भक्ति संतों की विचारधारा - Ideology of Bhakti Saints
भक्ति संतों की विचारधारा - Ideology of Bhakti Saints
भक्तिकालीन संतों ने छोटे किसान, जुलाहे और अन्य छोटे-छोटे व्यक्तियों की तुलना ईश्वर से की है। इस तरह इन छोटे लोगों के स्तर को अपनी कल्पना में ऊंचा उठाया है। उन्होंने यह कल्पना ईश्वर और उसके दरबार के प्रतिरूप में की दादू दयाल ईश्वर को साहिब सुल्तान महाराज राव आदि संज्ञा देते हैं और उसके दरबार में दासियों, कवियों, नर्तकों, नगाड़े बजाने वालों खजाने और दूतों की उपस्थिति की कल्पना करते हैं। इस दरबार में सम्राट के दरबार के लगभग सभी कर्मचारी मौजूद रहते हैं।
कबीर दादू ईश्वर या गुरु और मानवीय संबंधों को भी उसी रूप में देखते हैं, जिसमें कि समसामयिक राजनैतिक विचारक या इतिहासकार सम्राट या प्रजा के संबंधों की कल्पना करते हैं।
इस कल्पना में गुरु के प्रति व्यक्ति की पूरी निष्ठा होती है दूसरी ओर गुरु अपने शिष्यों की ओर दया और करुणा का रवैया रखता है।
भक्ति आंदोलन के उत्तर भारतीय समाज की सबसे निम्न श्रेणियों और जातियों में भक्त संतों का इतना लोकप्रिय होने के बाद भी इससे शासक वर्ग को कोई खतरा दिखाई नहीं देता था। इस आंदोलन के केंद्र में अन्याय के प्रति रोष है, किंतु विद्रोह नहीं। यदि पंद्रहवीं सोलहवीं शताब्दी के भारत के स्थापित समाज का उन्मूलन करके उसके स्थान पर एक नए समाज की कल्पना संभव नहीं थी तो भी उस समाज को झिंझोड़ना अनिवार्य था। भक्ति आंदोलन के सभी नेता समाज की निम्न श्रेणियों और जातियों से संबंधित थे।
कबीर बनारस का जुलाहा नानक एक छोटा व्यापारी, पन्ना एक जाट किसान, रैदास एक चमार और बंजारा थे। इन सबने एकेश्वरवाद को अपने सुधार आंदोलन का आधार बनाया था। एकेश्वरवाद में सामाजिक समानता का संदेश निहित होता है, जिसके कारण एकेश्वरवाद समाज की उन श्रेणियों के दिल को सबसे अधिक छूता है, जिनको सामाजिक असमानता का शिकार होना पड़ता है। इसी असमानता की पीड़ा का चित्रण उन संतों की वाणी में जिन्हें स्वयं भी इसका अनुभव था, लेकिन उनका अनुभव उनके निजी अस्तित्व से कहीं अधिक व्यापक था जिस रोष के साथ इन कवियों ने वर्ण और जाति भेद का विरोध किया है उसी में इस वेदना की झलक मिलती है,
लेकिन अन्य पहलुओं की भाँति जाति प्रथा का विरोध नैतिक धरातल तक ही सीमित रहा। स्पष्ट है कि जाति नैतिक धरातल पर आधारित संस्था नहीं थी, बल्कि इसकी गहरी सामाजिक और आर्थिक नींव थी जिस पर उस समाज का पूरा ढाँचा खड़ा था। मध्ययुगीन संतों के रोष की अभिव्यक्ति के फलस्वरूप इस प्रथा में लचक अवश्य आई। किसी भी संस्था पर वैकल्पिक चेतना के अभाव में वैचारिक शक्तिशाली आक्रमण का निष्कर्ष यही निकलता है कि उस संस्था में आक्रमणकारी के लिए भी स्थान बन जाता है। इस बात की पुष्टि में सिख समुदाय का निर्माण और विकास एक दिलचस्प उदाहरण है।
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