यूरोप में वाणिज्यवाद का विकास - Growth of Mercantilism in Europe
यूरोप में वाणिज्यवाद का विकास - Growth of Mercantilism in Europe
वाणिज्यवाद से अभिप्राय
व्यापारिक क्रान्ति ने एक नवीन आर्थिक विचारधारा को जन्म दिया। इसका प्रारम्भ 16वीं सदी में हुआ। इस नवीन आर्थिक विचारधारा को वाणिज्यवाद, वणिकवाद या व्यापारवाद कहा गया है। फ्रांस में इस विचारधारा को कोल्बर्टवाद और जर्मनी में केमरलिज्म कहते हैं। 1776 ई. में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडमस्मिथ ने अपने ग्रन्थ 'वेल्थ ऑफ नेशन्स' में इसका विवेचन किया है। वाणिज्यवाद से अभिप्राय उस आर्थिक विचारधारा से है जो पश्चिमी यूरोप के देशों में विशेषकर फ्रांस, इग्लैण्ड और जर्मनी में 16वीं और 17वीं सदी में प्रसारित हुई थी और 18वीं सदी के मध्य तक इसका खूब विकास हुआ।
वाणिज्यवाद की धारणा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार और उससे प्राप्त धन से संबंधित है। इस वाणिज्यवाद के सिद्धान्त के अनुसार कृषि और उसके उत्पादन की कुछ सीमा तक ही वृद्धि कर सकते हैं। कृषि आर्थिक दृष्टि से कुछ सीमा के बाद अनुत्पादक भी हो सकती है, पर उद्योगों, व्यवसायों और वाणिज्य-व्यापार की वृद्धि और विस्तार की कोई सीमा नहीं है। औद्योगीकरण से और व्यापार की नियमित वृद्धि से देश सोना-चाँदी प्राप्त कर समृद्ध और शक्तिशाली होगा। यह वाणिज्यवाद का मूल सिद्धान्त है। 1.3.10.2 वाणिज्यवाद के प्रमुख लक्षण
(1) सोने और चाँदी का संचय
व्यापार वाणिज्य से धन की वृद्धि होगी और यह धन सोने, चाँदी, हीरे, जवाहरात, बहुमूल्य रत्न के रूप में प्राप्त कर उनका संग्रह करना चाहिए। ये सब न तो नाशवान हैं और न परिवर्तनशीला वे हर समय और हर अवसर पर प्रचुर सम्पत्ति ही रहते हैं। इनके भण्डार राजशक्ति के प्रतीक होते हैं।
(2) अंतर्राज्यीय व्यापार
वाणिज्यवाद का आधार हैं देश में औद्योगिकरण कर देश के बढ़ते हुए उत्पादन की वस्तुओं का अन्य देशों को निर्यात करना ।
आवश्यक हुआ तो राज्य को कुछ विशिष्ट उद्योगों को संरक्षण देना चाहिए और विदेशी व्यापार को प्रोत्साहित करना चाहिए।
(3) अनुकूल और संतुलित व्यापार
व्यापार में पर्याप्त धन प्राप्त करने के लिए विदेशों को अत्यधिक मात्रा में व्यापारिक माल बेचें, पर विदेशों से अपने देश में न्यूनतम मात्रा में माल मंगाएँ। इसका अर्थ यह है कि देश न्यूनतम आयात करे और अधिकतम निर्यात करे। इससे देश को निर्यात करने में बहुमूल्य धातुएँ जैसे स्वर्ण और रजत प्राप्त होंगी और न्यूनतम आयात करने से विदेशों को बहुत कम धन बाहर भेजना पड़ेगा।
इस सिद्धान्त को अनुकूल और संतुलित व्यापार कहते हैं। इस प्रणाली को अपनाने से देश में अधिक उत्पादन होगा, अधिक मुद्रा प्रचलन में होगी, पूँजीवाद को प्रोत्साहन मिलेगा और देश आर्थिक दृष्टि से बलशाली होगा।
औद्योगिक प्रतिबंध और व्यापारिक नियंत्रण
(4) देश में उद्योग व्यवसायों को राजकीय प्रोत्साहन देकर उनमें अधिकाधिक वृद्धि करना। ऐसा करने में कहीं अत्यधिक उत्पादन नहीं हो जाये। अत्यधिक उत्पादन से अनेक हानियाँ होती हैं, जैसे बेरोजगारी में वृद्धि, माल के उठाव का अभाव, भावों का गिरना, अर्थ व्यवस्था का गड़बड़ाना।
इसलिए उत्पादन को राज्य कानूनों से नियंत्रित करना पड़ता है।
(5) नवीन व्यापारिक मण्डियाँ और उपनिवेश
देश के बाहर भेजी जाने वाली तैयार वस्तुओं की खपत के लिए विदेशों में व्यापारिक मंडियों को प्राप्त करना और वहाँ से देश के उद्योग-व्यवसायों के लिए कच्चा माल प्राप्त करना। ऐसी व्यापारिक मंडियाँ प्राप्त करने के लिए शक्तिशाली राज्यों ने विदेशों में अपने उपनिवेश बसाये जहाँ कि राज्य में बनी हुई वस्तुओं को सरलता से लाभप्रद दरों से बेचा जा सके। इससे देश को अधिक आर्थिक लाभ होगा। इस प्रकार वाणिज्यवाद ने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का मार्ग प्रशस्त किया।
वार्तालाप में शामिल हों