भारत में सूफी मत का विकास - Growth of Sufism in India

भारत में सूफी मत का विकास - Growth of Sufism in India


भारत आकर बसने वाले आरंभिक सूफियों में हुजविरि (लगभग 1088 ई.) सर्वप्रमुख है। पहले भी इस बात की चर्चा की थी कि उसने कशफ उल महजूब नामक एक ग्रंथ लिखा था। फारसी में लिखा यह ग्रंथ सूफी मत पर लिखा एक मानक दस्तावेज़ है। तेरहवीं शताब्दी के आरंभ में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद भारत में कई सूफी संप्रदायों की स्थापना हुई। सूफी मत के प्रचार प्रसार के लिए भारत एक अनुकूल जगह सिद्ध हुई। यह सूफियों के लिए शरण स्थल भी बना। तेरहवीं शताब्दी में इस्लामी दुनिया पर मंगोलों के आधिपत्य के बाद सूफियों को वहाँ से भागना पड़ा। भागकर वे सीधे भारत आए ।

13वीं 14वीं शताब्दी के दौरान भारत में जगह-जगह खानकाह स्थापित हो गए। इन सूफियों ने भारत में इस्लामी दुनिया के कई संप्रदाय स्थापित किए अपनी संस्था विकसित की और जहाँ इनका प्रभाव जमा वहाँ वे स्थापित हो गए। 14वीं शताब्दी के मध्य तक मुल्तान से लेकर बंगाल तक और पंजाब से लेकर देवगिरि तक समूचे देश में वे संक्रिय हो गए। आरंभिक 13वीं शताब्दी के एक यात्री के अनुसार दिल्ली और इसके आसपास दो हजार आश्रय स्थान और खानकाह स्थापित थे।


मूल रूप से भारत में स्थापित सूफी मत का आधार इस्लामी दुनिया, खासकर ईरान और मध्य एशिया में स्थापित सूफी सिद्धांत और मान्यताएँ थी। पर भारत में स्थापित होने के बाद इसके विकास में सूफी मत के अभारतीय तत्वों की अपेक्षा भारतीय परिवेश की ज्यादा भूमिका थी। एक बार में जड़ जमा लेने के बाद उनका अलग ढंग से विकास हुआ, अवनति हुई और उत्थान हुआ। हालांकि भारतीय सूफी मत पर बाहरी सूफीमत के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता है, पर यह भारतीय परिवेश में ही बढ़ा और फला-फुला