भारत में वैश्वीकरण का प्रभाव - Impact of Globalization in India

भारत में वैश्वीकरण का प्रभाव - Impact of Globalization in India


भारत ने औपचारिक रूप से वैश्वीकरण की प्रक्रिया के लिए 1991 में अपने दरवाजे खोले। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और वित्तमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संरचनात्मक समायोजन के कार्यक्रम को लागू किया गया। इसी के बाद उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों को अमल में लाया जाने लगा। भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, वर्ल्ड बैंक और डब्लू. टी. ओ से कर्ज लिया। इस कर्ज के बदले में देश को कई तरह की शर्तों का अनुपालन करना था। इन शर्तों में यह भी था कि भारत अपना वित्तीय घाटा कम करे, सार्वजनिक पूँजी निवेश न करे,

सब्सिडी कम करे तथा आर्थिक विषमता कम करने वाले कार्यक्रमों पर खर्च कम करे। कर्ज लेने के बाद नीतिगत मामले काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से संचालित होने लगे, जिसका मतलब था कल्याणकारी राज्य की संरचना को बदल कर आयात की जगह निर्यात की नीति को बाजार आधारित बनाना, निजीकरण को बढ़ावा देना, विदेशी पूँजी को प्रोत्साहित करना तथा व्यापार की नीतियों में बड़े बदलाव करना आदि।


अभय कुमार दुबे के अनुसार “भारत के वैश्वीकरण की यह कहानी अधूरी ही रह जाएगी अगर इसमें यह न जोड़ा जाए कि इसकी अघोषित भूमिका अस्सी के दशक से ही बनने लगी थी।

यही वह दशक था जब अनिवासी भारतीय (एन.आर.आई.) नामक एक समुदाय का जिक्र शुरू हुआ और उनके भारतीय अर्थतंत्र में योगदान से उम्मीद की जाने लगीं। यह राष्ट्रवाद की पारंपरिक धारणा में तबदीली का संकेत था। इसके अनुसार भारतीय राष्ट्रवाद के हित भौगोलिक सीमाओं से परे भी स्थित हो सकते थे। इसी दशक में भारत ने इंटरनेट की दुनिया में कदम रखा। उपग्रहीय चैनलों ने भी इसी दशक में शहरी मध्यवर्ग के ड्राइंग रूम में प्रवेश किया था। नेहरु युग में अपनाई गई विकास नीति आयात प्रतिस्थापन पर आधारित जरूर थी पर अस्सी के दशक में राजीव गांधी के नेतृत्व में अर्थतंत्र ने निर्यातोन्मुख विकास के रास्ते पर कदम बढ़ा दिए थे। निर्यात योग्य जिंसों के उत्पादन के लिए आयात बढ़ाना जरूरी हो गया था।


वैश्वीकरण की नीतियों के संदर्भ में हमें इस तथ्य को ध्यान में रखना होगा की भारत एक विकासशील देश है और काफी समय तक औपनिवेशिक हुकूमत का हिस्सा रहा है। इसके साथ-साथ मानव विकास सूचकांक, जेंडर सूचकांक और ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भी भारत की स्थिति बहुत अच्छ नहीं है। भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश में जहाँ आज भी अर्द्धसामंती मूल्यों की जड़ें बहुत मजबूत हैं. वहीं पर इन नीतियों का क्या असर पड़ेगा यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है।


भारत में वैश्वीकरण को अपनाने के बाद उसकी भव्यता की जो तस्वीर दिखाई जा रही थी, उस पर बहुत से प्रश्न चिह्न भी लग रहे हैं।

ग्लोबल दुनिया का सपना केवल सपना ही रहा या मध्यमवर्गीय आकांक्षाओं को साकार करने का जरिया बन रहा है। वैश्वीकरण की नीतियों के तुरंत बाद ही गाँव और शहर के गरीबों की जिंदगी और तकलीफदेह हो गई है। मिशेल चोसुदोव्स्की ने आरोप लगाया कि इस तारीख के बाद भारत का वित्तमंत्री संसद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को धता बता कर सीधे विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के वाशिंगटन डीसी स्थित दफ्तर की हिदायतों का पालन करने लगा है।


वैश्वीकरण के बारे में कुमार मंगलम विडला की राय कुछ इस प्रकार है मोटे तौर से भारत के भूमंडलीकरण पर होने वाली बहस दो खानों में बँटी रहती है।

एक ओर भूमंडलीकरण के समर्थक हैं और दूसरी ओर विरोधी दोनों की बहस का आधार बुनियादी तौर पर अर्थतंत्र है लेकिन इन दोनों के बीच एक ऐसी जगह भी है जहाँ दोनों खेमों के असंतुष्ट आपस में मिलते हैं। इस बीच के इलाके में संस्कृति और राजनीती के प्रश्न उठते हैं, पर उसके ऊपर पर्याप्त गहराई से ध्यान नहीं दिया जाता है। भारत का भूमंडलीकरण इसी गुंजाइश की देन और इसी कमी को पूरा करने का एक यत्न है।"


वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने भारत में कल्याणकारी राज्य की भूमिका को काफी सीमित किया है। इन नीतियों की वजह से ही शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी चीजों को भी बाजार के हवाले किया जा रहा है।

इन सुविधाओं के निजीकरण ने हाशियाकृत तबकों तक इनकी पहुँच को मुश्किल बना दिया है। खास तौर पर उच्च शिक्षा में तो निम्न मध्यम वर्ग के लिए दरवाजे लगभग बंद हो चुके हैं। तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में तो स्थिति और भी ज्यादा खराब है। लगभग यही हाल स्वास्थ्य सेवाओं का भी है। एक गरीब व्यक्ति महंगी स्वास्थ्य सेवाओं का वहन नहीं कर सकता है। वह उन महँगे प्राइवेट नर्सिंग होम का दरवाजा खटखटाने का साहस नहीं कर सकता है और न ही महँगी जाँच और दवाईयों का ही वहन कर सकता है।


वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने सबसे ज्यादा कृषि व्यवस्था को प्रभावित किया है। पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग प्रांतों में बड़े पैमाने पर किसानों ने आत्महत्या की हैं।

पिछले पच्चीस वर्षों में किसानों की खुदकुशी का यह आंकड़ा एक लाख की संख्या को पार कर चुका है। कृषि संकट का सबसे ज्यादा प्रभाव वर्चस्वशाली जातियों (Dominant Caste) पर पड़ा है। ये वर्चस्वशाली जातियाँ विभिन्न राज्यों में अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में आती हैं। इसे हम इस तरह से भी समझ सकते हैं कि मराठा (कुनबी) एक खेतिहर जाति है। पिछले पच्चीस सालों में नवउदारवादी नीतियों के चलते कृषि पर जो संकट आया है उसका नकारात्मक प्रभाव महाराष्ट्र में मराठा (कुनबी) समाज के लोगों पर पड़ा है। खेती पर आए इस संकट की वजह से ही यह समुदाय आज सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए संघर्षरत है।

लगभग इसी परिघटना को गुजरात में भी घटित होते हुए देखा जा सकता है जहाँ पर पाटीदार (पटेल) जाति के लोग आरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यही तस्वीर गुर्जर (राजस्थान), जाट (हरियाणा) और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भी है।


वैश्वीकरण ने संगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसरों में भयानक कटौती की है। अनौपचारिक क्षेत्र का बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है, जहाँ पर श्रम कानूनों का खुलेआम उल्लंघन किया जाता है। महिलाओं की बड़ी आबादी इसी अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने के लिए विवश है। अगले अध्याय में हम विस्तार से इन बातों को समझने का प्रयास करेंगे।