वैश्वीकरण: एक परिचय - Globalization: An Introduction
वैश्वीकरण: एक परिचय - Globalization: An Introduction
वैश्वीकरण हमारे समय की सबसे महत्वपूर्ण परिघटना है। निजी जीवन से लेकर सामाजिक जीवन के हर पहलू में इसके प्रभाव को देखा जा सकता है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया के बहुआयामी होने के चलते इसकी कोई एक सटीक परिभाषा करना मुश्किल है। इसी के चलते आम जनमानस में और बौद्धिक समुदाय में इसको लेकर संशय बना हुआ है। वैश्वीकरण अग्रेज़ी शब्द Globalization का पर्यायवाची है। सन् 1960 में इसका प्रयोग दुनिया से संबंधित (Belonging to the world) या पूरे संसार ( Worldwide ) के अर्थ में किया गया था। प्रसिद्ध संचारशास्त्री मार्शल मैकलुहान (Marshall McLuhan) ने 1964 में विश्व ग्राम (Global Village) शब्द का इस्तेमाल किया था। उन्होंने यह कल्पना की थी कि आने वाले समय में सूचना और संचार माध्यमों के विकास के परिणाम स्वरुप दुनिया एक गाँव में तब्दील हो जाएगी।
वैश्वीकरण का शाब्दिक अर्थ स्थानीय या क्षेत्रीय वस्तुओं या घटनाओं के विश्व स्तर पर रूपांतरण की प्रक्रिया से है। इसे एक ऐसी प्रक्रिया का वर्णन करने के लिए भी प्रयुक्त किया जा सकता है, जिसके द्वारा पूरे विश्व के लोग मिलकर एक समाज बनाते हैं तथा एक साथ कार्य करते हैं। यह प्रक्रिया आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक और राजनैतिक ताकतों का एक संयोजन है। वैश्वीकरण का उपयोग अक्सर आर्थिक वैश्वीकरण के संदर्भ में किया जाता है, अर्थात व्यापार, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश, पूँजी प्रवाह, प्रवास और प्रौद्योगिकी के प्रसार के माध्यम से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं में एकीकरण |
टॉम जी. पामर वैश्वीकरण को निम्न रूप में परिभाषित करते हैं सीमाओं के पार विनिमय पर राज्य प्रतिबंधों का हास या विलोपन और इसके परिणाम स्वरूप उत्पन्न हुआ उत्पादन और विनिमय का तीव्र एकीकृत और जटिल विश्वस्तरीय तंत्र। यह अर्थशास्त्रियों के द्वारा दी गई सामान्य परिभाषा है, इसे अक्सर श्रम विभाजन (division of labor ) के विश्वस्तरीय विस्तार के रूप में अधिक साधारण रूप से परिभाषित किया जाता है।
थामस एल फ्राइडमैन (Thomas L. Friedman ) " दुनिया के 'सपाट' होने के प्रभाव की जाँच करते हैं" और तर्क देते हैं कि वैश्वीकृत व्यापार (Globalized trade),
आउटसोर्सिंग (Outsourcing), आपूर्ति के शृंखलन (Supply-chaining) और राजनैतिक बलों ने दुनिया को बेहतर और बदतर, दोनों रूपों में स्थायी रूप से बदल दिया है। वे यह तर्क भी देते हैं कि वैश्वीकरण की गति बढ़ रही है और व्यापार संगठन तथा कार्यप्रणाली पर इसका प्रभाव बढ़ता ही जाएगा।
नोम चोम्स्की का तर्क है कि सैद्धांतिक रूप में वैश्वीकरण शब्द का उपयोग आर्थिक वैश्वीकरण (economic globalization) के नवउदार रूप का वर्णन करने में किया जाता है। हर्मन ई. डेली (Herman E. Daly) का तर्क है कि कभी-कभी अंतरराष्ट्रीयकरण और वैश्वीकरण शब्दों का उपयोग एक दूसरे के स्थान पर किया जाता है लेकिन औपचारिक रूप से इनमें मामूली अंतर है।
"अंतरराष्ट्रीय करण शब्द का उपयोग अंतरराष्ट्रीय व्यापार, संबंध और संघियों आदि के महत्व को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय का अर्थ है राष्ट्रों के बीच, वैश्वीकरण का अर्थ है आर्थिक प्रयोजनों के लिए राष्ट्रीय सीमाओं का विलोपना अंतरराष्ट्रीय व्यापार तुलनात्मक लाभ (Comparative advantage) द्वारा शासित, अंतर क्षेत्रीय व्यापार पूर्णलाभ (Absolute advantage) द्वारा शासित बन जाता है।
वैश्वीकरण का एक महत्वपूर्ण पहलू है राज्य केंद्रित एवं नियोजित आर्थिक विकास के स्थान पर बाजार आधारित उदारीकृत एवं वैश्वीकृत आर्थिक विकास।
