श्रीलंका में भारतीयों का प्रवेश और सांस्कृतिक गतिशीलता - Indian entry and cultural mobility in Sri Lanka
श्रीलंका में भारतीयों का प्रवेश और सांस्कृतिक गतिशीलता - Indian entry and cultural mobility in Sri Lanka
यह देश एक बहुजातीय तथा बहुधार्मिक है। यहाँ के निवासियों में 74% सिंहली, 18% तमिल, 7% ईसाई तथा 1% अन्य मूल के हैं। श्रीलंका में रहने वाले भारतीय डायस्पोरा की समस्या भारत और श्रीलंका के मध्य कटुता का मुख्य कारण था। भारत को यह समस्या ब्रिटिश शासन से विरासत के रूप में मिली थी। लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व ब्रिटिश पूँजीपतियों ने श्रीलंका के प्राचीन कांडीयन राजाओं के यहाँ चाय और रबड़ बगान उगाने का काम शुरू किया था। इन उद्योगों में काम करने के लिए उन्होंने दक्षिण भारत से सस्ते मजदूरों का श्रीलंका में आयात किया और उन्हें वहीं बसा दिया ।
श्रीलंका में बसे तमिल लोग अपने पारंपरिक त्यौहारों और सांस्कृतिक गतिविधियों में संलग्न होते हैं। फसल कटाई के त्योहार पोंगल में जनवरी माह में किसान अपनी अच्छी फसल के लिए आभार प्रकट करने हेतु पृथ्वी, सूर्य और पशुओं की पूजा करते हैं। 'चिथीराई (Chithirai) भी एक लोकप्रिय त्योहार है। यह पांड्य राजकुमारी मीनाक्षी और भगवान सुंदरेश्व के अलौकिक परिणय बंधन की स्मृति में मनाया जाता है। तमिल महीने 'आदि' के अठारहवें दिन नदियों के किनारे आदिपेरूकु' पर्व मनाया जाता है। इसके साथ ही नई फ़सल की बुवाई से संबंधित काम भी शुरू हो जाता है। नृत्य महोत्सव 'ममल्लापुरम' एक अद्भुत महोत्सव है।
नृत्यकला के सर्वश्रेष्ठ और सुविख्यात कलाकारों द्वारा भरतनाट्यम, कुचीपुडी, कथकली और ओडिसी नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं। नाट्यांजलि नृत्य महोत्सव में सृष्टि के आदि नर्तक भगवान नटराज को विशेष श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
नवरात्र पर्व का शाब्दिक अर्थ 'नौ रात्रियाँ', जो विभिन्न प्रदेशों में भिन्न-भिन्न रूपों में और अनोखे ढंग से मनाया जाता है। यह पर्व शक्ति, धन और ज्ञान के लिए देवी 'शक्ति' को संतुष्टकरने के लिए मनाया जाता है। श्रीलंका का प्रकाश पर्व 'कार्तिगै दीपम्' भी बहुत प्रसिद्ध है। इसमें घरों के बाहर मिट्टी के दीए जलाए जाते हैं और उल्लासपूर्वक पटाखे छोड़े जाते हैं।
थेरवाद बौद्ध धर्म श्रीलंका की जनसंख्या में 70.2% है। यह श्रीलंका द्वीप तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में इस तरह के बुद्धघोष के रूप में प्रख्यात विद्वानों के उत्पादन और विशाल पाली के सिद्धांतों के संरक्षण में बौद्ध धर्म की शुरुआत के बाद बौद्ध छात्रवृत्ति और सीखने का एक केंद्र रहा है। अपने इतिहास में सिंहली राजाओं ने द्वीप के बौद्ध संस्थाओं के रखरखाव और पुनरुत्थान में एक प्रमुख भूमिका निभाई है। श्रीलंका में 6,000 बौद्ध मठों / विहारों में लगभग 15,000 भिक्षु एवं भिक्षुणियाँ हैं।
1833 में जैसे विश्व में दास प्रथा को समाप्त किया गया, उसी प्रकार श्रीलंका में भी द कोलब्रुक- 'सुधार' ' के तहत बंधुआ मजदूरी की प्रथा को समाप्त कर दिया गया,
परंतु वहाँ खेती विशेषतः कैमरोन कॉफी उत्पादन के लिए श्रमिकों की कमी हो गई, क्योंकि वहाँ के स्थानीय सिंहली किसानों ने कॉफ़ी के उत्पादन से अपना हाथ मोड़ लिया। ऐसी परिस्थिति में श्रीलंकाई भौगोलिक वातावरण में कॉफी के उत्पादन, उसकी सफाई, पैकिंग आदि से संबंधित सभी कार्यों के लिए भारत के दक्षिणी राज्यों के प्रमुख क्षेत्रों यथा तन्नेवेल्ली, रामनद, दक्षिणी आर्कोट, मदुरई, चिन्नापोली और पुदुकोट्टी से श्रमिकों की भर्ती की गई।
श्रीलंका में चाय की पैकेजिंग करते भारतीय श्रमिक इन दक्षिणी राज्यों के श्रमिकों की नियुक्ति कंगनी और मैत्री व्यवस्था के तहत की गई।
वहीं उत्तर भारत से ब्रिटिश उपनिवेशों जैसे- मॉरिशस, फिजी, त्रिनिदाद, टोबैगो, सूरीनाम, गुयाना, दक्षिण अफ्रीका के लिए मुख्य रूप
