अनुबंधित श्रमिक व्यवस्था के तहत प्रवासन - Indentured Labour Migration
अनुबंधित श्रमिक व्यवस्था के तहत प्रवासन - Indentured Labour Migration
इंडेंचर का अर्थ लिखित अनुबंध के आधार पर निश्चित समय के लिए किसी मजदूर का मजदूरी में प्रवेश करना। मरिना कार्टर के शब्दों में “अनुबंध प्रवासित वे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपने प्रवासन यात्रा के लिए कोई खर्च स्वयं वहन नहीं किया, परंतु किसी उपनिवेश में जाने और किसी निश्चित समय के लिए मजदूरी करने के समझौते पर हस्ताक्षर किया।"
अनुबंधन एक विश्वस्तरीय प्रघटना थी, जिसका प्रारंभ 19 वीं शताब्दी में हुआ। इसका प्रारंभ मॉरीशस में ब्रिटिश लोगों द्वारा किया गया।
इसे महान प्रयोग (ग्रेट एक्सपेरिमेंट) माना गया है, क्योंकि इस व्यवस्था के द्वारा गुलामी प्रथा की समाप्ति के बाद औपनिवेशिक सत्ता के हित में मजदूरों, श्रमिकों, कामगारों की पूर्ति को बनाए रखने के लिए इसे सफलता पूर्वक वर्षों तक चलाया गया। अनुबंध व्यवस्था के कारण भारत, चीन, अफ्रीका तथा दक्षिण-पूर्व एशिया से विभिन्न श्रम आयातकर्ता कॉलोनियों के लिए बड़े पैमाने पर श्रमिक प्रवासन हुए। मारीशस इस प्रणाली में अग्रणी देश था, अन्य ब्रिटिश, फ्रांसीसी तथा डच कॉलोनियों द्वारा बाद में इस प्रणाली को अपनाया गया।
गन्ने की खेती सफलतापूर्वक करने तथा इसे लाभप्रद बनाए रखने के लिए सस्ते, बहुतायत तथा मेहनतकश श्रमिकों की आवश्यकता होती है। कैरिबियाई क्षेत्रों में बागान उपनिवेशों में गुलाम, श्रमिक उत्पादन प्रणाली की रीढ़ थे। 19 वीं शती में हिंद महासागर क्षेत्र में गन्ना उत्पादन अर्थव्यवस्था तथा समाज का आविर्भाव हुआ। ब्रिटिश बाजार में 1825 ई. में मारीशस चीनी पर कर का बोझ हटा लिए जाने से मारीशस चीनी उद्योग में तीव्र बढ़ोतरी होने लगी।
गुलामी प्रथा की समाप्ति के पीछे था यूरोपीय मानवाधिकारवादियों और आर्थिक तथा राजनैतिक दलों की सोच और समर्थन।
इसी सिलसिले में स्लेव ट्रेड एक्ट की समाप्ति हेतु विधेयक 25-03-1807 को पारित किया गया। ब्रिटिश साम्राज्य में 23-08-1833 को 'स्लेवरी एबॉलिशन एक्ट पास हुआ तथा 01- 08-1834 को ब्रिटिश साम्राज्य में सभी गुलामों को मुक्त कर दिया गया। गुलामी प्रथा की समाप्ति फ़्रांसिसी साम्राज्य में । जुलाई, 1848 ई. तथा डच साम्राज्य में 1 जुलाई, 1863 ई. को की गई। अनुबंध श्रमिक की नियुक्ति और उसकी अनुबंध (एग्रीमेंट) से संबंधित अन्य बातों के प्रावधान जैसे- भोजन, रहने, चिकित्सा, आने-जाने की व्यवस्था को 1837 के एक्ट 'इमिग्रेशन अध्यादेश' में सम्मिलित किया गया। पर बाद के दिनों में वास्तविकता में ये कानूनी प्रावधान बहुत कठोर होते गए।
इस व्यवस्था के तहत निम्न बातों के कारण सजा भी दी जा सकती थी, जैसे काम करने से मना करना या काम में लापरवाही बरतना, काम पर अनुपस्थित रहना, नियोक्ता के साथ अक्कड़पन, दुर्व्यवहार अनुबंध के समय (05 वर्ष) से पहले काम छोड़ने पर इत्यादि ।
अनुबंध व्यवस्था के तहत श्रमिक नियुक्ति की प्रक्रिया ब्रिटिश भारत सरकार ने अनुबंधित मजदूरों की नियुक्ति के लिए कलकत्ता के गार्डन रिच क्षेत्र और मद्रास में नियुक्ति डिपो बनाया तथा उत्प्रवासी प्रोटेक्टर (Protector of Emigrants) को प्रमुख बनाया गया।
उत्प्रवासी प्रोटेक्टर द्वारा उप-उत्प्रवासी के माध्यम से गाँव के स्तर पर अभिकर्ता को मजदूरों की खोज के लिए अनुज्ञप्ति (लाइसेंस) दी जाती थी। इन लाइसेंसधारी अभिकर्ता को उत्तर भारत में अरकाटी (पुरुष), अरकाटीन (महिला) कहा जाता था। वहीं दक्षिण भारत में मजदूरों को नियुक्त करने वाले अभिकर्ता को कंगनी तथा मैस्त्री कहा जाता था। प्रत्येक मजदूर के लिए अरकाटी को 4 आना तथा मुख्य सिरदार को 1 रुपए मिलते थे। अरकाटी गाँव-गाँव में घूमकर कृषक मजदूरों को शब्जबाग दिखाकर सपने दिखाकर,
फुसलाकर तो कभी भारत की तत्कालीन खराब आर्थिक परिस्थिति का हवाला देकर सब-डिपो जो फ़ैजाबाद में थे तक लाता। सब डिपो में एकत्रित मजदूरों का चिकित्सीय परीक्षण जिला सिविल सर्जन द्वारा किया जाता था तथा प्रत्येक मजदूरों के जिला मजिस्ट्रेट के सामने एग्रीमेंट (अनुबंध) होता था, जिसमें काम की अवधि तथा मजदूरों को प्राप्त होने वाली सुविधायों की चर्चा होती थी। इस एग्रीमेंट के तहत जो श्रमिक नियुक्त किए गए वे गिरमिट कहलाए तथा इस मजदूरी की प्रथा को गिरमिटिया कहा गया। गिरमिट एग्रीमेंट का हिंदी भोजपुरी अपभ्रंश है। अनुबंध श्रमिक व्यवस्था की शुरुआत 1834 ई. में हुई।
एग्रीमेंट के पश्चात् प्रवासियों के समूह को चालान / परवाना तथा विशिष्ट प्रमाण पत्र के साथ रेलवे के द्वारा कलकत्ता मुख्य डिपो (गार्डन रिच क्षेत्र) में लाया जाता था। कलकत्ता में इन मजदूरों को एक बड़े शेड में रखा जाता था जहाँ मजदूरों का पुनः परीक्षण किया जाता और फिर उत्प्रवासी प्रोटेक्टर के द्वारा प्रदान की गई 'इमिग्रेशन पास के साथ पानी वाले जहाज के द्वारा उपनिवेशों जैसे- मॉरीशस, फिजी, गुयाना, अफ्रीका, त्रिनिदाद, सूरीनाम आदि के लिए प्रवासन होता था।
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