दलित स्त्रियों के मुद्दों की अनदेखी और उनकी स्वीकार्यता - Ignoring and accepting the issues of Dalit women

दलित स्त्रियों के मुद्दों की अनदेखी और उनकी स्वीकार्यता - Ignoring and accepting the issues of Dalit women


1990 ई. में इस संदर्भ में बात प्रारंभ हुई जब दलित महिलाओं ने महिला आंदोलन में अपने मुद्दों का अभाव देखा और वर्गगत राजनीति में संलग्न प्रगतिशील संगठनों में इनके सीमित होते दायरे पर चर्चा प्रारंभ की। कहा गया कि यह तो उच्च जातीय, शिक्षित, शहरी मध्य वर्गीय महिलाओं का आंदोलन है। इसमें दलित और मजदू महिलाओं के मुद्दों और संघर्षों को शामिल नहीं किया गया। इसी विचार के साथ भारत में दलित स्त्रीवाद का जन्म हुआ। गोपाल गुरु, शर्मिला रेगे इसके महत्वपूर्ण विचारक रहे हैं।

महिला आंदोलन ने इन मुद्दों को गंभीरता से लिया। महिला आंदोलन के अगुआ विद्वानों ने जातिवर्ग और जेंडर के मध्य अंतर्संबंधों को स्पष्ट किया और यह बात प्रस्तुत की कि संरचना की हर असमानता दूसरी असमानता से जुड़ी हुई है और एक साथ में ही हमे अन्य दूसरी असमानताओं को भी संबोधित करना होगा, उन्हें छू करने के उपाय करने होंगे, अन्यथा सिर्फ एक ही असमानता पर बात करने में ही सीमित होने पर हम अस्मितावादी विमर्श में फँस जाएँगे और किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाएँगे। इस हेतु स्त्रीवादी अकादमिक ज्ञान ने इस सैद्धांतिकी को विकसित कर महिला आंदोलन का दायरा बढ़ा दिया। 90 के दशक में दलित और मजदूर महिलाओं के मुद्दे महिला आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बने।