राज्य के प्रति लोगों में एक अविश्वास पैदा होता है और उसे सभी समस्याओं के मूल में देखा जाता है। दूसरी तरफ बाजार को सभी समस्याओं के हल के रूप में देखा जाता है। राज्य ने अपनी भूमिका को काफी सीमित किया है। अब भारत में भी राज्य के नियंत्रण में होने वाले विकास की तीखी आलोचना होने लगी है। राज्य और उसकी संस्थाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार ने इसके लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध कराई है। सूचनाओं के मुक्त प्रवाह और इसके विस्तार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूँजी के मुक्त प्रवाह ने राष्ट्र राज्य की सीमाओं को अप्रसांगिक बनाने में बड़ी भूमिका अदा की है।
प्रभा खेतान के शब्दों में भूमंडलीकरण वह प्रक्रिया है जो वित्त-पूँजी के निवेश, उत्पाद और बाजार द्वारा राष्ट्रीय सीमा में ही वर्चस्वी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सीमा से परे भूमंडलीय आधार पर निरंतर अपना प्रसार करना चाहती है। इसका निर्णय-क्षेत्र सारी दुनिया है। यह अपनी मुद्रा के कार्यक्षेत्र को निरंतर पुनः पुनः समायोजित करती रहती है। किसी भी कंपनी की फैक्ट्री, ऑफिस और उसके कर्मचारी लाभ कमाने के लिए राष्ट्रीय सीमा के बाहर कहीं भी जाने को तैयार रहते हैं। इन भूमंडलीय निगमों के प्रबंधकों ने अपनी तकनीकी क्षमता के आधार पर नए अंतरराष्ट्रीय संबंधों का निर्माण किया है जिससे उत्पादन एवं उपभोग की क्षमता बढ़ी है।
आज पूँजी और सूचना के राष्ट्रीय सीमाओं के सहजता से आरपार आना- जाना संभव होने से जो नए नेटवर्क बने हैं, उन्होंने पूँजी, सेवा और वस्तु की अंतरराष्ट्रीयता को बढ़ावा दिया है।"
भूमंडलीकरण की प्रक्रिया का गहरा रिश्ता पूँजीवादी उत्पादन के साथ है। पूँजीवाद की व्याख्या किए बगैर भूमंडलीकरण को समझना मुमकिन नहीं होगा। पूँजीवाद 1970 के दशक से गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। इस संकट के बीज पूँजीवाद के गर्भ में ही छुपे हैं।
वर्तमान भूमंडलीकरण में दो विशेषताएँ निहित हैं- उत्पादन का भूमंडलीकरण और वित्त (फाइनेंस) का भूमंडलीकरण । सत्तर के दशक से भूमंडलीकरण की दोनों विशेषताएँ ज्यादा प्रभावी हो गई हैं।
भूमंडलीकरण बहुराष्ट्रीय पूँजी और राष्ट्र राज्य के जटिल एवं बहुआयामी अंतर्संबंधों का • परिणाम है। जिस तरह से बहुत सारे देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं वित्तीय पूँजी के प्रवाह से प्रतिबंध हटा रहे हैं, उसी तरह से भूमंडलीकरण बहुराष्ट्रीय अमीरों (Elites). बहुराष्ट्रीय कारपोरेशन्स को दुनिया के बाजार पर कब्जा करने के नए-नए अवसर प्रदान कर रहे हैं।
इसके साथ-साथ हम देखते हैं कि इस प्रक्रिया के समांतर कामगारों व मेहनतकश आबादी से जुड़े मुद्दों पर होने वाले आंदोलनों की गति तीव्र रूप से आगे बढ़ रही है।
वैश्वीकरण की प्रक्रिया के चलते समाज में हाशिये पर पड़े लोगों की आजीविका नष्ट होती जा रही है। पूँजी के इस वैश्वीकरण ने समाज के कमजोर तबको की स्थिति को पहले से ज्यादा संकट में डाल • दिया है। वैश्वीकरण के साथ जुड़ी नीतियों ने दुनिया के अधिकांश हिस्सों में स्वास्थ्य व शिक्षा की स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
आर्थिक वैश्वीकरण के नाम पर होने वाली विकास की यह प्रक्रिया संसाधनों,
सस्ते श्रम और हर नए बाजार को आत्मसात करती जा रही है। उत्पादन और पुनः उत्पादन ही इसका उद्देश्य है। दुनिया के अनेक देशों में सस्ते श्रम के लालच में बहुराष्ट्रीय निगम इन देशों में प्रवेश करते हैं। तीसरी दुनिया के देशों में जनसंख्या के अधिक होने के कारण वहाँ बाजार की भी संभावना अधिक है। इसी के चलते इन देशों में ऐसे कानून जो इन संस्थाओं की गतिविधियों में बाधा उत्पन्न करते हैं, उनमें सुधार किए जा रहे हैं। मसलन श्रम कानून, स्वास्थ्य संबंधी कानून सार्वजनिक वितरण प्रणाली एवं पर्यावरण संबंधी कानूनों में बदलाव
• किए जा रहे हैं। वैश्वीकरण के समर्थक विद्वानों का तर्क है कि जब तक उन्हें पर्याप्त सुविधाएँ नहीं मिलेगी या कानून नहीं बदले जाएँगे तब तक उत्पादन कैसे संभव होगा?
वैश्वीकरण की एक और खासियत यह है कि बाजार आधारित व्यवस्था में जीवन के हर रूप का वस्तुतीकरण कर दिया जाता है। कल तक जो भी संसाधन समाज के कमजोर व्यक्ति तक उपलब्ध थे उन्हें उनसे छीना जा रहा है। निजीकरण की इस प्रक्रिया ने मूलभूत सुविधाओं तक से आम जन को वंचित कर दिया है।
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