| कंगनी तथा मैस्त्री व्यवस्था दक्षिण भारत में श्रमिक भर्ती हेतु कंगनी एवं मैस्त्री प्रणाली का प्रयोग | किया जाता था। कंगनी और मैस्त्री, तमिल भाषा के शब्द हैं। कंगनी का अर्थ है- मुखिया, फोरमेन, ओवरसीयर जबकि मैस्त्री का अर्थ पर्यवेक्षक (सुपरवाईजर), प्रबंध देखने वाला। प्रारंभ में कंगनी व्यवस्था के तहत मजदूरों की नियुक्ति मलाया, सीलोन (श्रीलंका) के लिए जबकि मैस्त्री के द्वारा बर्मा में श्रमिक भर्ती हुई।
दोनों व्यवस्था की अपनी विशिष्टता के बावजूद भी इन दोनों में पर्याप्त समानता दिखाई देती है। दोनों व्यवस्थाओं में माध्यम व्यक्ति नेटवर्क' (Middle men Network) की उपस्थिति पाई जाती है | तथा औपनिवेशिक कॉलोनियों के बागानों में कार्य करने के लिए श्रमिक भर्ती हेतु ऋण संबंधों (Debt Relationship) को प्रयोग में लाया जाता है। कंगनी व्यवस्था में मजदूरों को अग्रिम ऋण उसके परिवार में भरण-पोषण के लिए दे दिया जाता था। इस ऋण की मध्यस्थता फोरमेन करता था। 1840 से 1942 के मध्य कंगनी और मैस्त्री प्रणाली के अंतर्गत 17 लाख से ज्यादा व्यक्ति मलाया तथा सिंगापुर में कार्य करने के लिए भर्ती किए गए। इसी प्रकार बर्मा के लिए 16 लाख तथा सिलोन के लिए 10 लाख श्रमिक प्रवासित हुए।
इसके तहत मजदूर किसी गाँव, किसी रिश्तेदारी या जातीय समूह से जुड़े होते थे। मजदूर नियुक्ति करने वाले ठेकेदार को मजबू नियुक्ति के एवज में कमीशन मिलता था। कंगनी को अपने गृह जिले से मजदूरों की भर्ती के लिए लाइसेंस प्राप्त होता था। कंगनी को प्रत्येक मजदूर की नियुक्ति पर 2 प्रतिशत कमीशन मिलता था, जिसे मुखिया मनीर कहते थे। मजदूरों की नियुक्ति के बाद मजदूरों के कुल मजदूरी का 3-4 प्रतिशत प्रत्येक मजदूर का हिस्सा भी मुखिया को मिलता था, जो मजदू उस कंगनी के समूह में | थे। इसे पेंस मनी कहते थे। मजदूरों के शोषण तथा कम मजदूरी की शिकायत के कारण 1938 से मलाया और 1940 में सिलोन के लिए मजदूर भर्ती की इस व्यवस्था को औपनिवेशिक भारत सरकार के द्वारा बंद कर दिया गया।
मैत्री- यह मजदूरों की नियुक्ति में कंगनी के समान था, परंतु मजबूरों के बीच मैस्त्री के कई पदानुक्रम / स्तर थे जैसे- सोपान / अनुक्रमा ये अनुक्रम थे-
मजबू ठेकेदार - मुख्य मैस्त्री ---- भारी मैत्री गैंग मैस्त्री
गैंग मैस्त्री के अंतर्गत 10 से 20 मजदूरों की टोली होती थी, जिसकी व्यवस्था गैंग मैत्री करता था। इसके तहत निश्चित अग्रिम मजदूरी के साथ-साथ निश्चित समय के लिए मजदूरी करना होता था। कंगनी से अलग, इसमें मजदूर, एक नौकर की तरह कार्य करते थे। इसमें मैस्त्री को मजदूरों को हटाने तथा उनको जो | अग्रिम दी गई एवं मजदूरों को उसके पुर्नवापसी का भी हक होता था।
इसके तहत मजदूरों को श्रीलंका, बर्मा, मलेशिया, मलाया ले जाया गया, जहाँ वे कॉफी, रबर की | खेती में लगाए गए। रबर की खेती के लिए स्थायी मजबूों की आवश्यकता थी, इसीलिए इस व्यवस्था के | तहत मजदूरों को ले जाया गया। बर्मा में इन मजदूरों को चावल की खेती में लगाया गया, क्योंकि पश्चिम में बर्मा की चावल की माँग अधिक थी।
मैस्त्री का उन्मूलन 1937 में किया गया, क्योंकि बाद के दिनों में मजदूरों की संख्या में अवैध तरीके से कटौती की गई, मजदूरों की मुफ्त सेवा को आवश्यक बनाया गया था तथा रात और दिन के लिए समान वेतन दिया जाता था।
से गन्ने के उत्पादन, रेलवे और भवन निर्माण के लिए अनुबंधित श्रमिकों की व्यवस्था के तहत मजबू को पाँच वर्ष के अनुबंध पर ले जाया गया। परंतु दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों जैसे- मलय, जावा, इन्डोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका आदि देशों में मजदूरों को कंगनी और मैस्त्री व्यवस्था के तहत ले जाया गया, परंतु यहाँ इन मजदूरों की स्थिति अच्छी नहीं थी। इनके लिए 1865 से पीने के लिए साफ पानी, रहने के लिए छोटी-छोटी टिन की खोली और चिकित्सा सुविधा की व्यवस्था की गई। 1904 में सिलोन लेबर कमीशन' की स्थापना की गई। इस कमीशन का उद्देश्य था कंगनी मैत्री के तहत श्रीलंका गए भारतीय श्रमिकों की काम करने की जीवन परिस्थिति की जाँच करना। 1920 ई. में एक कानून बनाया गया, जिसके तहत इन कंगनी-मैत्री श्रमिकों के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा देने की व्यवस्था की गई।
वार्तालाप में शामिल हों