भक्ति आंदोलन का विकास - Growth of Bhakti Movement
भक्ति आंदोलन का विकास - Growth of Bhakti Movement
इन नई परिस्थितियों के संदर्भ में आंदोलन के परिवर्तन का भी पक्ष सार्थक रूप में विकसित होता है, जिसका सबसे शक्तिशाली चित्रण कबीर, नानक, रैदास और दादू दयाल के साहित्य में हुआ है। एक ओर आर्थिक उत्पादन में कुशलता और वृद्धि जिसके कारण किसानों और दस्तकारों में शोषण और अन्याय के प्रति विद्रोह की भावना की प्रखर अभिव्यक्ति मिलती है। दूसरी ओर राज्यशक्ति को बढ़ती हुई माँग तथा विशेषकर राज्य कर्मचारियों के भ्रष्टाचार तथा तीसरी ओर सामाजिक अत्याचार जिसका सबसे ज्वलंत उदाहरण जाति प्रथा है सामाजिक और प्रशासनिक अत्याचार के प्रति विशेष की भावना का सबसे मर्मांतक चित्रण कबीर और नानक के साहित्य में हुआ है।
इन कवियों ने सामाजिक विद्रूपों पर तीखे आघात किए हैं, परंतु इनकी भावना नैतिकता के स्तर पर बहुत सीमा तक केंद्रित रही है। कबीर के ये उद्धरण इस प्रवृत्ति पर यथेष्ट प्रकाश डालते हैं-
मेड़ी महल बावड़ी छाजाई।
छागिये सब भूपति राजा। कहे कबीर राम त्यों लाई।
धरी रही माला काँहु खाई ||
टेड़ी पगड़ी टेढे चले लागे बीरे खान।
भाऊ भगति से काम न कछु ऐ मेरो का दीवाना। राम विसारियों हे अभिमानी। कनक कामिनी महा सुंदरी पेखि पेखि सच मानी।। लालच झूठ महामद इहि इहि विधि आँव बिहनी ।। कहि कबीर अंत की बेर आई लागो काल निदानी ||
एके पवन एक ही प्राणी करो रसोई न्यारी जानी। माँटी सू माटी ले पाती। लागी कहो कहाँ धू छोती ।।
भक्ति काल के पथ प्रदर्शकों ने अपने काल के सभी सामाजिक वर्गों के सामने प्रश्न चिह्न लगाए, परंतु राजनैतिक संस्थाओं को स्वीकार करते हुए केवल यह नैतिक आपत्ति की कि इन संस्थाओं के संचालन अपने अधिकार और दायित्व का दुरुपयोग करते हैं
और यह आशा व्यक्त की कि हर व्यक्ति पूरी ईमानदारी के साथ अपने कर्तव्य का निर्वाह करेगा इसी में व्यक्ति और समाज का भला है।
भक्ति आंदोलन के पास स्थापित सामाजिक व्यवस्था के किसी विकल्प की संभावना नहीं थी। केवल उसी समाज को एक आदर्श भाव से चलाने की कल्पना थी- जिसको तिसकी दीजिए।
सुत्रित पर उपगारा दादू सेवत सो भले ।
सिर नहिं लेवे भार।।
यदि भक्ति आंदोलन के पास समकालीन समाज व्यवस्था के विकल्प की परिकल्पना का अभाव था, तो एक वैकल्पिक समाज व्यवस्था की कल्पना का आधार उस समाज की संकटग्रस्त स्थिति में ही देखा जा सकता है।
यह ऐसी संकटग्रस्त स्थिति है जिसका समाधान एक नई सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था की स्थापना में ही संभव हो सकता था। ऐसी स्थितियों और उनके समाधान यूरोप के इतिहास में बहुत स्पष्ट रूप में देखे जा सकते हैं जब दास प्रथा पर आधारित समाज के संकट का समाधान सामंती समाजतंत्र में ही संभव हुआ और सामंती समाज के संकट का समाधान करने के लिए पूँजीवादी व्यवस्था हुई, जिसके पश्चात् समाजवाद का उदय हुआ। भारत के इतिहास में संकट और उसके समाधान की अवस्थाएँ उतनी स्पष्ट नहीं जितनी यूरोप में रही हैं। यह होते हुए भी भारतीय इतिहास का मध्ययुग ऐसा था जिसमें कुछ परिवर्तन हो रहे थे तथा बहुत से तनाव और द्वंद्व थे फिर भी यह स्थिति नहीं थी कि समूच स्थापित सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का उन्मूलन करके उसके स्थान पर नए समाज की स्थापना की जा सके। धर्म का आधार लेकर किसी नई व्यवस्था का निर्माण करना संभव नहीं हैं, सुधार की संभावना ही हो सकती है।
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