचा जा रहा है या उनका विनिवेश किया जा रहा है। एनडीए की पहली सरकार ने तो बाकायदा विनिवेश मंत्रलाय ही बना दिया था। सार्वजनिक इकाइयों के बंद होने से भी रोजगार के अवसर कम हुए हैं। निजीकरण का सबसे नकारात्मक असर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर पड़ रहा है। शिक्षा के निजीकरण ने निम्न मध्यम परिवारों की लड़कियों को उच्च शिक्षा से छू कर दिया है। इसी तरह से महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा आज भी उचित स्वास्थ्य सुविधाओं से दूर है। गोपा जोशी लिखती हैं। कि महिला स्वास्थ्य में एक बहुत बड़ी बाधा अधिकतर महिलाओं को पर्याप्त मात्रा में पोषक आहार नहीं मिलना भी है।

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान की तरफ से जारी रपट के अनुसार भारत भुखमरी के मामले में पाकिस्तान और श्रीलंका से भी आगे है। यहाँ पर तकरीबन 45 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में हर साल एक करोड़ तीस लाख महिलाएँ कैंसर की बीमारी का शिकार होती हैं, जिनमें से पचहत्तर हजार की मौत गर्भाशय के कैंसर से होती है। ग्रामीण महिलाओं की स्थिति तो शहरी महिलाओं से और ज्यादा खराब है, गाँव की इस उपेक्षा का मूल कारण सरकारों की शहर केंद्रित नीतियाँ हैं। गाँव को उनकी आबादी के हिसाब से धन नहीं आवंटित किया जाता है। इसलिए धन के अभाव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में आवश्यक उपकरणों का भी अभाव होता है। जिसके चलते छोटी-छोटी बीमारियों के इलाज के लिए भी उन्हें शहर की तरफ ही भागकर आना पड़ता है।


वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने उपभोक्तावाद को भी बहुत बढ़ावा दिया है। इस बाजार आधारित उपभोक्तावाद ने समाज के हर हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया है। समाज का कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं रह गया है। इसे हम समाज में होने वाले विवाह के अवसरों पर भी देख सकते हैं। अस्सी के दशक में महिला आंदोलन के प्रयासों से दहेज को लेकर सख्त कानून बनाए गए थे लेकिन आज उन कानूनों का कोई अर्थ नहीं रह गया है क्योंकि विवाह के अवसरों पर कीमती से कीमती उपभोक्ता वस्तुओं का लेन देन अब स्टेटस सिंबल की शक्ल अख्तियार कर चुका है। बड़े बड़े गेस्ट हाउस से शादी करना, महँगी महँगी गाड़िया देना यह सब कुछ आज के जीवन में सामान्य हो चुका है। हाल ही में आए बहुत सारे विज्ञापन भी इन्ही मूल्यों को बढ़ावा देते हैं।

इन सबकी मार सबसे ज्यादा वधु पक्ष पर ही पड़ती है। लड़की के पैदा होने के बाद से ही लड़की का परिवार उसकी शादी के लिए पैसे रुपये जोड़ने लगता है। इस उपभोक्तावाद ने महिलाओं के खिलाफ होने वाली एक नई तरह की हिंसा को जन्म दिया है, जिसे हम भ्रूण हत्या के नाम से भी जानते हैं। जन्म लेने से पहले ही लड़कियों की हत्या कर दी जाती है। इस भ्रूण हत्या में वैश्वीकरण से उपजी तकनीक ने भी काफी मदद पहुँचाई है। यह सुनने में बड़ा ही अजीबोगरीब लग सकता है कि किस तरह से आज के समय में मध्य युगीन बर्बरता आधुनिकता का सहारा लेकर आगे बढ़ रही है। इसे इस तरह से भी कहा जा सकता है कि वैश्वीकरण पर आधारित समाज ने पितृसत्तात्मक मूल्यों को कमजोर करने की बजाय और मजबूत किया है। इसके साथ-साथ वैश्वीकरण की उपभोक्तावादी संस्कृति ने महिलाओं के शरीर के वस्तुकरण को और बढ़ावा दिया है। पश्चिम के सिनेमा में इन प्रवत्तियों को आसानी से तलाशा जा सकता है।