इंडो-सूरीनामी सामाजिक-सांस्कृतिक एवं भाषाई गतिशीलता - Indo-Surinamese socio-cultural and linguistic dynamics
इंडो-सूरीनामी सामाजिक-सांस्कृतिक एवं भाषाई गतिशीलता - Indo-Surinamese socio-cultural and linguistic dynamics
सूरीनाम का समाज बहुसांस्कृतिक, बहुधार्मिक और बहुभाषिक है, जिसमें अलग-अलग जाति, नस्ल, भाषा और धर्म वाले लोग निवास करते हैं। भारतीय संस्कृति से ये गहरे रूप से जुड़े हैं। वे आज भी गीता, रामायण, हनुमान चालीसा पढ़ते हैं। गीता, रामायण, हनुमान चालीसा, कुरान हदीस, गंगा, गायत्री से ये अपने जीवन को गहरे रूप से जुड़ा मानते हैं।
सूरीनाम आने वाला भारतीय समुदाय मुख्यतः पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ गोरखपुर, बस्ती, गोंडा, फैजाबाद, जीनपुर, गाजीपुर, व बलिया जिलों और बिहार के मुजफ्फरपुर, दरभंगा, शाहाबाद, पटना और गया जिलों से था,
जहाँ भोजपुरी, अवधी, मगही, मैथिली, ब्रजभाषाएँ बोली जाती हैं। सूरीनाम आने वाले अपनी-अपनी परंपराओं के साथ होली, दीपावली के त्योहार, अपने-अपने रीति-रिवाज और हर अवसर के गीत लाए थे। दिन भर के कठिन परिश्रम के बाद ये अपने साथ लाए रामचरितमानस की चौपाइयाँ पढ़ते, आपस में मिल-बैठकर भजन करते, किस्से कहानियाँ कहते और लोकगीत गाते। अतः लोकगीत भी भाषा, धर्म व संस्कृति के प्रचार का माध्यम रहे और लोकगीत इन भारतीय प्रवासियों द्वारा लाई गई मौखिक परंपरा का एक हिस्सा थे। जैसे-जैसे सामाजिक चेतना जागृत हुई, गाने की टोलियाँ बनने लगीं, ये संगठित समूह अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोए रहे और पीढ़ी दर पीढ़ी लोकगीतों को मौखिक विरासत के रूप में सौंपा जाता रहा।
आजीविका और सुखमय जीवन की तलाश में 5 जून, 1873 ई. में जब हिंदुस्तान के लोग अनुबंधित गिरमिट मजदूर के रूप में सूरीनाम पहुँचे, उस समय दैनिक जीवन के कष्ट, अपनी आकांक्षाओं के पूरे न होने का दर्द, परिवार से विछोह और निराशा से घिरे, दिन भर के कठिन श्रम से थके हारे भारतवंशी श्रमिकों के पास मनोरंजन का कोई साधन नहीं था तब वह लोग संध्या के समय एक साथ • मिल बैठ कर अपना दुख हलका करते थे, कुछ गा-बजा लेते थे, यह गाना बजाना क्लांत हृदयों के लिए औषधि का काम करता था। इस समय गाए गीत मुख्यतः बिरहा के गीत होते थे और खजड़ी पर गाए जाते थे। कभी रामायण पर चर्चा हो जाती थी, तो कभी किस्से कहानियों में कुछ समय व्यतीत किया जाता था।
धीरे-धीरे जैसे-जैसे इन लोगों का कुछ साहस बढ़ा, गीतों की ध्वनि व साज की आवाज बढ़ने लगी। भाषा, संस्कृति, संगीत के साथ भारतीय बॉलीवुड ने यहाँ अपना स्थान बनाया है।
विभिन्न अवसरों पर परपरंपरागत गीत गाए जाते हैं। आज तकनीकी विकास के दौर में यह परिवर्तन अवश्य आया है कि जो लोकगीत महिलाओं द्वारा परंपरागत रूप से गाए जाते थे अब अक्सर सीडी पर बजाए जाते हैं या फिर एक व्यावसायिक संगीत टोली को आमंत्रित कर मंचासीन कर दिया जाता है फिर भी लोकगीतों की परंपरा कायम है।
1975 ई. में नीदरलैंड से सूरीनाम की स्वतंत्रता के बाद करीब 300,000 युवा भारतवंशियों की पीढ़ी ने सूरीनाम की अंतस्नस्लीय तनाव के कारण नीदरलैंड में ही रहना पसंद किया। सूरीनाम के संविधान के अनुच्छेद 16 के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षित होने का अधिकार है। अनुच्छेद 7(6) के अनुसार माता-पिता अपने बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने के लिए भी स्वतंत्र हैं। 1 जनवरी, 1975 ई. से सभी को निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जाती है।
सूरीनाम में 44 प्रतिशत सरकारी पाठशालाएँ हैं और 56 प्रतिशत स्वैच्छिक संस्थाओं की पाठशालाएँ हैं, जिनके अंतर्गत कैथोलिक, आर्यसमाजी और सनातनी संस्थाएँ आती हैं,
जिनमें सरनामी, देवनागरी लिपि और हिंदी की शिक्षा प्रदान की जाती है, जिनके अध्यापकों का संबंध सूरीनाम हिंदी परिषद से होता है, जिसके शिक्षण और प्रशिक्षण का काम सूरीनाम हिंदी परिषद के द्वारा प्रतिवर्ष संपन्न होता है। हिंदुस्तानियों की माँग पर हॉलैंड सरकार ने हिंदी स्कूल खुलवाए, जिन्हें 'कुली स्कूल' भी कहा गया। हिंदी पढ़ने-लिखने का एक कारण यह भी था कि सबको पढ़ने के लिए स्कूल जाना अनिवार्य था । मुंशी नाथूराम मास्टर द्वारा निर्मित हिंदी की पहली पुस्तक हॉलैंड सरकार के द्वारा निःशुल्क वितरित की गई थी।
सूरीनाम के हिंदुस्तानियों की संख्या 40 प्रतिशत के आसपास है। हिंदुस्तान से आए होने के कारण यह अपने को भारतवंशी कहलाने से अधिक हिंदुस्तानी कहलाए जाना पसंद करते हैं और अपनी संवाद भाषा को भी वे प्राय: हिंदुस्तानी कहते हैं। आधुनिक समय के भारतवंशी अपनी वाणी को सरनामी कहते हैं। सूरीनाम की लिपि रोमन या डच है। हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। सरनामी और हिंदी भाषा प्रचार-प्रसार के लिए सरनामी के प्रथम कवि जीत नाराइन हॉलैंड में चिकित्सा की नौकरी करते हुए द हॉग से 'सरनामी' नाम से पाँच वर्षों तक लगातार पत्रिका निकालते रहे। प्रो. पुष्पिता ने सूरीनाम हिंदी परिषद' संस्था के अंतर्गत विद्यानिवास साहित्य संस्था का गठन किया। सरनामी, भोजपुरी से अलग, अवधी की आसपास की भाषा है। (अवस्थी, पुष्पिता: 2015 )
मंदिरों, मस्जिदों, रेडियो एवं दूरदर्शन केंद्रों तथा शादी-विवाह के अवसर पर मानक हिंदी का प्रयोग किया जाता है। सरनामी हिंदुस्तानी टी.वी. को दूरदर्शन ही कहते हैं। निमंत्रण को न्यौता' से पुकारते हैं। सर को वे आज भी मुंडी कहते हैं, गला इनके लिए 'गटई है और पैर को 'गोड़' कहते हैं। सूरीनाम की राष्ट्रभाषा और राजकाज की भाषा डच है। भारत सरकार ने 5 से 9 जून, 2003 को सातवां विश्व हिंदी सम्मेलन इसी धरती पर संपन्न किया। जिसके सफलतापूर्वक आयोजन में भारतीय मूल की सूरीनामी हिंदी विद्वान एवं साहित्यकार प्रो पुष्पिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
सूरीनाम का कैरिफेस्टा महोत्सव बहुत महत्वपूर्ण सांस्कृतिक महोत्सव है। सूरीनाम में आर्य समाज 1912 ई. में पहुँचा। 1929 ई. में सनातन धर्म की स्थापना हुई। सूरीनाम में पहुँचने वाले पहले मुसलमान पंजाब से थे। यहाँ मुसलमानों के दो समुदाय थे भारतीय मुसलमान और जवाजी मुसलमान । 1930 ई. में यहाँ अहमदिया आंदोलन पहुँचा।
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